घनी कहानी, छोटी शाखा: गोपालराम गहमरी की कहानी “गुप्तकथा” का अंतिम भाग

गुप्तकथा- गोपालराम गहमरी 

भाग-9 

(अब तक आपने पढ़ा..दीन दुखियों की मदद करने वाले चिराग़ अली का बी हैदर अपने जासूस दोस्त को पिता के पास आए एक मेहमान की बात बताता है। उस मेहमान इब्राहिम अली के आने के बाद से उसके पिता का व्यवहार बदल गया था। हैदर के साथ इब्राहिम भाई के ग़लत बर्ताव के बाद दोनों में बहस होती है और इब्राहिम भाई वहाँ से चला जाता है। चिराग़ अली की तबियत बिगड़ने लगती है और उसी दौरान एक ख़त उनके नाम आता है जिसे पाने के बाद चिराग़ अली रात भर जागकर एक ख़त लिखते हैं और उसके अगले दिन से उनकी तबियत और ख़राब हो जाती है। हैदर अपने जासूस मित्र से मिलकर घर आता है और पिता चिराग़ अली की मृत्यु हो जाती है। इधर जासूस को चिराग़ अली का लिखा ख़त मिलता है। जिससे पता चलता है कि दरअसल चिराग़ अली का नाम वो नहीं है और वो अपने इलाक़े के बदमाश थे और उन पर डाका और हत्या का मुक़दमा भी चल रहा है, फाँसी के लिए ले जाते समय किसी तरह वो थाने के निकल भागे थे और रात-दिन भागते-भागते वो अपने इलाक़े से चालीस कोस दूर भाग आए और एक बस्ती पहुँचे। अब आगे..)
 
‘अब मैंने अपना फ़क़ीरी वेश कर लिया। हाथ में दरयाई नारियल लेकर भीख माँगता राह काटने लगा। जहाँ कहीं सदावर्त्त या धर्मशाला मिलता वहीं पेट भर कर खाता और रात काटकर सवेरे चल देता। इस तरह छ्ह महीने चलने के बाद मैं कलकत्ते आ पहुँचा। जब मैं कलकत्ते में आया; भीख से मेरे पास पच्चीस रुपए बच रहे थे।

कलकत्ता उन दिनों मेरे लिए बिलकुल बेजान-पहचान का शहर था। मैं दिन भर घूमता रह गया रात भर घूमा लेकिन कहीं ठहरने को जगह नहीं मिली, कोई जान-पहचान का आदमी नहीं था। बंबई की ओर के बहुतेरे मुसलमान यहाँ देखने में आए, लेकिन मैं पकड़े जाने के डर से उनके पास नहीं गया।

फ़क़ीरी वेश में घूमकर मैंने समझ लिया कि धनी बस्ती से बाहर छप्पर के मकानों में भाड़े पर कोई जगह लूँ तो दो-तीन रुपए महीने ख़र्च करके बैठने को ठौर पा सकता हूँ। चौथे दिन मैंने एक मुसलमान घर पर जाकर बाहर के दरवाज़े के पास ही एक कोठरी सवा रुपए महीने भाड़े पर पाई। जब मैं घर में रहने लगा तब मैं अपना फ़क़ीरी रूप छोड़कर साधारण मुसलमान बन गया, लेकिन अपना पहले का पहनाव नहीं पहना।

‘कलकत्ते के साधारण मुसलमानों के वेश में मैं वहाँ रहने लगा। अब मन में यह चिंता हुई कि किस तरह दिन कटेंगे। कौन काम करूँ जिससे पेट भरे। इसकी फ़िकर करते-करते दस-पंद्रह दिन बीत गए। बिछौने बरतन और साधारण कपड़े तथा चावल दाल के खर्च में वह पच्चीस रुपए भी ख़त्म हो चले, लेकिन सुख से दिन बिताने के लिए कोई ढंग नहीं किया।

‘एक दिन मैं सवेरे गंगाजी के किनारे बैठा था। जहाज़ पर कोई काम मिल जाता तो अच्छा होता यहीं मन में विचारता था कि इतने में एक बूढ़े मुसलमान ने आकर मुझसे पूछा – “यहाँ क्यों बैठा है?”

