घनी कहानी, छोटी शाखा: गोपालराम गहमरी की कहानी “गुप्तकथा” का दूसरा भाग

गुप्तकथा- गोपालराम गहमरी 

भाग-2

(अब तक आपने पढ़ा..कलकत्ते के एक जासूस से, शहर के धनी और दयालु व्यक्ति चिराग़ अली के बेटे हैदर की दोस्ती है। वो जासूस उनके घर भी जाया करता है और चिराग़ अली भी उससे अच्छी तरह पेश आते हैं। चिराग़ अली अपने इलाक़े के सभी कामों में बढ़-चढ़कर हिंसा लिया करते हैं, चाहे वो धार्मिक काम हो या किसी विवाद का निपटारा..वो सिर्फ़ अपनी बिरादरी ही नहीं बल्कि हर व्यक्ति के दिल में वास करते हैं। उनके बेटे हैदर में उनकी तरह के गुण तो नहीं हैं लेकिन वो भी अपने पिता की तरह ही अच्छे दिल वाला इंसान ज़रूर है। इधर कुछ दिनों बाद वापस कलकत्ता लौटे जासूस से मिलने आए हैदर के चेहरे के बदले भाव को देखकर जासूस को आश्चर्य होता है। हैदर उसे बताता है कि उसके पिता हैदर अली की तबियत बहुत ख़राब हो चुकी है और वो ख़ुद अब जीने का ख़याल नहीं रखते बल्कि अपने जाने की बातें करते हैं, ऐसी बातें उनके व्यक्तित्व से काफ़ी अलग है। इसका कारण बताते हुए हैदर जासूस को एक आदमी के बारे में बताता है जो उसके पिता चिराग़ अली से मिलने आया था और पहले तो चिराग़ अली ने उसे नहीं पहचाना लेकिन उसके पहचान बताते ही चिराग़ अली के चेहरे का रंग बदल गया था। यही नहीं उस दिन के बाद से चिराग़ अली ने इब्राहिम नाम के उस इंसान को सुख-सुविधा देकर अपने घर में रख भी लिया। अब आगे..)

पहले ही दिन की बात सुनकर मैंने इतना समझा था कि उनका नाम इब्राहिम भाई है और बंबई की ओर किसी एक गाँव के रहने वाले हैं। इसके सिवाय उनका और कुछ भी हाल मैं आज तक नहीं जानता।

पहले-पहल तो वह बहुत सीधे-सादे से मालूम हुए, लेकिन जब वह पुराने हो चले तब उन्होंने अपना बड़ा रोब जमाया। हम लोगों को दबाने लगे। नौकर-चाकरों पर बेकाम का हुक्म जारी करने लगे। जो उनका हुक्म नहीं माने व मानने में देर करे उसको पिता के सामने ऊँच नीच कहने के सिवाय मारपीट भी करने लगे। पिताजी उनका वह व्यवहार देखकर कुछ भी नहीं बोलते थे। इस कारण नौकर लोग सब सहने लगे। जिनसे नहीं सहा गया वह नौकरी छोड़कर चले जाने लगे। यहाँ तक कि, बहुत से पुराने नौकर भी नौकरी छोड़कर चले गए। हम लोगों को उनके चले जाने से बड़ा दुख हुआ। पिताजी उस बूढ़े पर क्यों इस तरह दया करते थे इसका कारण कुछ भी हम लोगों को मालूम नहीं हुआ।

व्यापार का सब काम जिस नौकर के हाथ में था उसको भी एक दिन बूढ़े ने बहुत ऊँच-नीच कहा और बिना क़सूर उसको इतना सताया कि, उससे सहा नहीं गया। उसने अपना सब दुख पिताजी से कह सुनाया। उस समय बूढ़ा भी पिताजी के पास बैठा था। पिताजी के सामने भी बूढ़े ने उसको बहुत-सी बातों का बाण मारा। जब वहाँ भी पिताजी ने कुछ नहीं कहा तब वह पुराना विश्वासी नौकरी छोड़कर उसी दम यह कहता चला गया कि, अब इस दरबार में नौकरी करने का दिन नहीं रहा। भले आदमियों की इज़्ज़त अब यहाँ नहीं बचती।

