घनी कहानी, छोटी शाखा: बंग महिला राजेंद्रबाला घोष की लिखी कहानी “दुलाईवाली” का दूसरा भाग

(हिंदी की पहली कहानी कौन-सी है? इस सवाल पर अलग-अलग जानकारों के अलग-अलग मत हैं..और उन मतों के अनुसार ही कुछ कहानियों को हिंदी की पहली कहानी माना जाता है। कुछ दिनों से आप “घनी कहानी छोटी शाखा” में पढ़ रहे हैं, ऐसी ही कुछ कहानियों को, जो मानी जाती हैं हिंदी की पहली कहानियों में से एक..इन दिनों आप पढ़ रहे हैं “बंग महिला राजेंद्रबाला घोष” की लिखी कहानी “दुलाईवाली”..आज पढ़िए दूसरा भाग)

दुलाई वाली- बंग महिला राजेंद्र बाला घोष 
 भाग-2
 
(अब तक आपने पढ़ा…इलाहाबाद के रहने वाले बंशीधर अपनी पत्नी जानकी को उसके मायक़े से वापस ले जाने के लिए बनारस आए हुए हैं..उनके ससुराल में सास और एक साला-साली हैं..बंशीधर का लगाव अपने ममेरे भाई नवलकिशोर से इतना है कि उनके बुलाने पर ये अपनी पत्नी को जल्दी विदा करवाकर ले जा रहे हैं। जानकी की बातों से ज़ाहिर होता है कि नवलकिशोर का स्वभाव  मज़ाक़िया है जो जानकी को बिलकुल भाता नहीं है। इधर विदा करवाने के लिए बंशीधर इक्का ले आते हैं और विदाई के आँसू पोंछती जानकी उनके साथ स्टेशन तक पहुँच गयी है। राजघाट से मुग़लसराय पहुँचे बंशीधर को नवलकिशोर मिलते ही नहीं, जबकि उनका यहीं मिलना तय था। अब आगे…)

बंशीधर एक बार चलती गाड़ी ही में शुरू से आखिर तक देख गये, पर नवल का कहीं पता नहीं। बंशीधर फिर सब गाड़ियों को दोहरा गये, तेहरा गये, भीतर घुस-घुसकर एक-एक डिब्बे को देखा किंतु नवल न मिले। अंत को आप खिजला उठे, और सोचने लगे कि मुझे तो वैसी चिट्ठी लिखी, और आप न आया। मुझे अच्छा उल्लू बनाया। अच्छा जाएँगे कहाँ? भेंट होने पर समझ लूँगा।

सबसे अधिक सोच तो इस बात का था कि जानकी सुनेगी तो ताने पर ताना मारेगी। पर अब सोचने का समय नहीं। रेल की बात ठहरी, बंशीधर झट गये और जानकी को लाकर जनानी गाड़ी में बिठाया। वह पूछने लगी, “नवल की बहू कहाँ है?”

“वह नहीं आये, कोई अटकाव हो गया,” कहकर आप बगल वाले कमरे में जा बैठे। टिकट तो ड्योढ़े का था; पर ड्योढ़े दरजे का कमरा कलकत्ते से आनेवाले मुसाफिरों से भरा था, इसलिए तीसरे दरजे में बैठना पड़ा। जिस गाड़ी में बंशीधर बैठे थे उसके सब कमरों में मिलाकर कल दस-बारह ही स्त्री-पुरुष थे। समय पर गाड़ी छूटी। नवल की बातें, और न-जाने क्या अगड़-बगड़ सोचते गाड़ी कई स्टेशन पार करके मिरजापुर पहुँची।

मिरजापुर में पेटराम की शिकायत शुरू हुई। उसने सुझाया कि इलाहाबाद पहुँचने में अभी देरी है। चलने के झंझट में अच्छी तरह उसकी पूजा किए बिना ही बंशीधर ने बनारस छोड़ा था। इसलिए आप झट प्लेटफार्म पर उतरे, और पानी के बम्बे से हाथ-मुँह धोकर, एक खोंचेवाले से थोड़ी-सी ताजी पूड़ियाँ और मिठाई लेकर, निराले में बैठ आपने उन्हें ठिकाने पहुँचाया। पीछे से जानकी की सुध आयी। सोचा कि पहले पूछ लें, तब कुछ मोल लेंगे, क्योंकि स्त्रियाँ नटखट होती हैं। वे रेल पर खाना पसंद नहीं करतीं। पूछने पर वही बात हुई। तब बंशीधर लौटकर अपने कमरे में आ बैठे। यदि वे चाहते तो इस समय ड्योढ़े में बैठ जाते; क्योंकि अब भीड़ कम हो गयी थी। पर उन्होंने कहा, थोड़ी देर के लिए कौन बखेड़ा करे।

बंशीधर अपने कमरे में बैठे तो दो-एक मुसाफिर अधिक देख पड़े। आगेवालों में से एक उतर भी गया था। जो लोग थे सब तीसरे दरजे के योग्य जान पड़ते थे; अधिक सभ्य कोई थे तो बंशीधर ही थे। उनके कमरे के पास वाले कमरे में एक भले घर की स्त्री बैठी थी। वह बेचारी सिर से पैर तक ओढ़े, सिर झुकाए एक हाथ लंबा घूँघट काढ़े, कपड़े की गठरी-सी बनी बैठी थी, बंशीधर ने सोचा इनके संग वाले भद्र पुरुष के आने पर उनके साथ बातचीत करके समय बितावेंगे। एक-दो करके तीसरी घण्टी बजी। तब वह स्त्री कुछ अकचकाकर, थोड़ा-सा मुँह खोल, जँगले के बाहर देखने लगी। ज्यों ही गाड़ी छूटी, वह मानो काँप-सी उठी। रेल का देना-लेना तो हो ही गया था। अब उसको किसी की क्या परवा? वह अपनी स्वाभाविक गति से चलने लगी। प्लेनटफार्म पर भीड़ भी न थी। केवल दो-चार आदमी रेल की अंतिम विदाई तक खड़े थे। जब तक स्टेशन दिखलाई दिया तब तक वह बेचारी बाहर ही देखती रही। फिर अस्पष्ट स्वर से रोने लगी। उस कमरे में तीन-चार प्रौढ़ा ग्रामीण स्त्रिेयाँ भी थीं। एक, जो उसके पास ही थी, कहने लगी – “अरे इनकर मनई तो नाहीं आइलेन। हो देखहो, रोवल करथईन”

