घनी कहानी, छोटी शाखा- सत्यजीत राय की कहानी ‘सहपाठी’ का पहला भाग

सहपाठी – सत्यजीत राय
भाग-1

अभी सुबह के सवा नौ बजे हैं।
मोहित सरकार ने गले में टाई का फंदा डाला ही था कि उस की पत्नी अरुणा कमरे में आई और बोली- “तुम्हारा फोन”
“अब अभी कौन फोन कर सकता है भला!”
मोहित का ठीक साढ़े नौ बज़े दफ़्तर जाने का नियम रहा है। अब घर से दफ़्तर को निकलते वक्त “तुम्हारा फोन” सुन कर स्वभावत: मोहित की त्योरियाँ चढ़ गई।
अरुणा ने बताया, “वह कभी तुम्हारे साथ स्कूल में पढ़ता था”
“स्कूल में..?..अच्छा…नाम बताया?”
“उसने कहा कि जय नाम बताने पर ही वह समझ जाएगा”
मोहित सरकार ने कोई तीस साल पहले स्कूल छोड़ा होगा। उसकी क्लास में चालीस लड़के रहे होंगे। अगर वह बड़े ध्यान से सोचे भी तो ज़्यादा-से-ज़्यादा बीस साथियों के नाम याद कर सकता है और इसके साथ उनका चेहरा भी। सौभाग्य से जय या जयदेव के नाम और चेहरे की याद अब भी उसे है लेकिन वह क्लास के सब से अच्छे लड़कों में एक था। गोरा, सुंदर-सा चेहरा, पढ़ने-लिखने में होशियार, खेल-कूद में भी आगे, हाई जंप में अव्वल। कभी-कभी वह ताश के खेल भी दिखाया करता और हाँ, कैसेबियांका की आवृत्ति में उस ने कोई पदक भी जीता था। स्कूल से निकलने के बाद मोहित ने उसके बारे में कभी कोई खोज-ख़बर नहीं ली। लेकिन आज इतने सालों के बाद अपनी दोस्ती के बावजूद और कभी अपने सहपाठी रहे इस आदमी के बारे में कोई ख़ास लगाव महसूस नही कर रहा था।
ख़ैर, मोहित ने फोन का रिसीवर पकड़ा।
“हैलो…”
“कौन मोहित! मुझे पहचान रहे हो भाई, मैं वहीं तुम्हारा जय… जयदेव बोस। बाली गंज स्कूल का सहपाठी”
“भई अब आवाज से तो पहचान नहीं रहा…हाँ..चेहरा ज़रूर याद है, बात क्या है?”
“तुम तो अब बड़े अफ़सर हो गए हो भई। मेरा नाम तुम्हें अब तक याद रहा, यही बहुत है”
“अरे यह सब छोड़ो..बताओ बात क्या है?”
“बस यों ही थोड़ी ज़रूरत थी..एक बार मिलना चाहता हूँ तुम से”
“कब?”
“तुम जब कहो..लेकिन थोड़ी जल्दी हो तो अच्छा…”
“तो फिर आज ही मिलो..मैं शाम को छह बजे घर आ जाता हूँ, तुम सात बजे आ सकोगे?”
“क्यों नहीं ज़रूर आऊँगा अच्छा तो धन्यवाद, तभी सारी बातें होंगी”
अभी हाल ही में ख़रीदी गई आसमानी रंग की कार में दफ़्तर जाते हुए मोहित सरकार ने स्कूल में घटी कुछ घटनाओं को याद करने की कोशिश की। हेड-मास्टर गिरींद्र सर की पैनी नज़र और बेहद गंभीर स्वभाव के बावजूद स्कूली दिन भी सचमुच कैसी-कैसी खुशियों से भरे दिन थे। मोहित ख़ुद भी एक अच्छा विद्यार्थी था। शंकर, मोहित और जयदेव- इन तीनों में ही प्रतिद्वंद्विता चलती रहती थी। पहले, दूसरे और तीसरे नंबर पर इन्हीं तीनों का बारी-बारी कब्ज़ा रहता। छठी से ले कर मोहित सरकार और जयदेव बोस एक साथ ही पढ़ते रहते थे। कई बार एक ही बेंच पर बैठ कर पढ़ाई की थी। फुटबॉल में भी दोनों का बराबरी का स्थान था। मोहित राइट इन खिलाड़ी था तो जयदेव राइट आउट। तब मोहित को जान पड़ता कि यह दोस्ती आज की नहीं, युगों की हैं। लेकिन स्कूल छोड़ने के बाद दोनों के रास्ते अलग-अलग हो गए।
