दो शाइर, दो ग़ज़लें (22): मिर्ज़ा ग़ालिब और परवीन शाकिर…

मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल घर हमारा जो न रोते भी तो वीराँ होता बहर गर बहर न होता तो बयाबाँ होता तंगी-ए-दिल का गिला क्या

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दो शाइर, दो ग़ज़लें (21): जन्मदिन विशेष में मजरूह सुल्तानपुरी की ग़ज़लें

दो शा’इर, दो ग़ज़लें सिरीज़ में यूँ तो हम दो अलग-अलग शाइरों की ग़ज़लें पाठकों के लिए साझा करते हैं लेकिन आज मजरूह सुल्तानपुरी के

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दो शा’इर दो रूबाई (8): शाद अज़ीमाबादी और भारतेंदु हरिश्चंद्र

शाद अज़ीमाबादी की रूबाई चालाक हैं सब के सब बढ़ते जाते हैं अफ़्लाक-ए-तरक़्क़ी पे चढ़ते जाते हैं मकतब बदला किताब बदली लेकिन हम एक वही

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दो शा’इर दो रूबाई (12): अल्ताफ़ हुसैन हाली और फ़ानी बदायूँनी..

अल्ताफ़ हुसैन हाली की रुबाई हैं जहल में सब आलिम ओ जाहिल हम-सर, आता नहीं फ़र्क़ इस के सिवा उन में नज़र आलिम को है

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दो शाइर, दो नज़्में(11): हबीब जालिब और नून मीम राशिद

हबीब जालिब की नज़्म- औरत बाज़ार है वो अब तक जिस में तुझे नचवाया दीवार है वो अब तक जिस में तुझे चुनवाया दीवार को

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दो शा’इर, दो ग़ज़लें (20): दुष्यंत कुमार और मजाज़

दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल: ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो अब कोई ऐसा

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दो शा’इर दो रूबाई (11): जोश मलीहाबादी और नरेश कुमार शाद

जोश मलीहाबादी की रूबाई ग़ुंचे तेरी ज़िंदगी पे दिल हिलता है, सिर्फ़ एक तबस्सुम के लिए खिलता है ग़ुंचे ने कहा कि इस चमन में

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दो शाइर, दो नज़्में(10): कैफ़ी आज़मी और मुनीर नियाज़ी

कैफ़ी आज़मी की नज़्म- दाएरा रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे, फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को उन्हीं

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दो शा’इर दो रूबाई (10): शाद अज़ीमाबादी और जोश मलीहाबादी

शाद अज़ीमाबादी की रूबाई सौ तरह का मेरे लिए सामान क्या पूरा इक उम्र का अरमान क्या सय्यद से मिला प मदरसा भी देखा ‘हाली’

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