घनी कहानी, छोटी शाखा: चंद्रधर शर्मा गुलेरी की लिखी कहानी “सुखमय जीवन” का अंतिम भाग

(हिंदी की पहली कहानी कौन-सी है? इस सवाल पर अलग-अलग जानकारों के अलग-अलग मत हैं..और उन मतों के अनुसार ही कुछ कहानियों को हिंदी की पहली कहानी माना जाता है। कुछ दिनों से आप “घनी कहानी छोटी शाखा” में पढ़ रहे हैं, ऐसी ही कुछ कहानियों को, जो मानी जाती हैं हिंदी की पहली कहानियों में से एक..इन दिनों आप पढ़ रहे हैं “चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी'” की लिखी कहानी “सुखमय जीवन” ..आज पढ़िए तीसरा और अंतिम भाग)

सुखमय जीवन- चंद्रधर शर्मा “गुलेरी”

भाग-3

(अब तक आपने पढ़ा..कहानी के नायक जयदेवशरण वर्मा अपने दोस्त से मिलने सायकिल लेकर निकलते हैं, रास्ते में सायकिल के चक्के की हवा निकल जाने की वजह से उनकी मुलाक़ात एक लड़की से होती है, जो उन्हें अपने घर ले जाती है। जयदेवशरण को उस लड़की की नज़रें आकर्षित करती हैं। जबकि वो लड़की कमला जयदेवशरण का नाम पता चलते ही उनकी किताब “सुखमय जीवन” के बारे में कहती है कि उसके चाचा उस किताब के प्रसंशकों में से एक हैं। वहाँ बातों के दौरान जयदेव की किताब ही मूल चर्चा का विषय होती है लेकिन जयदेव का ध्यान कमला पर ही लगा है और वो उसके बारे में ये जानकर ख़ुश होते हैं कि कमला अविवाहित है और मासिक पत्रिकाओं में लेख भी भेजती है। अब आगे..)

सायंकाल को मैं बगीचे में टहलने निकला। देखता क्या हूँ एक कोने में केले के झाड़ों के नीचे मोतिए और रजनीगंधा की क्यारियाँ हैं और कमला उनमें पानी दे रही है। मैंने सोचा की यही समय है। आज मरना है या जीना है। उसको देखते ही मेरे हृदय में प्रेम की अग्नि जल उठी थी और दिन-भर वहाँ रहने से वह धधकने लग गई थी। दो ही पहर में मैं बालक से युवा हो गया था। अंग्रेज़ी महाकाव्यों में, प्रेममय उपन्यासों में और कोर्स के संस्कृत-नाटकों में जहाँ-जहाँ प्रेमिका-प्रेमिक का वार्तालाप पढ़ा था, वहाँ-वहाँ का दृश्य स्मरण करके वहाँ-वहाँ के वाक्यों को खोज रहा था, पर यह निश्‍चय नहीं कर सका कि इतने थोड़े परिचय पर भी बात कैसी करनी चाहिए। अंत में अंग्रेज़ी पढ़ने वाले की धृष्‍टता ने आर्यकुमार की शालीनता पर विजय पाई और चपलता कहिए, बेसमझी कहिए, ढीठपन कहिए, पागलपन कहिए, मैंने दौड़ कर कमला हाथ पकड़ लिया। उसके चेहरे पर सुर्खी दौड़ गई और डोलची उसके हाथ से गिर पड़ी। मैं उसके कान में कहने लगा –
“आपसे एक बात कहनी है”

“क्या? यहाँ कहने की कौन-सी बात है?”

“जब से आपको देखा है तब से..”

“बस चुप करो। ऐसी धृष्‍टता !”

अब मेरा वचन-प्रवाह उमड़ चुका था। मैं स्वयं नहीं जानता था कि मैं क्या कर रहा हूँ, पर लगा बकने – “प्यारी कमला, तुम मुझे प्राणों से बढ़ कर हो; प्यारी कमला, मुझे अपना भ्रमर बनने दो। मेरी जीवन तुम्हारे बिना मरुस्थल है, उसमें मंदाकिनी बन कर बहो। मेरे जलते हुए हृदय में अमृत की पट्टी बन जाओ। जब से तुम्हें देखा है, मेरा मन मेरे अधीन नहीं है। मैं तब तक शांति न पाऊँगा जब तक तुम..”

कमला जोर से चीख उठी और बोली – “आपको ऐसी बातें कहते लज्जा नहीं आती? धिक्कार है आपकी शिक्षा को और धिक्कार आपकी विद्या को! इसी को आपने सभ्यता मान रखा है कि अपरिचित कुमारी से एकांत ढूँढ़ कर ऐसा घृणित प्रस्ताव करें। तुम्हारा यह साहस कैसे हो गया? तुमने मुझे क्या समझ रखा है? ‘सुखमय जीवन’ का लेखक और ऐसा घृणित चरित्र! चूल्लू भर पानी में डूब मरो। अपना काला मुँह मत दिखाओ। अभी चाचाजी को बुलाती हूँ”

मैं सुनता जा रहा था क्या मैं स्वप्न देख रहा हूँ? यह अग्नि-वर्षा मेरे किस अपराध पर? तो भी मैंने हाथ नहीं छोड़ा। कहने लगा, “सुनो कमला, यदि तुम्हारी कृपा हो जाय, तो सुखमय जीवन..”

