घनी कहानी छोटी शाखा: आचार्य रामचंद्र शुक्ल की लिखी कहानी “ग्यारह वर्ष का समय” का चौथा भाग

(हिंदी की पहली कहानी कौन-सी है? इस सवाल पर अलग-अलग जानकारों के अलग-अलग मत हैं..और उन मतों के अनुसार ही कुछ कहानियों को हिंदी की पहली कहानी माना जाता है।अभी कुछ दिन “घनी कहानी छोटी शाखा” में हम शामिल कर रहे हैं ऐसी ही कुछ कहानियों को, जो मानी जाती हैं हिंदी की पहली कहानियों में से एक..इन दिनों आप पढ़ रहे हैं, “आचार्य रामचंद्र शुक्ल” की लिखी कहानी “ग्यारह वर्ष का समय” ..आज पढ़िए चौथा भाग) 

ग्यारह वर्ष का समय-आचार्य रामचंद्र शुक्ल 

 भाग-4

(अब तक आपने पढ़ा..नगर में घूमते हुए लेखक और उनके मित्र, नगर में दंतकथाओं द्वारा भूतिया क़रार दिए खंडहर तक पहुँचते हैं और वहाँ अपने-अपने विचारों और सवालों में गुम बैठे ही होते हैं कि उन्हें वहाँ एक स्त्री की आकृति दिखाई पढ़ती है। उसका पीछा करते हुए उन्हें खंडहर में मिट्टी के ढेर के बीच मौजूद एक छोटी कोठरी के बारे में पता चलता है जहाँ वो स्त्री उन्हें फिर दिखती है। वहाँ से चुपचाप बाहर आए दोनों मित्रों के मन में सवालों का कोलाहल व्याप्त है। तभी वो स्त्री उन्हें बाहर दिखती है और बहुत पूछने पर अपने बारे में बताना आरम्भ करती है। इस नगर की दुर्दशा की कहानी से शुरू हुई उसकी कहानी अब उस स्त्री के जीवन के शुरुआती समय में पहुँच चुकी है। अब आगे..)  

“मेरी अवस्था उस समय 14 वर्ष की हो चुकी थी; अब तक तो मैं निर्बोध बालिका थी। अब क्रमश: मुझे अपनी वास्तविक दशा का ज्ञान होने लगा। मेरा समय भी अहर्निश इसी चिंता में अब व्यतीत होने लगा। शरीर दिन-पर-दिन क्षीण होने लगा। मेरे देवतुल्य पिता ने यह बात जानी। वे सदा मेरे दु:ख भुलाने का यत्न करते रहते थे। अपने पास बैठाकर रामायण आदि की कथा सुनाया करते थे। पिता अब वृद्ध होने लगे; दिवा-रात्रि की चिंता ने उन्हें और भी वृद्ध बना दिया। घर के समस्त कार्य-संपादन का भार मेरे बड़े भाई के ऊपर पड़ा। उनकी स्त्री का स्वाभाव बड़ा क्रूर था। कुछ दिन तक तो किसी प्रकार चला। अंत में वह मुझसे डाह करने लगी और कष्ट देना प्रारम्भ किया, मैं चुपचाप सब सहन करती थी। धीरे-धीरे आश्वास-वाक्य के स्थान पर वह तीक्ष्ण वचनों से मेरा चित्त अधिक दु:खाने लगी।

यदि कभी मैं अपने भाई से निवेदन करती तो वे भी कुछ न बोलते; आनाकानी कर जाते और मेरे पिता की, वृद्धावस्था के कारण, कुछ नहीं चल सकती थी। मेरे दु:ख को समझने वाला वहाँ कोई नहीं दीख पड़ता था। मेरी माता का पहिले ही परलोकवास हो चुका था। मुझे अपनी दशा पर बड़ा दु:ख हुआ- “हा! मेरा स्वामी यदि इस समय होता तो क्या मेरी यही दशा होती? पिता के घर क्या इन्हीं वचनों द्वारा मेरा सत्कार किया जाता”- यही सब विचार करके मेरा हृदय फटने लगता था। अब क्रमश: मेरा हृदय मेघाच्छन्नक होने लगा। मुझे संसार शून्य दिखाई देने लगा। एकांत में बैठकर मैं अपनी अवस्था पर अश्रुवर्षण करती। उसमें भी यह भय लगा रहता कि कहीं भौजाई न पहुँच जाए। एक दिन उसने मुझे इसी अवस्था में पाया तो तुरंत व्यंग्य-वचनों द्वारा आश्वासन देने लगी। मेरा शोकार्त्त हृदय अग्निशिखा की भाँति प्रज्वालित हो उठा; किंतु मौनावलम्बन के सिवा अन्य उपाय ही क्या था? दिन-दिन मुझे यह दु:ख असह्य होने लगा। एक रात्रि को मैं उठी। किसी से कुछ न कहा और सूर्योदय के प्रथम ही अपने पिता का गृह मैंने परित्याग किया”

