घनी कहानी, छोटी शाखा: मुंशी प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ का चौथा भाग..

ईदगाह (मुंशी प्रेमचंद)
भाग -चार

(अब तक आपने पढ़ा..हामिद अपने दोस्तों और कुछ बड़ों के साथ अपनी दादी अमीना से तीन पैसे साथ लिए ईदगाह आया है। ईद की रौनक़ बाज़ार में झलक रही है। हामिद के साथी बाज़ार में तरह-तरह की मिठाइयाँ खाते हैं और हामिद को अलग-लग तरह से ललचाते हैं, सभी कुछ न कुछ खिलौने लेते हैं, जिन्हें देखकर हामिद का मन ललचाता तो है लेकिन वो अपने तीन पैसों को इन सारी चीज़ों में नहीं लुटाना चाहता, बस इसलिए कभी तर्क से तो कभी सहकर वो अपने दोस्तों के साथ बना हुआ है। इतनी देर से ख़ुद पर क़ाबू रखते हामिद को जब रास्ते में लोहे के सामान की एक दुकान में चिमटा नज़र आता है तो उसे अपनी दादी की याद आती है, जिनका हाथ रोटियाँ सेंकते जल जाया करता है। किसी तरह दुकानदार को तीन पैसे में चिमटा बेचने पर राज़ी कर, हामिद चिमटा मोल ले लेता है। इस पर सभी बच्चे उसका मज़ाक़ उड़ाते हैं। लेकिन हामिद अपनी चतुराई से चिमटे को उनके खिलौने से बेहतर बताने के तर्क पेश करता है। सभी एक बार को चुप्पी साध लेते हैं पर वो हामिद और उसके चिमटे से हार मानने को तैयार नहीं हैं और बच्चों के बीच का ये वाद-विवाद अब भी जारी है। अब आगे..)

अब बालकों के दो दल हो गए हैं। मोहसिन, महमूद, सम्मी और नूरे एक तरफ़ हैं, हामिद अकेला दूसरी तरफ़। शास्त्रार्थ हो रहा है, सम्मी तो विधर्मी होगया! दूसरे पक्ष से जा मिला, लेकिन मोहसिन, महमूद और नूरे भी हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं। उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक़्त अपने को फौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोई शेर आ जाए, मियाँ भिश्ती के छक्के छूट जाऍं, जो मियाँ सिपाही मिट्टी की बंदूक छोड़कर भागे, वक़ील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुँह छिपाकर ज़मीन पर लेट जाऍं। मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रूस्तमे-हिंद लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जाएगा और उसकी ऑंखे निकाल लेगा।
मोहसिन ने एड़ी—चोटी का ज़ोर लगाकर कहा—अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता?
हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा—भिश्ती को एक डाँट बताएगा, तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।
मोहसिन परास्त हो गया, पर महमूद ने कुमुक पहुँचाई—अगर बच्चा पकड़ जाऍं तो अदालत में बॅधे-बँधे फिरेंगे। तब तो वक़ील साहब के पैरों पड़ेंगे।
हामिद इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा—“हमें पकड़ने कौन आएगा?”
नूरे ने अकड़कर कहा—“यह सिपाही बंदूकवाला”
हामिद ने मुँह चिढ़ाकर कहा—“यह बेचारे हम बहादुर रूस्तमे-हिंद को पकड़ेगें! अच्छा लाओ, अभी जरा कुश्ती हो जाए। इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे। पकड़ेगें क्या बेचारे!”
मोहसिन को एक नई चोट सूझ गई—“तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज़ आग में जलेगा”
उसने समझा था कि हामिद लाजवाब हो जाएगा, लेकिन यह बात न हुई, हामिद ने तुरंत जवाब दिया—“आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब, तुम्हारे यह वक़ील , सिपाही और भिश्ती लौंडियों की तरह घर में घुस जाऍंगे। आग में वह काम है, जो यह रूस्तमे-हिन्द ही कर सकता है”
महमूद ने एक जोर लगाया—“वक़ील साहब कुर्सी-मेज़ पर बैठेंगे, तुम्हारा चिमटा तो बावर्चीख़ाने में ज़मीन पर पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?”
इस तर्क ने सम्मी और नूरे को भी राज़ी कर दिया! कितने ठिकाने की बात कही है पट्ठे ने! चिमटा बावर्चीख़ाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?”
हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा, तो उसने धाँधली शुरू की—“मेरा चिमटा बावर्चीख़ाने में नहीं रहेगा, वक़ील साहब कुर्सी पर बैठेगें, तो जाकर उन्हें ज़मीन पर पटक देगा और उनका क़ानून उनके पेट में डाल देगा”
बात कुछ बनी नही। ख़ाली गाली-गलौज थी, लेकिन क़ानून को पेट में डालनेवाली बात छा गई। ऐसी छा गई कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए मानो कोई धेलचा कनकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गया हो। क़ानून मुँह से बाहर निकलने वाली चीज है, उसको पेट के अन्दर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती है हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रूस्तमे-हिन्द है, अब इसमें मोहसिन, महमूद नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती।
विजेता को हारनेवालों से जो सत्कार मिलना स्वाभाविक है, वह हामिद को भी मिला। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे खर्च किए, पर कोई काम की चीज़ न ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाऍंगी। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों?
संधि की शर्ते तय होने लगीं। मोहसिन ने कहा—ज़रा अपना चिमटा दो, हम भी देखें। तुम हमारा भिश्ती लेकर देखो। महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए।
हामिद को इन शर्तों को मानने में कोई आपत्ति न थी। चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया, और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने ख़ूबसूरत खिलौने हैं।
हामिद ने हारने वालों के ऑंसू पोंछे—“मैं तुम्हें चिढ़ा रहा था, सच! यह चिमटा भला, इन खिलौनों की क्या बराबरी करेगा, मालूम होता है, अब बोले, अब बोले”
लेकिन मोहसिन की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। चिमटे का सिल्का ख़ूब बैठ गया है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है।
मोहसिन—“लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा?”
महमूद—“दुआ को लिए फिरते हो। उल्टे मार न पड़े। अम्मां जरूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने मिले?”
हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की माँ इतनी ख़ुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। तीन पैसों ही में तो उसे सब-कुछ करना था और उन पैसों के इस उपाय पर पछतावे की बिल्कुल ज़रूरत न थी। फिर अब तो चिमटा रूस्तमे-हिन्द है और सभी खिलौनों का बादशाह।
रास्ते में महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने केले खाने को दिए, महमूद ने केवल हामिद को साझी बनाया। उसके अन्य मित्र मुँह ताकते रह गए। यह उस चिमटे का प्रसाद था।

क्रमशः

[फ़ीचर्ड इमेज (फ़ोटो क्रेडिट): प्रियंका शर्मा]

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