व्याकरण की बातें(9): “इ” और “ई” की मात्रा में अंतर और उनका उपयोग 

व्याकरणकी बातें- “इ” और “ई” की मात्रा में अंतर और उनका उपयोग

हिंदी वर्णमाला के 52 वर्णों में से 11 स्वरों को मात्राओं के रूप में प्रयोग किया जाता है। जिनमें से “” के प्रयोग से व्यंजनों को अपना स्वर मिलता है और बाक़ी के स्वर व्यंजनों में मात्राओं के रूप में जुड़ते हैं। स्वर भी दो प्रकार के माने जाते हैं।

पूर्ण स्वर– जिसके बाद कोई दूसरा स्वर या व्यंजन आ सकता है। जैसे: इ, ई, ए, ऐ इत्यादि।

लघु स्वर(मात्रा)- ये मात्रा के रूप में लगते हैं। जैसे:  ि ी े ै ो ौ आदि।

जब स्वर मात्रा के रूप में किसी व्यंजन वर्ण के साथ जुड़ते हैं तो वर्ण के उच्चारण में इन स्वरों का उच्चारण भी जुड़ जाता है। लेकिन जैसा कि पिछले दिनों से हम बातें कर रहे हैं कि अधिकांश स्वर ऐसे हैं जो एक दूसरे से बहुत कम अंतर रखते हैं, उच्चारण का अंतर तो होता ही है लेकिन मात्राओं में बहुत मामूली-सा अंतर होता है। ऐसे में मात्राओं की अशुद्धियाँ अक्सर होती हैं और कई बार पूरे शब्द का अर्थ तक बदल जाता है। ऐसी अशुद्धियों से बचने के लिए ज़रूरी है कि हम स्वरों और उनके उच्चारण तथा मात्राओं का अंतर समझ लें..पिछले कुछ दिनों से आप और हम मिलकर यही कर रहे हैं। अब आज की बात आगे बढ़ाते हैं..

आज हम जिन स्वरों की बात करेंगें वो हैं; “इऔर “ई

 

उच्चारण:

जैसा कि स्वर वाली पोस्ट में हम सही उच्चारण जानने के लिए सबसे सरल रास्ता, पुराने फ़िल्मी गीतों का चुनते आ रहे हैं। तो इस बार भी वही रास्ता अपनाएँगे..पुराने गीत इसलिए क्योंकि उस समय नए-नए शब्दों और नए उच्चारण का उपयोग आज की तरह नहीं होता है और ज़्यादातर सही उच्चारण ही किया जाता था..यहाँ तक कि उर्दू लफ़्ज़ों में भी नुक़्ते वग़ैरह अगर साफ़ सुनना हो तो भी पुराने फ़िल्मी गीत कारगर हो सकते हैं। फ़िलहाल तो हम “और “ई” के उच्चारण को जानते हैं।

” के सही उच्चारण के लिए आप सुन सकते हैं- “सौदागर” फ़िल्म का गीत “इमली का बूटा बेरी का पेड़” ..अब ये बात भी ध्यान में रखने की है कि जिस भी अक्षर में “”  की मात्रा लगेगी उसका उच्चारण उस अक्षर के साथ “” का स्वर लिए होगा। इस बात को समझने के लिए इसी गीत में शुरुआत में गायी जाने वाली लाइन “तिनक-तिनक तिंतारा तिनक-तिनक रे” में “तिनक” के “ति” को सुनकर पता कर सकते हैं। उसी तरह “” की मात्रा जिस वर्ण के साथ जुड़ेगी उसका उच्चारण वैसा ही होगा।

अब “ई” के सही उच्चारण के लिए आप सुन सकते हैं- 1970  में आयी “नया रास्ता”  फ़िल्म का गीत “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम सबको सन्मती दे भगवान”…ये बात भी ध्यान में रखने की है कि जिस भी अक्षर में “ई” की मात्रा लगेगी उसका उच्चारण उस अक्षर के साथ “ई” का स्वर लिए होगा। जैसे कि इसी गाने की लाइन में “सन्मती” में “ती” के उच्चारण में होता है।

