एक शाइर, सौ शेर: कैफ़ी आज़मी

1-
की है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ
थोड़ा सा प्यारा भी मुझे दे दो सज़ा के साथ

2-
मंज़िल से वो भी दूर था और हम भी दूर थे
हमने भी धूल उड़ाई बहुत रहनुमा के साथ

3-
ऐसा लगा ग़रीबी की रेखा से हूँ बुलंद
पूछा किसी ने हाल कुछ ऐसी अदा के साथ

5-
गुज़रने को तो हज़ारों ही क़ाफ़िले गुज़रे
ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम बस किसी किसी का रहा

5-
जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा
बिछड़ के उनसे सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा

6-
झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

7-
तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता
मिरी तरह तिरा दिल बेक़रार है कि नहीं

8-
तिरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को
तुझे भी अपने पे ये एतबार है कि नहीं

9-
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो

10-
आँखों में नमी हँसी लबों पर
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो

11-
जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है
तुम क्यूँ उन्हें छेड़े जा रहे हो

12-
शोर यूँही न परिंदों ने मचाया होगा
कोई शहर की तरफ़ जंगल से आया होगा

13-
पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा

14-
बिजली के तार पर बैठा हुआ हँसता पंछी
सोचता है कि वो जंगल तो पराया होगा

15-
आज सोचा तो आँसू भर आए
मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए

16-
हर क़दम पर उधर मुड़ के देखा
उनकी महफ़िल से हम उठ तो आए

17-
रह गई ज़िंदगी दर्द बन के
दर्द दिल में छुपाए छुपाए

18-
दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं
याद इतना भी कोई न आए

19-
दीवाना पूछता है ये लहरों से बार-बार
कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गयीं

20-
अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ
वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गयीं

21-
पैमाना टूटने का कोई ग़म नहीं मुझे
ग़म है तो ये कि चाँदनी रातें बिखर गयीं

22-
पाया भी उनको खो भी दिया चुप भी हो रहे
इक मुख़्तसर सी रात में सदियाँ गुज़र गयीं

23-
जब उसने हार के ख़ंजर ज़मीं पे फेंक दिया
तमाम ज़ख़्म-ए-जिगर मुस्कुराए हैं क्या क्या

24-
छटा जहाँ से उस आवाज़ का घना बादल
वहीं से धूप ने तलवे जलाए हैं क्या क्या

25-
पत्थर के ख़ुदा वहाँ भी पाए
हम चाँद से आज लौट आए

26-
दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं
क्या हो गए मेहरबान साए

27-
जंगल की हवाएँ आ रही हैं
काग़ज़ का ये शहर उड़ न जाए

28-
मैं ढूँढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता

29-
नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए
नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता

30- वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता

31-
जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता

32-
खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता

33-
लग गया इक मशीन में मैं भी
शहर में ले के आ गया कोई

34-
ये सदी धूप को तरसती है
जैसे सूरज को खा गया कोई

35-
ऐसी महँगाई है कि चेहरा भी
बेच के अपना खा गया कोई

36-
अब वो अरमान हैं न वो सपने
सब कबूतर उड़ा गया कोई

37-
वो गए जब से ऐसा लगता है
छोटा मोटा ख़ुदा गया कोई

38-
मेरा बचपन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई

39-
इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

40-
जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

41-
मुद्दत के बा’द उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

42-
ख़ार-ओ-ख़स तो उठें रास्ता तो चले
मैं अगर थक गया क़ाफ़िला तो चले

43-
चाँद सूरज बुज़ुर्गों के नक़्श-ए-क़दम
ख़ैर बुझने दो उन को हवा तो चले

44-
उसको मज़हब कहो या सियासत कहो
ख़ुद-कुशी का हुनर तुम सिखा तो चले

45-
इतनी लाशें मैं कैसे उठा पाऊँगा
आप ईंटों की हुरमत बचा तो चले

46-
बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें
मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले

47-
सुना करो मिरी जाँ इन से उन से अफ़्साने
सब अजनबी हैं यहाँ कौन किस को पहचाने

48-
यहाँ से जल्द गुज़र जाओ क़ाफ़िले वालो
हैं मेरी प्यास के फूंके हुए ये वीराने

49-
बहार आए तो मेरा सलाम कह देना
मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने

50-
हुआ है हुक्म कि ‘कैफ़ी’ को संगसार करो
मसीह बैठे हैं छुप के कहाँ ख़ुदा जाने

51-
बस इक झिझक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में
कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में

52-
आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ
आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में

53- जुर्म है तेरी गली से सर झुकाकर लौटना
कुफ़्र है पथराव से घबराना तेरे शहर में

54- शाहनामे लिक्खे हैं खंडरात की हर ईंट पर
हर जगह है दफ़्न इक अफ़साना तेरे शहर में

55- नंगी सड़कों पर भटककर देख, जब मरती है रात
रेंगता है हर तरफ़ वीराना तेरे शहर में

56- दीवानावार चाँद से आगे निकल गए
ठहरा न दिल कहीं भी तेरी अंजुमन के बाद

57- होंटों को सी के देखिए पछताइयेगा आप
हंगामे जाग उठते हैं अक्सर घुटन के बाद

58- इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद

59- वो कभी धूप कभी छाँव लगे
मुझे क्या-क्या न मेरा गाँव लगे

60- किसी पीपल के तले जा बैठे
अब भी अपना जो कोई दाँव लगे

61- रोटी-रोज़ी की तलब जिसको कुचल देती है
उसकी ललकार भी एक सहमी हुई म्याँव लगे

62-जैसे देहात में लू लगती है चरवाहों को
बम्बई में यूँ ही तारों की हँसी छाँव लगे

63- तमाम जिस्म है बेदार, फ़िक्र ख़ाबीदा
दिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार सा है

64- सब अपने पाँव पे रख-रख के पाँव चलते हैं
ख़ुद अपने दोश पे हर आदमी सवार सा है

65- जिसे पुकारिए मिलता है इस खंडहर से जवाब
जिसे भी देखिए माज़ी के इश्तेहार सा है

66- हुई तो कैसे बियाबाँ में आके शाम हुई
कि जो मज़ार यहाँ है मेरे मज़ार सा है

67-कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है

68- ख़ून कहाँ बहता है इन्सान का पानी की तरह
जिस से तू रोज़ यहाँ करके वजू आती है?

69- धाज्जियाँ तूने नकाबों की गिनी तो होंगी
यूँ ही लौट आती है या कर के रफ़ू आती है

70- अपने सीने में चुरा लाई है किसे की आहें
मल के रुखसार पे किस किसका लहू आती है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!