उसके चले जाने के बाद उसका सब काम मेरे सिर पड़ा। मुझसे जैसे बना मैं सब करता ही था। एक दिन उस बूढ़े ने मेरे पास आकर कि, “हैदर! एक चिलम तंबाकू तो भर ला”

उसकी बात सुनकर मैंने एक नौकर से कहा कि, उनको एक चिलम तंबाकू भरकर ला दे।

इतना सुनते ही बूढ़ा आग हो गया। उसने कड़क कर कहा – “क्यों हैदर! तेरा इतना कलेजा! मेरा हुक्म नहीं मानता? मैंने जो काम करने का हुक्म दिया उसे न करके दूसरे नौकर को करने का हुक्म दिया? तेरे बाप ने जो काम काम आज तक नहीं किया वह काम तूने मेरे सामने कर दिखाया?”

उस इब्राहिम भाई पर हम लोगों को पहले ही से बहुत रंज था, पर पिताजी के सबब से हम लोग उससे कुछ नहीं कह सकते थे। लेकिन, उस दिन तो मुझसे उसकी बात नहीं सही गई और मैं एक जूता लेकर यह कहता हुआ उठा कि- “अच्छा मैं अपने हाथ से ही तेरा कहना किए देता हूँ। और पास जाकर उसके सिर पर कई जमा दिए”

बूढ़ा जलते तेल का बैंगन होकर उठा और मुझे बहुत अंडबंड बकता हुआ चला गया। मैंने उसकी ओर फिर आँख उठाकर भी नहीं देखा।इस तरह उसको मेरे हाथ से पीटे जाते देखकर और सब लोग मन में कितने खुश हुए, सो मैं नहीं कह सकता।

इस घटना के कुछ समय पीछे पिताजी ने मुझे बुला भेजा। मैं जब उनके सामने गया तब देखा वह बूढ़ा भी वहीं उनके पास बैठा था।

उसको दिखाकर पिता ने कहा -“क्यों बेटा! तुमने इनको जूते से मारा है?”

मैंने कहा – “हाँ पिताजी! अपमान से जब क्रोध के मारे नहीं रहा गया तब मुझे ऐसा करना पड़ा”- इतना कहकर उसने मुझे जो तंबाकू भर लाने को कहा था वह सब बात कह डाली और उसने बाक़ी नौकरों के साथ जो व्यवहार किया था वह भी जहाँ तक याद आया पिताजी से कह सुनाया।

मेरी बात सुनकर पिताजी थोड़ी देर तक चुप रहे फिर कहने लगे -“ओफ़्फ़ो! तुमने बहुत खराब काम किया है। देखो तुम्हारे एक चिलम तंबाकू भर देने से ही यह खुश थे तो उसको कर देने से ही सब बखेड़ा मिट जाता। तुमने वैसा न करके बड़ा खराब काम किया है”

पिता की बात सुनकर क्रोध के मारे मेरा शरीर काँपने लगा। मैंने बाप के सामने जैसी बात कभी नहीं कही थी वैसी बात कह डाली।

मैंने उनकी बात से बिगड़कर कहा -“पिताजी! आपने कभी मुझे तंबाकू भरना तो सिखलाया नहीं, न तंबाकू भरने का हुक्म दिया कि मैं उस काम को सीखता। फिर जो काम ऐसा नीच है जिसको मैंने कभी नहीं किया, वैसा काम करने के लिए मुझे वह आदमी कहे जो पराया अन्न खाकर पेट पालता है। आप चाहें ख़ुश हों या न हों मैं उसके कहने से ऐसा काम नहीं कर सकता”

इतना सुनकर पिताजी ने कहा – “अरे बेसहूर तूने ऐसा ख़राब काम किया है जैसा कोई नहीं करेगा। जिनका मैं इतना आदर करता हूँ उनको तुमने जूते से मारा उस पर अपने ख़राब काम और क़सूर की माफ़ी तो क्या माँगेगा उलटे लंबा-लंबा जवाब दे रहा है। तुमको समझना चाहिए कि तुमने जो जूते मारे वह उनके सिर नहीं पड़े, मेरे सिर पर पड़े हैं। तुमने उनको नहीं मारा, मुझको मारा है। अब तुमको चाहिए कि किसी तरह हाथ-पाँव पड़कर इनसे माफ़ी माँगो नहीं तो तुम्हारे हक़ में अच्छा नहीं है”

क्रमशः

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