आज की कहानी- पिंजरा

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आज की कहानी साहित्य दुनिया के लिए अरग़वान रब्बही ने लिखी है.
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तेज़ धूप में नाले से सटे सुनसान मैदान पर बिल्कुल किनारे खड़े होकर दो आदमी आपस में बहस कर रहे हैं…
“तू क्या समझता है अपने आपको?” आसमानी शर्ट और काली पैंट पहने आदमी ने कहा…
“देख, मेरा पैसा लौटा दे वर्ना अच्छा नहीं होगा,” जीन्स की पैंट और हाफ़ आस्तीन टीशर्ट पहने आदमी ने पलटकर कहा…
पहला आदमी- मैंने आधा पैसा दे दिया है, बाक़ी भी दे दूँगा…
दूसरा आदमी- मुझे अभी मेरा सारा पैसा चाहिए, तूने कहा था कि दो दिन में दे देगा, 2 महीने होने को आए हैं…
पहला आदमी- हाँ तो दे दूँगा न.. तेरा पैसा दिया न, भाग थोड़े रहा हूँ
पहले आदमी का अड़ियल रवैया देख दूसरे आदमी ने उसका गिरेबान पकड़ लिया….
“गिरेबान छोड़..”
“एक तो मैंने तुझ पे एहसान किया और तू मुझे ही आँख दिखा रहा है”
“मैं कह रहा हूँ गिरेबान छोड़..”, ऐसा कहते हुए उसने ज़ोर लगाया और दूसरा आदमी झटके से धक्का खाते हुए पीछे की ओर गिरा और फिसल कर नाले में गिर गया…
पहला आदमी उसे फिसलता देख हैरान सा हो गया, उसने नीचे झाँका तो वो नाले में बहकर अंदर की ओर जा रहा था…. उसने तेज़ आवाज़ लगाई
“सुनील…सुनील…सुनील”
वो भागता हुआ आगे की ओर गया और देखने लगा कि सुनील कहीं हो..
सुनील कहीं भी नज़र नहीं आ रहा था। आसपास कोई नहीं था, वो अकेला था… उसे कुछ समझ नहीं आया कि क्या करे…अचानक के ख़याल ने उसे हवास दिए और वो वहाँ से भागता हुआ सड़क की ओर आया….

थोड़ी दूर पैदल चला और कुछ दूर जाकर ऑटो किया… मन में हज़ारों बातें सोचते हुए वो किसी तरह अपने घर पहुँचा… चाबी लगाकर दरवाज़ा खोला और सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गया.. अपना सर पकड़ कर कुछ देर वो ख़ुद को कोसता रहा…
“ये क्या हो गया यार…ओह सुनील…भगवान”
बुरी तरह से उसके पसीने छूट रहे थे..बुरी तरह..

कुछ देर बाद…
वो कुर्सी से उठा… बाथरूम की तरफ़ बढ़ा
बाथरूम में जाकर उसने बेसिन की टोटी खोली और अपने चेहरे पर कई बार पानी डाला….थक कर उसने वहीं लगे आईने की तरफ़ देखा तो उसमें सुनील की शक्ल दिख रही थी… वो कभी आईने को साफ़ कर रहा था कभी अपने चहरे को छू रहा था.. वो पानी से बार-बार चेहरा धोता रहा, अंधेरा होने लगा, अंधेरा हो गया…

कृमश:

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