डॉ वंदना वर्मा की कविता “चाँद”

मम्मी देखो न
ये चाँद टुकुर-टुकुर तकता है
मुँह से तो कुछ न बोले
पर मन ही मन हँसता है
चैन से मुझको सोने नहीं देता
ख़ुद सारी रात चलता है

मम्मी देख न
ये चाँद टुकुर-टुकुर तकता है
इसको भी चपत लगाओ
ख़ूब ज़ोर से डाँट लगाओ
मुझको नींद आती है
फिर ये सारी रात जगता है

मम्मी देखो न
ये चाँद टुकुर-टुकुर तकता हाई
ये नहीं स्थिर मन का
कभी घटता, कभी बढ़ता है
कभी आकाश में छुप जाता है
मुँह से तो कुछ न बोले
पर मन ही मन ये हँसता है
मम्मी देखो न
ये चाँद टुकुर-टुकुर तकता है

-डॉ. वंदना वर्मा

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