घनी कहानी, छोटी शाखा: चिनुआ अचेबे की कहानी “बंद राहें” का अंतिम भाग

बंद राहें चिनुआ अचेबे

भाग-2

(अब तक आपने पढ़ा..मायकल ओबी को बहुत कम उम्र में ही नड्यूम केंद्रीय विद्यालय के प्रधानाचार्य का पद मिलता है क्यूँकि उस विद्यालय को आगे बढ़ाने के लिए संस्था को ओबी की तरह के युवा और उत्साह से भरे व्यक्ति की आवश्यकता थी। ओबी भी इस मौक़े से काफ़ी उत्साहित थे और उनकी पत्नी नैंसी भी ख़ुश थीं लेकिन नैंसी को इस बात का अफ़सोस ज़रूर था कि वहाँ रहने वाले सभी शिक्षक युवा और अविवाहित थे। नैंसी मायकल के विचारों से शादी के इन दो सालों में ही प्रभावित हो चुकीं थी। इस मौक़े से दोनों के दो लक्ष्य थे एक तो विद्यालय में शिक्षा का सत्र सुधारना और दूसरा विद्यालय परिसर को ख़ूबसूरत बनाना। दोनों ने वहाँ पहुँचकर इस काम को अंजाम देना शुरू कर दिया था, विद्यालय परिसर में नैंसी का सजाया बग़ीचा लहराने लगा था। अब आगे..)

एक शाम जब ओबी विद्यालय परिसर में टहलते हुए सौंदय को निहार रहा था कि उसने देखा गाँव कि एक बूढ़ी महिला लंगड़ाते हुए विद्यालय परिसर में आयी और फूलों की एक क्यारी को लाँघकर, स्कूल की बाड़ पार करके जंगली देसी झाड़ियों में कहीं चली गयी। ओबी ने देखना चाहा तो वो महिला तो उसे नज़र नहीं आयी बल्कि गाँव की ओर से आती एक धूमिल पगडंडी ज़रूर नज़र आयी जो विद्यालय परिसर के बीच से निकलकर दूसरी ओर की झाड़ियों में गुम हो जाती थी।

“मुझे इस बात की हैरानी है कि आप लोगों ने गाँव वालों को विद्यालय परिसर के बीच से जाने से कभी नहीं रोका? आश्चर्य की बात है।“ ओबी ने एक शिक्षक से कहा जो वहाँ तीन साल से पढ़ा रहा था।

वो शिक्षक झेंपता हुआ बोला, “असल में ये गाँव वालों का बहुत ज़रूरी रास्ता है। वो कभी-कभी ही यहाँ से आते-जाते हैं लेकिन ये रास्ता उनके धार्मिक स्थान से जुड़ा हुआ है”

“लेकिन इसका स्कूल से क्या लेना-देना है?” ओबी ने कड़े शब्दों में पूछा

“अब इसका मुझे तो कुछ पता नहीं लेकिन ये मालूम है कि कुछ समय पहले जब गाँव वालों को हमने रोका था तो बहुत बड़ा हंगामा हुआ था” उस शिक्षक ने कंधे उचकाकर कहा

“कुछ समय पहले और आज में फ़र्क़ है। मान लो जिस दिन स्कूल का निरीक्षण हो उस दिन गाँव वाले बोलें लगें कि उन्हें अपने क़बीले के रीतिरिवाजों के लिए स्कूल का एक कमरा चाहिए, तो क्या हम उनकी ज़िद पूरी करेंगें?”

आख़िर विद्यालय परिसर से होकर जाने वाली उस पगडंडी में विध्यालय से प्रवेश पर रोक लगा दी गयी। प्रवेश और निकलने दोनों जगहों पर मोटी और भारी लकड़ियों की बाड़ लगा दी गयी और उसे कँटीली तारों से बाँध दिया गया। तीन दिन बाद क़बीले के गाँव का पुजारी एनी प्रधानाचार्य ओबी से मिलने आया। एक बूढ़ा और पीठ पर कूबड़ लिए वो अपने साथ एक मोटा डंडा लाया था। जब भी वो बात करते हुए कोई दलील देता तो उस बात पर बल देने के लिए आदतवश उस डंडे को ज़मीन से थपथपाता था।

शुरुआती शिस्तचर के बाद पुजारी बोला, “मुझे मालूम हुआ कि आपने हमारे पूर्वजों की पगडंडी को बंद करवा दिया है”

“हाँ..ये विद्यालय परिसर है और यहाँ मैं किसी सार्वजनिक रास्ते की इजाज़त नहीं दे सकता” ओबी ने कहा।

“देखो बेटा, ये रास्ता तुम्हारे ही नहीं, तुम्हारे पिता के जन्म से भी पहले से यहाँ मौजूद है। ये रास्ता हमारे गाँव के जीवन का आधार है। हमारे क़बीले में जब भी किसी की मृत्यु होती है तो वो सम्बंधी इसी रास्ते से जाता है और हमारे पूर्वज भी हमसे मिलने इसी रास्ते से आते हैं। इससे भी ज़्यादा ज़रूरी अगर कोई बात है तो वो ये कि जन्म लेने वाले बच्चों के आने का रास्ता भी यही है..”