दूसरी, “अरे दूसर गाड़ी में बैठा होंइहें”

पहली, “दुर बौरही! ई जनानी गाड़ी थोड़े है”

दूसरी, “तऊ हो भलू तो कहू” कहकर दूसरी भद्र महिला से पूछने लगी, “कौन गाँव उतरबू बेटा! मीरजैपुरा चढ़ी हऊ न?” इसके जवाब में उसने जो कहा सो वह न सुन सकी।

तब पहली बोली, “हट हम पुँछिला न; हम कहा कहाँ ऊतरबू हो? आँय ईलाहाबास?”

दूसरी, “ईलाहाबास कौन गाँव हौ गोइयाँ?”

पहली, “अरे नाहीं जनँलू? पैयाग जी, जहाँ मनई मकर नहाए जाला”

दूसरी, “भला पैयाग जी काहे न जानी; ले कहैके नाहीं, तोहरे पंच के धरम से चार दाँई नहाय चुकी हँई। ऐसों हो सोमवारी, अउर गहन, दका, दका, लाग रहा तउन तोहरे काशी जी नाहाय गइ रहे”

पहली, “आवे जाय के तो सब अऊते जाता बटले बाटेन। फुन यह साइत तो बिचारो विपत में न पड़ल बाटिली। हे हम पंचा हइ; राजघाट टिकस कटऊली; मोंगल के सरायैं उतरलीह; होद पुन चढ़लीह”

दूसरी, “ऐसे एक दाँई हम आवत रहे। एक मिली औरो मोरे संघे रही। दकौने टिसनीया पर उकर मलिकवा उतरे से कि जुरतँइ हैं गड़िया खुली। अब भइया ऊगरा फाड़-फाड़ नरियाय, ए साहब, गड़िया खड़ी कर! ए साहेब, गड़िया तँनी खड़ी कर! भला गड़िया दहिनाती काहै के खड़ी होय?”

पहली, “उ मेहररुवा बड़ी उजबक रहल। भला केहू के चिल्लाये से रेलीऔ कहूँ खड़ी होला?”

इसकी इस बात पर कुल कमरे वाले हँस पड़े। अब जितने पुरुष-स्त्रियाँ थीं, एक से एक अनोखी बातें कहकर अपने-अपने तजुरबे  बयान करने लगीं। बीचबीच में उस अकेली अबला की स्थिति पर भी दु:ख प्रकट करती जाती थीं।

तीसरी स्त्री बोली, “टीक्कसिया पल्ले बाय क नाँही। हे सहेबवा सुनि तो कलकत्ते ताँई ले मसुलिया लेई। अरे-इहो तो नाँही कि दूर से आवत रहले न, फरागत के बदे उतर लेन”

चौथी, “हम तो इनके संगे के आदमी के देखबो न किहो गोइयाँ”

तीसरी, “हम देखे रहली हो, मजेक टोपी दिहले रहलेन को”

इस तरह उनकी बेसिर-पैर की बातें सुनते-सुनते बंशीधर ऊब उठे। तब वे उन स्त्रियों से कहने लगे, “तुम तो नाहक उन्हें और भी डरा रही हो। जरूर इलाहाबाद तार गया होगा और दूसरी गाड़ी से वे भी वहाँ पहुँच जाएँगे। मैं भी इलाहाबाद ही जा रहा हूँ। मेरे संग भी स्त्रियाँ हैं। जो ऐसा ही है तो दूसरी गाड़ी के आने तक मैं स्टेशन ही पर ठहरा रहूँगा, तुम लोगों में से यदि कोई प्रयाग उतरे तो थोड़ी देर के लिए स्टेशन पर ठहर जाना। इनको अकेला छोड़ देना उचित नहीं। यदि पता मालूम हो जाएगा तो मैं इन्हें इनके ठहरने के स्थान पर भी पहुँचा दूँगा”

बंशीधर की इन बातों से उन स्त्रियों की वाक्-धारा दूसरी ओर बह चली, “हाँ, यह बात तो आप भली कही”

“नाहीं भइया! हम पंचे काहिके केहुसे कुछ कही। अरे एक के एक करत न बा तो दुनिया चलत कैसे बा?” इत्यादि ज्ञानगाथा होने लगी।

कोई-कोई तो उस बेचारी को सहारा मिलते देख खुश हुए और कोई-कोई नाराज भी हुए, क्यों, सो मैं नहीं बतला सकती। उस गाड़ी में जितने मनुष्य थे, सभी ने इस विषय में कुछ-न-कुछ कह डाला था। पिछले कमरे में केवल एक स्त्री जो फरासी छींट की दुलाई ओढ़े अकेली बैठी थी, कुछ नहीं बोली। कभी-कभी घूँघट के भीतर से एक आँख निकालकर बंशीधर की ओर वह ताक देती थी और, सामना हो जाने पर, फिर मुँह फेर लेती थी। बंशीधर सोचने लगे कि, “यह क्या बात है? देखने में तो यह भले घर की मालूम होती है, पर आचरण इसका अच्छा नहीं”

क्रमशः

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