साहित्य दुनिया सीरीज़(2) : 10 शा’इर, 10 शे’र…

1.
ज़िक्र जब छिड़ गया क़यामत का
बात पहुँची तिरी जवानी तक

फ़ानी बदायूँनी

2.
कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा

अहमद फ़राज़

3.
आहटें सुन रहा हूँ यादों की
आज भी अपने इंतिज़ार में गुम

रसा चुग़तई

4.
इक रात वो गया था जहाँ बात रोक के
अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के

फ़रहत एहसास

5.
देखो वो भी हैं जो सब कह सकते थे
देखो उन के मुँह पर ताले अब भी हैं

ज़हरा निगाह

6.
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

मिर्ज़ा ग़ालिब

7.
आबाद अगर न दिल हो तो बरबाद कीजिए
गुलशन न बन सके तो बयाबाँ बनाइए

जिगर मुरादाबादी

(बयाबाँ – रेगिस्तान)

8.
इन्ही ग़म की घटाओं से ख़ुशी का चाँद निकलेगा
अँधेरी रात के पर्दे में दिन की रौशनी भी है

अख़्तर शीरानी

9.
वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेशतर वो करम कि था मिरे हाल पर,
मुझे सब है याद ज़रा ज़रा तुम्हें याद हो कि न याद हो

हकीम मोमिन ख़ाँ मोमिन

(बेशतर- अधिकतर)

10.
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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