मैंने जवाब में कहा – “कोई पेट भरने के रोज़गार की चिंता में बैठा हूँ”

मेरी बात सुनकर उसने कहा – “अच्छा एक दिन के वास्ते तो मैं तुमको काम देता हूँ। एक जहाज़ पर कुछ काम करते हैं उनकी देखरेख करने को जो मेरा आदमी था वह आज काम पर नहीं आया है। तुम उस काम को कर सको तो मेरे साथ आओ मैं उस काम पर तुमको आज के वास्ते रखता हूँ”

‘बूढ़े की बात मानकर मैं उसके साथ गया। एक जहाज़ पर उसके सौ कुली या सौ से ऊपर रहे होंगे, काम कर रहे थे। मुझे उनकी देखरेख के वास्ते वहाँ रखकर बूढ़ा आप वहाँ से चलता हुआ। बूढ़े ने चलती बेर कहा कि छुट्टी के समय से पहले ही मैं आ जाऊँगा।

ठीक समय पर बूढ़ा लौट आया। मेरा काम देखकर बहुत खुश हुआ। उस दिन और दिनों से उस बूढ़े का ड्यौढ़ा काम हुआ। सब कुलियों को मजदूरी देकर बूढ़े ने विदा किया और मुझे एक रुपए देकर उसी काम पर बीस रुपए महीने पर नौकर रखा। मेरे काम से वह दिनोंदिन खुश होता गया। यहाँ तक कि मैं पाँच बरस तक बराबर काम करता गया। पाँचवें वर्ष उसने मेरा पचास रुपए वेतन कर दिया था। उसी साल वह मर गया। उसका काम भी उसके मरने से बंद हो गया। मेरे पास जो रुपए जमा हो गए थे उससे मैंने एक बोट खरीदा और उसको भाड़े पर चलाने लगा। उससे मुझे ख़ूब लाभ हुआ।

यहाँ तक कि एक के बाद मैंने दस बोट खरीदे और उनसे मुझे इतनी आमदनी हुई कि मैं धनी हो गया। मेरी गिनती नामी महाजनों में होने लगी। मैंने छप्पर का घर छोड़कर पक्का छह मंजिला मकान लेकर उसमें ऑफ़िस खोला, उन्हीं दिनों मैंने अपना ब्याह किया। मेरा दिन ऐसा फ़िरा  कि धन लाभ के साथ ही तुम्हारा भी जन्म हुआ। अब मेरा कारोबार खूब बढ़ गया। मैंने कलकत्ते में आते ही अपना नाम बदल लिया था। वही नाम यहाँ के सब लोग जानते हैं। मैं फाँसी का असामी हूँ। गारद से हथकड़ी तोड़कर भाग आया हूँ सो यहाँ कोई नहीं जानता।

मैंने यहाँ से अपने बाप-माँ को लिख भेजा कि मैं मरा नहीं भाग आया हूँ। यहाँ अच्छी तरह हूँ। वहाँ आऊँगा नहीं, न तुम लोगों से भेट करूँगा, लेकिन तुम लोगों को रुपए भेजता जाऊँगा चिट्ठी भी नहीं लिखूँगा। मैंने उसके बाद फिर उनको चिट्ठी नहीं लिखी न उनसे भेंट की। हर साल इतना रुपए भेज देता था कि उनको किसी तरह की तकलीफ़ नहीं होती थी। रुपए मैं कलकत्ते से नहीं भेजता था कभी मद्रास, कभी रंगून, कभी और कहीं किसी दूर शहर में जाकर वहीं से डाक में रुपए भेजता फिर यहाँ चला आता था।

इतने दिन मेरे इसी तरह यहाँ सुख से कटे किसी को कुछ पता नहीं लगा लेकिन न जाने कहाँ से मेरी ख़बर पाकर इब्राहिम भाई कैसे यहाँ चला आया? तुम अब समझ गए होगे कि मैं क्यों उसको इतना मानता और उसका सब सहता था। अब वह यहाँ से बिगड़कर बंबई गया है और वहाँ की पुलिस से सब हाल बताकर उसने मुझे चिट्ठी लिखी है।

‘पुलिस अब तुरंत यहाँ आवेगी और मुझे पकड़कर बंबई ले जाएगी। यहाँ मुझे फाँसी तैयार है। बेटा हैदर! यही हमारा गुप्तभेद है।

पुलिस जब यहाँ आवेगी तब चुपचाप व्यर्थ मनोरथ होकर लौट जाएगी। क्योंकि मैं यहाँ नहीं रहूँगा। इस कारण कि यहाँ कुछ गोलमाल होना तुम्हारी मान-मर्यादा में बट्टा लगावेगा। मैं यहाँ नहीं रहूँगा। अब मेरा मरने का समय आया है। मैं ख़ुशी से संसार छोड़ता हूँ। बेटा! मुझे विदा दो। तुम्हारे वास्ते जो कुछ चाहिए मैंने सब कर दिया है। तुम मेरी तरह किसी कुकर्म में न फँसो मैं यही चाहता हूँ।

पूरी चिट्ठी पढ़कर सब लोग चकित हुए। जासूस ने मन में कहा। ओफ़्फ़! क्या भयानक लीला है। यह बूढ़ा भी ग़ज़ब का आदमी था।

इसके पंद्रह दिन बाद बंबई से पुलिस के आदमी आ पहुँचे। जब उन्होंने सुना कि अली भाई उर्फ चिराग़ अली अब जगत में नहीं हैं, तब दुखी होकर सब लौट गए।

समाप्त

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