दो शाइर, दो नज़्में(13): मजीद अमजद और अख़्तर-उल-ईमान

मजीद अमजद की नज़्म “मंटो” मैंने उस को देखा है उजली उजली सड़कों पर इक गर्द भरी हैरानी में फैलती भीड़ के औंधे औंधे कटोरों

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दो शाइर, दो नज़्में(12): मजाज़ और मख़दूम

असरार उल हक़ ‘मजाज़’ की नज़्म: बोल! अरी ओ धरती बोल! बोल! अरी ओ धरती बोल! राज सिंघासन डाँवाडोल बादल बिजली रैन अँधयारी दुख की

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दो शाइर, दो नज़्में(11): हबीब जालिब और नून मीम राशिद

हबीब जालिब की नज़्म- औरत बाज़ार है वो अब तक जिस में तुझे नचवाया दीवार है वो अब तक जिस में तुझे चुनवाया दीवार को

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दो शाइर, दो नज़्में(10): कैफ़ी आज़मी और मुनीर नियाज़ी

कैफ़ी आज़मी की नज़्म- दाएरा रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे, फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को उन्हीं

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दो शाइर, दो नज़्में(9): फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और अख़्तर-उल-ईमान

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म: बोल बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़बाँ अब तक तेरी है तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा बोल कि

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दो शाइर, दो नज़्में(7): परवीन शाकिर और फ़हमीदा रियाज़

परवीन शाकिर की नज़्म: नहीं मेरा आँचल मैला है नहीं मेरा आँचल मैला है और तेरी दस्तार के सारे पेच अभी तक तीखे हैं किसी

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दो शाइर, दो नज़्में(6): जाँ निसार अख़्तर और जिगर श्योपुरी

जाँ निसार अख़्तर की नज़्म: तजज़िया मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन, फिर भी जब पास तू नहीं होती ख़ुद को कितना उदास पाता हूँ गुम

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दो शा’इर, दो नज़्में (3): फ़रहत एहसास और फ़हमीदा रियाज़

फ़रहत एहसास की नज़्म: ख़ुद-आगही वो कैसी तारीक घड़ी थी, जब मुझको एहसास हुआ था मैं तन्हा हूँ उस दिन भी सीधा-सादा सूरज निकला था

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दो शा’इर, दो नज़्में (2): मख़दूम और फै़ज़…

मख़दूम मुहिउद्दीन की नज़्म: “चारागर” इक चमेली के मंडवे-तले मय-कदे से ज़रा दूर उस मोड़ पर दो बदन प्यार की आग में जल गए प्यार

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दो शा’इर, दो नज़्में (1): परवीन शाकिर और सरदार जाफ़री…

साहित्य दुनिया में हम आज ‘दो शा’इर, दो नज़्में’ सीरीज़ शुरू’अ कर रहे हैं.आज हम परवीन शाकिर की नज़्म “ख्व़ाब” और अली सरदार जाफ़री की

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