“देखा तेरा सुखमय जीवन! आस्तीन के साँप! पापात्मा!! मैंने साहित्य-सेवी जान कर और ऐसे उच्च विचारों का लेखक समझ कर तुझे अपने घर में घुसने दिया और तेरा विश्‍वास और सत्कार किया था। प्रच्छन्नपापिन! वकदांभिक! बिड़ालव्रतिक! मैंने तेरी सारी बातें सुन ली हैं”-  चाचाजी आ कर लाला-लाल आँखें दिखाते हुए, क्रोध से काँपते हुए कहने लगे – “शैतान, तुझे यहाँ आ कर माया-जाल फैलाने का स्थान मिला। उफ़्फ़! मैं तेरी पुस्तक से छला गया। पवित्र जीवन की प्रशंसा में फार्मों-के-फार्म काले करनेवाले, तेरा ऐसा हृदय! कपटी! विष के घड़े…”

उनका धाराप्रवाह बंद ही नहीं होता था, पर कमला की गालियाँ और थीं और चाचाजी की और। मैंने भी गुस्से में आ कर कहा, “बाबू साहब, ज़बान सँभाल कर बोलिए। आपने अपनी कन्या को शिक्षा दी है और सभ्यता सिखाईं है, मैंने भी शिक्षा पाई है और कुछ सभ्यता सीखी है। आप धर्म-सुधारक है। यदि मैं उसके गुण रूपों पर आसक्‍त हो गया, तो अपना पवित्र प्रणय उसे क्यों न बताऊँ? पुराने ढर्रे के पिता दुराग्रही होते सुने गए हैं। आपने क्यों सुधार का नाम लजाया है?”

“तुम सुधार का नाम मत लो। तुम तो पापी हो। ‘सुखमय जीवन’ के कर्ता होकर..”

“भाड़ में जाय ‘सुखमय जीवन’! उसी के मारे नाकों दम है!! ‘सुखमय जीवन’ के कर्ता ने क्या यह शपथ खा ली है कि जनम-भर कुँवारा ही रहे? क्या उसे प्रेमभाव नहीं हो सकता? क्या उसमें हृदय नहीं होता?”

“हें, जनम-भर कुँवारा?”

“हें काहे की? मैं तो आपकी पुत्री से निवेदन कर रहा था कि जैसे उसने मेरा हृदय हर लिया है वैसे यदि अपना हाथ मुझे दे, तो उसके साथ ‘सुखमय जीवन’ के उन आदर्शों का प्रत्यक्ष अनुभव करुँ, जो अभी तक मेरी कल्पना में है। पीछे हम दोनों आपकी आज्ञा माँगने आते। आप तो पहले ही दुर्वासा बन गए”

“तो आपका विवाह नहीं हुआ? आपकी पुस्तक से तो जान पड़ता है कि आप कई वर्षों के गृहस्थ-जीवन का अनुभव रखते हैं। तो कमला की माता ही सच्ची थीं”

इतनी बातें हुई थीं, पर न मालूम क्यों मैंने कमला का हाथ नहीं छोड़ा था। इतनी गर्मी के साथ शास्त्रार्थ हो चुका था, परंतु वह हाथ जो क्रोध के कारण लाल हो गया था, मेरे हाथ में ही पकड़ा हुआ था। अब उसमें सात्विक भाव का पसीना आ गया था और कमला ने लज्जा से आँखें नीची कर ली थीं। विवाह के पीछे कमला कहा करती है कि न मालूम विधाता की किस कला से उस समय मैंने तुम्हें झटक कर अपना हाथ नहीं खेंच लिया। मैंने कमला के दोनों हाथ खैंच कर अपने हाथों के संपुट में ले लिए (और उसने उन्हें हटाया नहीं!) और इस तरह चारों हाथ जोड़ कर वृद्ध से कहा-

“चाचाजी, उस निकम्मी पोथी का नाम मत लीजिए। बेशक, कमला की माँ सच्ची हैं। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ अधिक पहचान सकती हैं कि कौन अनुभव की बातें कह रहा है और कौन हाँक रहा है। आपकी आज्ञा हो, तो कमला और मैं दोनों सच्चे सुखमय जीवन का आरंभ करें। दस वर्ष पीछे मैं जो पोथी लिखूँगा, उसमें किताबी बातें न होंगी, केवल अनुभव की बातें होगी”

वृद्ध ने जेब से रूमाल निकाल कर चश्मा पोंछा और अपनी आँखें पोंछीं। आँखों पर कमला की माता की विजय होने के क्षोभ के आँसू थे, या घर बैठी पुत्री को योग्य पात्र मिलने के हर्ष के आँसू, राम जाने।

उन्होंने मुस्करा कर कमला से कहा, ‘दोनों मेरे पीछे-पीछे चले आओ। कमला! तेरी माँ ही सच कहती थी”-

वृद्ध बँगले की ओर चलने लगे। उनकी पीठ फिरते ही कमला ने आँखें मूँद कर मेरे कंधे पर सिर रख दिया।

समाप्त

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