वही फिर मुझे याद आने लगे हैं …ख़ुमार बाराबंकवी

वही फिर मुझे याद आने लगे हैंजिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं वो हैं पास और याद आने लगे हैंमुहब्बत के होश अब ठिकाने लगे

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कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता …. निदा फ़ाज़ली

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो जहाँ उमीद हो इसकी

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