दो शा’इर दो रूबाई (8): शाद अज़ीमाबादी और भारतेंदु हरिश्चंद्र

शाद अज़ीमाबादी की रूबाई चालाक हैं सब के सब बढ़ते जाते हैं अफ़्लाक-ए-तरक़्क़ी पे चढ़ते जाते हैं मकतब बदला किताब बदली लेकिन हम एक वही

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दो शा’इर दो रूबाई (12): अल्ताफ़ हुसैन हाली और फ़ानी बदायूँनी..

अल्ताफ़ हुसैन हाली की रुबाई हैं जहल में सब आलिम ओ जाहिल हम-सर, आता नहीं फ़र्क़ इस के सिवा उन में नज़र आलिम को है

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दो शा’इर दो रूबाई (11): जोश मलीहाबादी और नरेश कुमार शाद

जोश मलीहाबादी की रूबाई ग़ुंचे तेरी ज़िंदगी पे दिल हिलता है, सिर्फ़ एक तबस्सुम के लिए खिलता है ग़ुंचे ने कहा कि इस चमन में

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दो शा’इर दो रूबाई (10): शाद अज़ीमाबादी और जोश मलीहाबादी

शाद अज़ीमाबादी की रूबाई सौ तरह का मेरे लिए सामान क्या पूरा इक उम्र का अरमान क्या सय्यद से मिला प मदरसा भी देखा ‘हाली’

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दो शा’इर दो रूबाई (6): मीर और सादिक़ैन

मीर तक़ी मीर की रूबाई तुम तो ऐ महरबान अनूठे निकले जब आन के पास बैठे रूठे निकले क्या कहिए वफ़ा एक भी वअ’दा न

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दो शा’इर दो रूबाई (5): ग़ालिब और फ़िराक़..

मिर्ज़ा ग़ालिब की रूबाई कहते हैं कि अब वो मर्दम-आज़ार नहीं उशशाक़ की पुरसिश से उसे आर नहीं जो हाथ कि ज़ुल्म से उठाया होगा

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दो शा’इर, दो रूबाई (4): सौदा और अनीस..

दो शा’इर, दो रूबाई सीरीज़ में आज हम मशहूर शा’इर मिर्ज़ा रफ़ी सौदा और महान शा’इर और उर्दू शा’इरी का शेक्सपियर कहलाये जाने वाले मीर

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दो शा’इर दो रूबाई (3): ग़ालिब और फ़िराक़..

मिर्ज़ा ग़ालिब की रूबाई दुःख जी के पसंद हो गया है ‘ग़ालिब’, दिल रुककर बन्द हो गया है ‘ग़ालिब’, वल्लाह कि शब् को नींद आती

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दो शा’इर, दो रूबाई(2) : सादिक़ैन और इस्माइल मेरठी..

सादिक़ैन की रूबाई बचपन में तुझे याद किया था मैंने, जब शे’र का कब लफ़्ज़ सुना था मैंने, इस पर नहीं मौक़ूफ़ रुबाई तुझ को

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दो शा’इर, दो रूबाई (1): मीर अनीस और अख़्तर अंसारी…

आज हम साहित्य दुनिया में रूबाई की सीरीज़ शुरू कर रहे हैं. दो शा’इर, दो रूबाई सीरीज़ में आज हम मर्सिया और रूबाई के महान

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