“मैं अब यह नहीं कह सकती कि उस समय मेरा क्या विचार था। मुझे एक बेर अपने पति के स्थान को देखने की लालसा हुई। दु:ख और शोक से मेरी दशा उन्मत्त की-सी हो गई थी। संसार में मैंने दृष्टि उठा के देखा तो मुझे और कुछ न दिखलाई दिया। केवल चारों ओर दु:ख! सैकड़ों कठिनाइयाँ झेलकर अंत में मैं इस स्थान तक आ पहुँची। उस समय मेरी अवस्था केवल 16 वर्ष की थी। मैंने इस स्थांन को उस समय भी प्राय: इसी दशा में पाया था। यहाँ आने पर मुझे कई चिह्न ऐसे मिले, जिनसे मुझे यह निश्चय हो गया कि चंद्रशेखर मिश्र का घर यही है। इस स्थान को देखकर मेरे आर्त्त हृदय पर बड़ा कठोर आधात पहुँचा”

इतना कहते-कहते हृदय के आवेग ने शब्दो को उसके हृदय ही में बंदी कर रखा; बाहर प्रकट होने न दिया। क्षणिक पर्यंत वह चुप रही; सिर नीचा किए भूमि की ओर देखती रही। इधर मेरे मित्र की दशा कुछ और ही हो रही थी; लिखित चित्र की भाँति बैठे वे एकटक ताक रहे थे; इंद्रियाँ अपना कार्य उस समय भूल गयी थीं। स्री ने फिर कहना आरम्भ किया –

“इस स्थान को देख मेरा चित्त बहुत दग्ध हुआ-  “हा! यदि ईश्वर चाहता तो किसी दिन मैं इसी गृह की स्वामिनी होती। आज ईश्वर ने मुझको उसे इस अवस्था में दिखलाया। उसके आगे किसका वश है?”-  अनुसंधान करने पर मुझे दो कोठरियाँ मिलीं जो सर्वप्रकार से रक्षित और मनुष्य की दृष्टि से दुर्भेद्य थीं। लगभग चारों ओर मिट्टी पड़ जाने के कारण किसी को उनकी स्थिति का संदेह नहीं हो सकता था। मुझे बहुत-सी सामग्रियाँ भी इनमें प्राप्त हुईं जो मेरी तुच्छ आवश्यकता के अनुसार बहुत थीं। मुझे यह निर्जन स्थान अपने पिता के कष्टागार से प्रियतम प्रतीत हुआ। यहीं मेरे पति के बाल्यावस्था के दिन व्यतीत हुए थे। यही स्थान मुझे प्रिय है। यहीं मैं अपने दु:खमय जीवन का शेष भाग उसी करुणालय जगदीश्वर की, जिसने मुझे इस अवस्था‍ में डाला, आराधना में बिताऊँगी। यही विचार मैंने स्थिर किया। ईश्वर को मैंने धन्यवाद दिया, जिसने ऐसा उपयुक्त स्थान मेरे लिए ढूँढ़कर निकाला। कदाचित् तुम पूछोगे कि इस अभागिनी ने अपने लिए इस प्रकार का जीवन क्यों उपयुक्त विचारा? तो उसका उत्तर है कि यह दुष्ट संसार भाँति-भाँति की वासनाओं से पूर्ण है, जो मनुष्य को उसके सत्य-पथ से विचलित कर देती हैं। दुष्ट और कुमार्गी लोगों के अत्याचार से बचा रहना भी कठिन कार्य है”

इतना कहके वह स्त्री ठहर गयी। मेरे मित्र की ओर उसने देखा। वे कुछ मिनट तक काष्ठ पुत्तलिका की भाँति बैठे रहे। अंत में एक लंबी ठंडी साँस भर के उन्होंने कहा-“ईश्वर ! यह स्वप्न है या प्रत्यक्ष?”- स्त्री उनका यह भाव देख-देखकर विस्मित हो रही थी, उसने पूछा, “क्यों ! कैसा चित्त है?”-मेरे मित्र ने अपने को सँभाला और उत्तर दिया, “तुम्हा्री कथा का प्रभाव मेरे चित्त पर बहुत हुआ है; कृपा करके आगे कहो”

स्त्री ने कहा, “मुझे अब कुछ कहना शेष नहीं है। आज पाँच वर्ष मुझे इस स्थान पर आए हुए; संसार में किसी मनुष्य को आज तक यह प्रकट नहीं हुआ। यहाँ प्रेतों के भय से कोई पदार्पण नहीं करता; इससे मुझे अपने को गोपन रखने में विशेष कठिनता नहीं पड़ती। संयोगवश रात्रि में किसी की दृष्टि यदि मुझ पर पड़ी भी तो चुड़ैल के भ्रम से मेरे निकट तक आने का किसी को साहस न हुआ। यह आज प्रथम ऐसा संयोग उपस्थित हुआ है; तुम्हारे साहस को मैं सराहती हूँ और प्रार्थना करती हूँ कि तुम अपने शपथ पर दृढ़ रहोगे। संसार में अब मैं प्रकट होना नहीं चाहती; प्रकट होने से मेरी बड़ी दुर्दशा होगी। मैं यहीं अपने पति के स्थान पर अपना जीवन शेष करना चाहती हूँ। इस संसार में अब मैं बहुत दिन न रहूँगी”

क्रमशः 

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