ओबी ने पुजारी की बात एक संतुष्ट मुस्कान के साथ सुनी।

“हम यहाँ विद्यालय चलाते हैं और शिक्षा का मूल उद्देश्य है इस तरह के अंधविश्वासों से मुक्ति पाना। मेरा मना है कि जो इस दुनिया से जा चुके हैं उनके लिए किसी पगडंडी की आवश्यकता नहीं है। आपका ये विचार ही बकवास है। एक विद्यालय के प्रधानाचार्य होने के नाते ये मेरा कर्तव्य है कि मैं इन बच्चों को ऐसे हास्यास्पद विचारों से बचाऊँ और ये आपका फ़र्ज़ भी है” ओबी के कहते ही पुजारी बोल उठा

“हो सकता है कि आपकी बात सही हो लेकिन हम अपने पूर्वजों के रीति रिवाजों का पालन करते हैं। क्यों न हम एक-दूसरे की भावना का सम्मान करें। आप यदि ये रास्ता वापस खोल दें तो सब पहले की तरह चलता रहेगा और हमें आपस में झगड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। मेरा हमेशा से मानना है कि हमें मिलजुलकर रखना चाहिए” ये कहकर पुजारी जाने के लिए उठा

“मुझे माफ़ कीजिएगा लेकिन मैं विद्यालय परिसर में से कोई सार्वजनिक रास्ता बनाने की इजाज़त नहीं दे सकता। ये हमारे नियमों के ख़िलाफ़ है। बल्कि आप मेरी सलाह मानिए और अपने पूर्वजों के लिए विद्यालय के बग़ल से एक नया रास्ता बना लीजिए। हमारे स्कूल के विद्यार्थी इस काम में आपकी सहायता भी कर देंगे। मुझे नहीं लगता कि आपके मृतक पूर्वजों को इस नए रास्ते से आने-जाने में कोई परेशानी होगी” युवा प्रधानाचार्य ने कहा

“मुझे आपसे कुछ और नहीं कहना” ये कहकर पुजारी बाहर चला गया।

दो दिन बाद गाँव में प्रसव पीड़ा के दौरान एक युवती की मृत्यु हो गयी। जब गाँव के ओझा को बुलाकर इसका कारण जानने की सलाह की गयी तो उसने स्कूल परिसर के इर्द-गिर्द लगी कँटीली तारों वाली बाड़ को इसका ज़िम्मेदार बताया। उसका कहना था कि इस वजह से पूर्वजों का अपमान हुआ है और अब उन्हें प्रसन्न करने के लिए भारी बलि चढ़ानी होगी।

अगली सुबह ओबी की नींद खुली और उसने देखा कि स्कूल खंडहर में बदल चुका है। कँटीली तारों वाली बाड़ पूरी तरह तोड़ दी गयी थी। विदेशी झाड़ियों और रंग-बिरंगे फूलों वाला बग़ीचा तहस-नहस था। यहाँ तक कि विद्यालय का एक भाग भी मलबे में तब्दील हो चुका था।

उसी रोज़ एक निरीक्षक वहाँ आया और विद्यालय की ये हालत देखकर उसने प्रधानाचार्य ओबी के ख़िलाफ़ अपनी रिपोर्ट लिखी। बाड़ और बग़ीचे के तहस-नहस होने से ज़्यादा गम्भीर बात उसे ये लगी कि “नए प्रधानाचार्य ने अपनी ग़लत नीतियों से विद्यालय और गाँव वालों के बीच कबीलियाई- युद्ध की स्थिति पैदा कर दी थी”

शिक्षा का एक नया रास्ता निकालने का ओबी का सपना टूट चुका था और उसके इस सपने पर क़बीले के पूर्वजों की पगडंडी अपना रास्ता बना रही थी।

समाप्त

(चिनुआ अचेबे नायज़िरियन लेखक थे। 1953 में लिखी गयी उनकी कहानी “Dead men’s path” का हिंदी अनुवाद साहित्य दुनिया ने किया है)

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