साहित्य दुनिया सीरीज़(1) : 10 शा’इर, 10 शे’र…

1.
मुट्ठियों में ख़ाक लेकर दोस्त आये बाद-ए-दफ़्न
ज़िन्दगी भर की मुहब्बत का सिला देने लगे

मिर्ज़ा ज़ाकिर हुसैन ‘साक़िब’ क़िज़िलबाश

2.

क्या ग़ज़ब है कि नहीं इन्साँ को इंसान की क़द्र,
हर फ़रिश्ते को ये हसरत है कि इंसाँ होता

दाग़ दहेलवी

3.
यही मत समझना तुम्हीं ज़िन्दगी हो,
बहुत दिन अकेले भी हमने गुज़ारे

ज़हरा निगाह

4.

मुसीबत और लम्बी ज़िन्दगानी,
बुजुर्गों की दु’आ ने मार डाला

मुज़्तर खै़राबादी

5.
वही ये शहर है तो शहर वालों,
कहाँ हैं कूचा-ओ-दीवार मेरे

महशर बदायूँनी

6.
जी तो करता नहीं कूचे से तेरे जाने को,
गर तेरी इसमें ख़ुशी है तो चला जाता हूँ

हिदायत उल्लाह ख़ाँ “हिदायत”

7.
माना कि इस ज़मीं को ना गुलज़ार कर सके,
कुछ ख़ार कम तो कर गए, गुज़रे जिधर से हम

साहिर लुधियानवी

8.

ना अब हवा मिरे सीने में सनसनाने की,
ना कोई ज़हर मिरी रूह में उतरने का

राजेन्द्र मनचंदा “बानी”

9.
ज़िंदगी कितनी मसर्रत से गुज़रती या रब,
ऐश की तरह अगर ग़म भी गवारा होता

अख़्तर शीरानी

10.
देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे,
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे

ज़फ़र गोरखपुरी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!