घनी कहानी, छोटी शाखा: आचार्य चतुरसेन की कहानी ‘न मालूम सी एक ख़ता’ का पहला भाग

न मालूम सी एक ख़ता- आचार्य चतुरसेन
भाग-1

गर्मी के दिन थे। बादशाह ने उसी फागुन में सलीमा से नई शादी की थी। सल्तनत के झंझटों से दूर रहकर नई दुल्हन के साथ प्रेम और आनंद की कलोल करने वे सलीमा को लेकर कश्मीर के दौलतख़ाने में चले आए थे।

रात दूध में नहा रही थी। दूर के पहाडों की चोटियाँ बर्फ़ से सफ़ेद होकर चाँदनी में बहार दिखा रही थीं। आरामबाग़ के महलों के नीचे पहाड़ी नदी बल खाकर बह रही थी। मोतीमहल के एक कमरे में शमादान जल रहा था और उसकी खुली खिडकी के पास बैठी सलीमा रात का सौंदर्य निहार रही थी।

खुले हुए बाल उसकी फ़िरोज़ी रंग की ओढ़नी पर खेल रहे थे। चिकन के काम से सजी और मोतियों से गुँथी हुई फ़िरोज़ी रंग की ओढ़नी पर, कसी कमखाब की कुरती और पन्नों की कमरपेटी पर अंगूर के बराबर बड़े मोतियों की माला झूम रही थी। सलीमा का रंग भी मोती के समान था। उसकी देह की गठन निराली थी। संगमरमर के समान पैरों में ज़री के काम के जूते पडे थे, जिन पर दो हीरे दक-दक चमक रहे थे।

कमरे में एक क़ीमती ईरानी क़ालीन का फ़र्श बिछा हुआ था, जो पैर रखते ही हाथ-भर नीचे धँस जाता था। सुगंधित मसालों से बने शमादान जल रहे थे। कमरे में चार पूरे क़द के आईने लगे थे। संगमरमर के आधारों पर सोने-चाँदी के फूलदानों में ताज़े फूलों के गुलदस्ते रखे थे। दीवारों और दरवाज़ों पर चतुराई से गुँथी हुई नागकेसर और चम्पे की मालाएँ झूल रही थीं, जिनकी सुगंध से कमरा महक रहा था। कमरे में अनगिनत बहुमूल्य कारीगरी की देश-विदेश की वस्तुएँ क़रीने से सजी हुई थीं।

बादशाह दो दिन से शिकार को गए थे। इतनी रात होने पर भी नहीं आए थे। सलीमा खिड़की में बैठी प्रतीक्षा कर रही थी। सलीमा ने उकताकर दस्तक दी। एक बांदी दस्तबस्ता हाज़िर हुई।

बांदी सुंदर और कमसिन थी। उसे पास बैठने का हुक़्म देकर सलीमा ने कहा-

“साक़ी, तुझे बीन अच्छी लगती है या बाँसुरी?”

बांदी ने नम्रता से कहा- “हुज़ूर जिसमें ख़ुश हों।

सलीमा ने कहा- “पर तू किसमें ख़ुश है?”

बांदी ने कम्पित स्वर में कहा- “सरकार! बांदियों की ख़ुशी ही क्या!”

सलीमा हँसते-हँसते लोट गई। बांदी ने बंसी लेकर कहा- “क्या सुनाऊँ?”

बेगम ने कहा- “ठहर, कमरा बहुत गरम मालूम देता है, इसके तमाम दरवाज़े और खिड़कियाँ खोल दे। चिरागों को बुझा दे, चटखती चाँदनी का लुत्फ़ उठाने दे और वे फूलमालाएँ मेरे पास रख दे”

बांदी उठी।

सलीमा बोली- “सुन, पहले एक गिलास शरबत दे, बहुत प्यासी हूँ”

बांदी ने सोने के गिलास में ख़ूशबूदार शरबत बेगम के सामने ला धरा।

बेगम ने कहा- “उफ़्फ़! यह तो बहुत गर्म है। क्या इसमें गुलाब नहीं दिया?”

बांदी ने नम्रता से कहा- “दिया तो है सरकार!”

“अच्छा, इसमें थोडा सा इस्तम्बोल और मिला”

साक़ी गिलास लेकर दूसरे कमरे में चली गई। इस्तम्बोल मिलाया और भी एक चीज़ मिलाई। फिर वह सुवासित मदिरा का पात्र बेगम के सामने ला धरा।

एक ही साँस में उसे पीकर बेगम ने कहा- “अच्छा, अब सुन। तूने कहा था कि तू मुझे प्यार करती है; सुना, कोई प्यार का ही गाना सुना”

इतना कह और गिलास को गलीचे पर लुढ़काकर मदमाती सलीमा उस कोमल मखमली मसनद पर ख़ुद भी लुढ़क गई और रस-भरे नेत्रों से साक़ी की ओर देखने लगी। साक़ी ने बंसी का सुर मिलाकर गाना शुरू किया :

“दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी…”

बहुत देर तक साक़ी की बंसी कंठ ध्वनि कमरे में घूम-घूमकर रोती रही। धीरे-धीरे साक़ी ख़ुद भी रोने लगी। साक़ी मदिरा और यौवन के नशे में चूर होकर झूमने लगी।

गीत खत्म करके साक़ी ने देखा, सलीमा बेसुध पड़ी है। शराब की तेज़ी से उसके गाल एकदम सुर्ख़ हो गए हैं और ताम्बुल-राग रंजित होंठ रह-रहकर फड़क रहे हैं। साँस की सुगंध से कमरा महक रहा है। जैसे मंद पवन से कोमल पत्ती काँपने लगती है, उसी प्रकार सलीमा का वक्षस्थल धीरे-धीरे काँप रहा है। प्रस्वेद की बूँदें ललाट पर दीपक के उज्ज्वल प्रकाश में मोतियों की तरह चमक रही हैं।

बंसी रखकर साक़ी क्षणभर बेगम के पास आकर खड़ी हुई। उसका शरीर काँपा, ऑंखें जलने लगी, कंठ सूख गया। वह घुटने के बल बैठकर बहुत धीरे-धीरे अपने आँचल से बेगम के मुख का पसीना पोंछने लगी। इसके बाद उसने झुककर बेगम का मुँह चूम लिया।

फिर ज्यों ही उसने अचानक ऑंख उठाकर देखा, तो पाया ख़ुद दीन-दुनिया के मालिक शाहजहाँ खड़े उसकी यह करतूत अचरज और क्रोध से देख रहे हैं।

साक़ी को साँप डस गया। वह हतबुध्दि की तरह बादशाह का मुँह ताकने लगी।

क्रमशः

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!