फ़िराक़ गोरखपुरी के 40 शेर

1. तुम्हें क्यूँकर बताएँ ज़िंदगी को क्या समझते हैं समझ लो साँस लेना ख़ुद-कुशी करना समझते हैं 2. बस इतने पर हमें सब लोग दीवाना...

एक शाइर, सौ शेर: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

1. दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार के, वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के 2. इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन देखे...

एक शाइर, सौ शेर: मिर्ज़ा ग़ालिब

1. फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं, फिर वही ज़िंदगी हमारी है 2. बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब' कुछ तो है जिसकी पर्दा-दारी है 3. हम...
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