मोहित के पिता एक रईस आदमी थे, कलकत्ता के नामी वकील। स्कूल की पढ़ाई ख़त्म करने के बाद, मोहित का दाखिला एक अच्छे से कॉलेज में हो गया और यहाँ की पढ़ाई समाप्त हो जाने के दो साल बाद ही उस की नियुक्ति एक बड़ी कारोबारी कंपनी के अफ़सर के रूप में हो गई। जयदेव किसी दूसरे शहर में किसी कॉलेज में भर्ती हो गया था। दर असल उसके पिताजी की नौकरी बदली वाली थी। सबसे हैरानी की बात यह थी कि कॉलेज में जाने के बाद मोहित ने जयदेव की कमी को कभी महसूस नहीं किया। उस की जगह कॉलेज के एक दूसरे दोस्त ने ले ली। बाद में यह दोस्त भी बदल गया, जब कॉलेज जीवन पूरा हो जाने के बाद मोहित की नौकरी वाली ज़िन्दगी शुरू हो गई। मोहित अपनी दफ़्तरी दुनिया में चार बड़े अफ़सरों में से एक है और उसके सबसे अच्छे दोस्तों में उसका ही एक सहकर्मी है। स्कूल के साथियों में एक प्रज्ञान सेनगुप्त है। पर स्कूल की यादों में प्रज्ञान की कोई जगह नहीं हैं। लेकिन जयदेव- जिस के साथ पिछले तीस सालों से मुलाक़ात तक नहीं हुई हैं… उसकी यादों ने अपनी काफ़ी जगह बना रखी है। मोहित ने उन पुरानी बातों को याद करते हुए इस बात की सच्चाई को बड़ी गहराई से महसूस किया
मोहित का दफ़्तर सेंट्रल एवेन्यू में हैं। चौरंगी और सुरेन्द्र बॅनर्जी रोड के मोड़ पर पहुँचते ही गाड़ियों की भीड़, बसों के हॉर्न और धुएँ से मोहित सरकार की यादों की दुनिया ढह गई और वह सामने खड़ी दुनिया के सामने था। अपनी कलाई घड़ी पर नज़र दौड़ाते हुए ही वह समझ गया कि वह आज तीन मिनट देर से दफ़्तर पहुँच रहा है।
दफ़्तर का काम निपटा कर, मोहित जब ली रोड स्थित अपने घर पहुँचा तो बाली गंज गवर्नमेंट स्कूल के बारे में उसके मन में रत्ती भर याद नहीं बची थी। यहाँ तक कि वह सुबह टेलीफोन पर हुई बातों के बारे में भी भूल चुका था। उसे इस बात की याद तब आई, जब उसका नौकर विपिन ड्राइंग रूम में आया और उसने उस के हाथों में एक पुर्जा थमाया। यह किसी लेखन-पुस्तिका में से फाड़ा गया पन्ना था… मोड़ा हुआ। इस पर अँग्रेज़ी में लिखा था – ‘जयदेव बोस एज़ पर अपाइंटमेंट।’
रेडियो पर बी.बी.सी. से आ रही ख़बरों को सुनना बंद कर मोहित ने विपिन को कहा- “उसे अन्दर आने को कहो”
लेकिन उसने दूसरे ही पल यह महसूस किया कि जय इतने दिनों बाद मुझसे मिलने आ रहा है, उसके नाश्ते के लिए कुछ मँगा लेना चाहिए था। दफ़्तर से लौटते हुए पार्क स्ट्रीट से वह बड़े आराम से केक या पेस्ट्री वगैरह कुछ भी ला ही सकता था, लेकिन उसे जय के आने की बात याद ही नहीं रही। पता नहीं, उसकी घरवाली ने इस बारे में कोई इंतज़ाम कर रखा है या नहीं।
“पहचान रहे हो?”
इस सवाल को सुन कर और इसके बोलने वाले की ओर देख कर मोहित सरकार की मनोदशा कुछ ऐसी हो गई कि बैठक वाले कमरे की सीढ़ी पार करने के बाद भी उसने नीचे की ओर एक क़दम और बढ़ा दिया था; जबकि वहाँ कोई सीढ़ी नहीं थी।
कमरे की चौखट पार करने के बाद, जो सज्जन अंदर दाखिल हुए थे, उन्होंने एक ढीली-ढाली सूती पतलून पहन रखी थी। इस के ऊपर एक घटिया छापे वाली सूती क़मीज़। दोनों पर कभी इस्तरी की गई हो, ऐसा नहीं जान पड़ा। क़मीज़ की कॉलर से जो सूरत झाँक रही थी, उसे देख कर मोहित अपनी याद में बसे जयदेव से उसका कोई तालमेल नहीं बिठा सका। आने वाले का चेहरा सूखा, गाल पिचके, आँखे धँसी, देह का रंग धूप में तप-तप कर काला पड़ गया था। इस चेहरे पर तीन-चार दिनों की कच्ची-पक्की मूँछें उगी थीं। माथे के उपर एक मस्सा और कनपटियों पर बेतरतीब ढंग से फैले ढेर सारे पके हुए बाल।

उस आदमी ने यह सवाल झूठी हँसी के साथ पूछा था- उसकी दाँतों की कतार भी मोहित को दिख पड़ी। पान खा-खा कर सड़ गए ऐसे दाँतों के साथ हँसने वाले को सबसे पहले अपना मुँह हथेली से ढाँप लेना चाहिए।

क्रमशः

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