उच्चारण जानने के बाद सही मात्रा लगाना काफ़ी आसान काम है। अक्सर मात्राएँ आपस में बदल दी जाती हैं और इससे शब्द ही ग़लत हो जाता है या उसका अर्थ बदल जाता है। “” और “” की मात्राएँ एक-सी ही हैं और अगर आमने-सामने रखी जाएँ तो ऐसा लगे मानो कि आइने के सामने खड़ी हैं। ये मात्राएँ एक खड़ी रेखा के साथ ऊपर उलटे आधे C की तरह लगी होती है, “इ” की मात्रा हो तो  ये सामने से लगती है (ि)और “ई” में पीछे से( ी)

” की मात्रा वाले कुछ शब्द हैं: रिमझिम, मिलन, सितम, झिलमिल, निखार, किताब, सितार आदि।

” की मात्रा वाले कुछ शब्द हैं: गीला, मीत, गीत, झील, भील, जीवन, धीरज  आदि।

अर्थ परिवर्तन

वैसे “इ” और “ई” की मात्रा के सबसे बड़े उदाहरण “कि और की” के प्रयोग और अंतर को बताने वाली एक पोस्ट हमने पहले लिखी है..आप उसे भी पढ़ सकते हैं क्योंकि सबसे ज़्यादा ग़लती और अर्थ परिवर्तन कि और की में होता है। मात्रा की अदल-बदली से अर्थ परिवर्तन का सबसे अच्छा नमूना “” और “ई” की मात्रा में मिलता है। तो ऐसे ही कुछ शब्दों को यहाँ शामिल कर रहे हैं, जिससे ये मात्राओं का अंतर समझा जा सके और अर्थ में हुए परिवर्तन को भी। यहाँ पहले “” की मात्रा लगे शब्द और बाद में “ “ई” की मात्रा लगे शब्द। दोनों के अर्थ उनके बाज़ू में कोष्ठक में लिखे हैं और नीचे उनसे एक वाक्य बनाकर उनके अर्थ को सरलता से समझने का प्रयास है।

बिन- (बिना, अभाव में)

बीन- (एक वाद्य, ख़ासकर सँपेरे इस बजाते हैं)

वाक्य– “बिन” ज्ञान के तो “बीन” बजाना भी मुश्किल है।

दिन – (दिवस)

दीन- (ग़रीब, निर्धन, बेसहारा)

वाक्य- “दिन” निकलते ही सेठ कमलदास “दीन“- दुखियों की सेवा में लग जाते हैं।

शिला – (चट्टान)

शीला- (एक नाम, विनम्र)

वाक्य– ऊँची “शिला” पर बैठी “शीला” न जाने क्या देख रही थी।

पिसना- (छोटे टुकड़ों में बँटना, घुट-घुट कर जीना)

पीसना- (किसी अनाज को बारीक चूर्ण में बदलना)  

वाक्य- अपनी ज़िंदगी के क़ीमती पलों में रूही “पिसती” रही थी..चक्की में जैसे कोई गेहूँ के दाने “पीसता” हो।

पिटना – (मार खाना)  

पीटना- (किसी को मारना)

वाक्य- माँ के हाथों “पिटकर” रमेश को समझ आया कि नन्हें भतीजे को “पीटना” महँगा पड़ गया।

सिखाना- (पढ़ाना, शिक्षा देना)

सीखना-(पढ़ना, शिक्षा प्राप्त करना)

वाक्य– गुरुजी कक्षा में हमेशा ये कहा करते थे “सिखाना” जितना मुश्किल है उतना ही आसान है “सीखना“, पर मुझे लगता है “सिखाते” हुए हम ख़ुद कई नई बातें “सीख” जाते हैं।

आज की पोस्ट में भी तो हमने “सीखा” कि मात्रा की ग़लती से इंसान “पीटने” की बजाय “पिट” भी सकता है। वैसे “हिंसा” “बुरी” बात होती है क्यूँकि किसी भी “इंसान” को चोट पहुँचाकर हमें कुछ नहीं “मिलता“, लेकिन हम उसे कुछ “सिखा” दें तो ज़रूर बदलाव आ सकता है। अब वो बदलाव चाहे “इमली” सा खट्टा हो या “ईख”(गन्ना) जैसा “मीठा” होगा तो सही “ही”। पर अब सोचने “की” बात ये है “कि” इस पोस्ट से हमने कुछ “सीखा” या नहीं, कुछ तो “सीखा” “ही” होगा। हमें ज़रूर बताइएगा, “इंतज़ार” रहेगा।

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