दो शाइर दो नज़्में

दो शाइर दो नज़्में शाइरी

दो शाइर, दो नज़्में(13): मजीद अमजद और अख़्तर-उल-ईमान

मजीद अमजद की नज़्म “मंटो” मैंने उस को देखा है उजली उजली सड़कों पर इक गर्द भरी हैरानी में फैलती भीड़ के औंधे औंधे कटोरों की तुग़्यानी में जब वो ख़ाली बोतल फेंक के कहता है ”दुनिया! तेरा हुस्न, यही बद-सूरती है” दुनिया उसको घूरती है शोर-ए-सलासिल बन कर गूँजने लगता है अँगारों भरी आँखों […]

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दो शाइर, दो नज़्में(12): मजाज़ और मख़दूम

असरार उल हक़ ‘मजाज़’ की नज़्म: बोल! अरी ओ धरती बोल! बोल! अरी ओ धरती बोल! राज सिंघासन डाँवाडोल बादल बिजली रैन अँधयारी दुख की मारी प्रजा सारी बूढ़े बच्चे सब दुखिया हैं दुखिया नर हैं दुखिया नारी बस्ती बस्ती लूट मची है सब बनिए हैं सब ब्योपारी बोल! अरी ओ धरती बोल! राज सिंघासन […]

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दो शाइर, दो नज़्में(11): हबीब जालिब और नून मीम राशिद

हबीब जालिब की नज़्म- औरत बाज़ार है वो अब तक जिस में तुझे नचवाया दीवार है वो अब तक जिस में तुझे चुनवाया दीवार को आ तोड़ें बाज़ार को आ ढाएँ इंसाफ़ की ख़ातिर हम सड़कों पे निकल आएँ मजबूर के सर पर है शाही का वही साया बाज़ार है वो अब तक जिस में […]

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दो शाइर, दो नज़्में(10): कैफ़ी आज़मी और मुनीर नियाज़ी

कैफ़ी आज़मी की नज़्म- दाएरा रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे, फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ रोज़ बसते हैं कई शहर नए रोज़ धरती में समा जाते हैं ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मी वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं […]

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दो शाइर, दो नज़्में(9): फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और अख़्तर-उल-ईमान

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म: बोल बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़बाँ अब तक तेरी है तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा बोल कि जाँ अब तक तेरी है देख कि आहन-गर की दुकाँ में तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहाने फैला हर इक ज़ंजीर का दामन बोल ये […]

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दो शाइर, दो नज़्में(7): परवीन शाकिर और फ़हमीदा रियाज़

परवीन शाकिर की नज़्म: नहीं मेरा आँचल मैला है नहीं मेरा आँचल मैला है और तेरी दस्तार के सारे पेच अभी तक तीखे हैं किसी हवा ने इनको अब तक छूने की जुरअत नहीं की है तेरी उजली पेशानी पर गए दिनों की कोई घड़ी पछतावा बन के नहीं फूटी और मेरे माथे की सियाही […]

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दो शाइर, दो नज़्में(6): जाँ निसार अख़्तर और जिगर श्योपुरी

जाँ निसार अख़्तर की नज़्म: तजज़िया मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन, फिर भी जब पास तू नहीं होती ख़ुद को कितना उदास पाता हूँ गुम से अपने हवास पाता हूँ जाने क्या धुन समाई रहती है इक ख़मोशी सी छाई रहती है दिल से भी गुफ़्तुगू नहीं होती मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन मैं तुझे […]

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दो शा’इर, दो नज़्में (3): फ़रहत एहसास और फ़हमीदा रियाज़

फ़रहत एहसास की नज़्म: ख़ुद-आगही वो कैसी तारीक घड़ी थी, जब मुझको एहसास हुआ था मैं तन्हा हूँ उस दिन भी सीधा-सादा सूरज निकला था शहर में कोई शोर नहीं था घर में कोई और नहीं था अम्माँ आटा गूँध रही थीं अब्बा चारपाई पर बैठे ऊँघ रहे थे धीरे-धीरे धूप चढ़ी थी और अचानक […]

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दो शा’इर, दो नज़्में (2): मख़दूम और फै़ज़…

मख़दूम मुहिउद्दीन की नज़्म: “चारागर” इक चमेली के मंडवे-तले मय-कदे से ज़रा दूर उस मोड़ पर दो बदन प्यार की आग में जल गए प्यार हर्फ़-ए-वफ़ा प्यार उन का ख़ुदा प्यार उन की चिता दो बदन ओस में भीगते चाँदनी में नहाते हुए जैसे दो ताज़ा-रौ ताज़ा-दम फूल पिछले-पहर ठंडी ठंडी सुबुक-रौ चमन की हवा […]

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दो शा’इर, दो नज़्में (1): परवीन शाकिर और सरदार जाफ़री…

साहित्य दुनिया में हम आज ‘दो शा’इर, दो नज़्में’ सीरीज़ शुरू’अ कर रहे हैं.आज हम परवीन शाकिर की नज़्म “ख्व़ाब” और अली सरदार जाफ़री की नज़्म “एक बात” आपके सामने पेश कर रहे हैं. परवीन शाकिर की नज़्म: ख्व़ाब खुले पानियों में घिरी लड़कियाँ, नर्म लहरों के छीॅंटे उड़ाती हुई, बात बे बात हँसती हुई, […]

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