लू शुन की कहानी ‘साबुन की टिकिया’ का दूसरा भाग..

अब तक आपने पढ़ा.. श्रीमती किंग अपनी बेटी एलिगैन्स के साथ कमरे को व्यवस्थित कर रही थी तभी उसको मालूम हुआ कि सू मिंग घर आ गया. एलिगैन्स ने अपने पिता के हाथ में पार्सल देखा तो वो उस पर झपटी लेकिन उसकी माँ ने उसे एक ओर धकेल दिया. वो एक सुगन्धित साबुन था. विदेशी साबुन को पाकर श्रीमती किंग ने रात में घिस घिस कर नहाया और कान के नीचे गर्दन पर लगे मैल को साफ़ किया. बच्चे साबुन पर लिपटा काग़ज़ चाहते थे, इसलिए उसने नहाने के बाद साबुन को ऊपर के स्थान पर रख दिया ताकि वो बच्चों की पहुँच से दूर हो जाए. इस बीच उसके पति ने बेटे को आवाज़ दी और उससे सवाल करने लगा. अब आगे..

”वाह! स्कूल जाकर इतना भी नहीं सीखा? मेरा सारा पैसा बर्बाद हुआ । जिस लड़के से मैंने यह शब्द सुना था, वह तुमसे छोटा था, केवल चौदह या पन्द्रह वर्ष का । और तुम हो कि उसका अर्थ तक नहीं जानते । उस पर यह गुस्ताखी कि मेरे सामने कह रहे हो, ”मुझे नहीं मासूम! ” फौरन किताब में से देखकर मुझे बताओ ।”

स्वे-चेंग ने कहा, ”जी अच्छा” और आदरपूर्वक वहाँ से चला गया ।

”विद्यार्थियों की हालत देखकर दया आती है ।” सू-मिंग ने सोचा । ”सम्राट् कुआंग सी के जमाने में मैं नये किस्म के स्कूल खोलने के पक्ष में था मुझे क्या पता था कि उसके परिणाम बुरे होंगे? ‘मुक्ति’ और ‘आजादी’ आदि शब्दों का क्या अर्थ है? ठोस शिक्षा के स्थान पर केवल विदेशी नकल का बोलबाला है । इस स्वे-चेंग को ही देखो । मैंने व्यर्थ ही इस पर .कितना पैसा बर्बाद किया है? बड़ी आशाओं को लेकर विदेशी स्कूल में पढ़ाया-उसका क्या फल निकला? पूरा साल झख मारने के बाद उसे एर-दू-फू’ तक का अर्थ नहीं आता! आखिर यह स्कूल हैं किस मर्ज की दवा? इन्हें फौरन बन्द कर देना चाहिए ।”

”ठीक कहते हो-सब स्कूलों में ताला डाल देना चाहिये ।” श्रीमती सू-मिंग ने काम जारी रखते हुए धैर्यपूर्वक पति का अनुमोदन किया ।

एलिगैंस और इंगित को भी स्कूल भेजना बेकार है! जब नवें ताऊ कहा करते थे, ”तुम लड़कियों को किसलिए लिखाना-पढ़ाना चाहते हो ?” तो मैं उनसे इस बात पर झगड़ता था-लेकिन अब ऐसा लगता है कि उनकी बात सही थी । आजकल की छोकरियाँ धूल के बादलों की तरह सड़कों पर मँडराती रहती हैं, कितनी शर्म की बात है? और अब बाल कटवाने की नौबत भी आ गई । मुझे बालकटी पढ़ने वाली लड़कियों से सख्त नफरत है । लोग तो लुटेरों और सैनिकों से नफरत करते हैं, लेकिन ये छोकरियाँ तो उन सब से गयी-बीती हैं । इनका इलाज होना जरूरी है ।”

”ठीक कहते हो ।” श्रीमती सू-मिंग ने हामी भरी । जब मर्द ही भिक्षुओं की तरह सर मुँडवा कर घूमने लगे, तो औरतों ने भी भिक्षुणियों की तरह बाल कटवा कर रही-सही कसर पूरी कर दी ।”

यकायक पति को उस शब्द का ख्याल आया, जो इतनी देर से उसे सता रहा था । उसने फिर आवाज दी, स्वे-चेंग ।” स्वर में आदेश भरा था ।

लड़का एक मोटा-सा अंग्रेजी-चीनी शब्दकोश हाथ में लिए जल्दी से कमरे में दाखिल हुआ । उसकी जिल्द की पीठ पर सुनहरी अक्षरों मैं कुछ छपा हुआ था ।

सू-मिंग को दिखाते हुए लड़के ने कहा, ”शायद यही वह शब्द है । मुझे आश्चर्य……।”

सू-मिंग ने किताब हाथ में लेकर नजर दौड़ाई, लेकिन अक्षर बहुत बारीक थे और चीनी ढंग के स्थान पर विदेशी ढंग से बायीं ओर से दायीं ओर को लिखे हुए थे । पहले तो उसके पल्ले कुछ न पड़ा । फिर खिड़की की रोशनी में टकटकी लगाकर देखने से वह चीनी भाषा में दिया हुआ अर्थ पढ़ने में सफल हुआ । ”अट्ठारहवीं शताब्दी में बनायी गयी एक गुप्त संस्था ।”

”यह गलत है” उसने शिकायत की । ”मगर इसका सही उच्चारण कैसे करते हैं ?” उसने विदेशी शब्द को इशारे से दिखाते हुए पूछा ।

बेटे ने नम्रता से उत्तर दिया, औड फैलोस” ( विचित्र लोग) और चीनी उच्चारण को ठीक एर-दू-फू’ जैसा बनाने की कोशिश की ।

नहीं’, नहीं-यह गलत है ।” सू-मिंग ने गुस्से से कहा, मैं तुम्हें बता रहा हूँ कि इस शब्द का अर्थ बुरा है । यह एक गाली है, जो मेरे जैसे व्यक्ति को निकाली जा सकती है । समझे? जाकर इसका ठीक अर्थ ढूंढो ।

स्वे-चेंग ने परेशान होकर आँखें ऊपर उठाई, लेकिन वहीं पर खड़ा रहा ।

”यह सब क्या हंगामा है ?” माँ ने इस बार बेटे की तरफदारी की । लड़के को व्यर्थ ही परेशान करते हो । खुद ही सब कुछ बता दो न !” उसने पति की ओर असन्तोष-भरी दृष्टि से देखा । वह दोनों में किसी तरह सुलह कराना चाहती थी ।

”बात यों हुई,” सूमिंग कुछ नरमी से पत्नी की ओर झुका, ”कि जब मैं साबुन की टिकिया खरीदने गया तो दुकान पर तीन विद्यार्थी भी खड़े थे । उनके विचार में शायद मैं बहुत मीनमेख निकाल रहा था । मैंने पहले चालीस सिक्कों के दाम वाली आधी दर्जन टिकियां देख डालीं । फिर ग्यारह सिक्कों वाली टिकियों को देखा । वे रद्दी किस्म की थीं । इसलिये मैंने बीच के मेल की टिकिया खरीदने का फैसला किया और चौबीस सिक्कों वाली को पसन्द किया । तुम्हें मालूम है कि बड़ी दुकानों पर काम करने वाले छोकरे कितने अकड़बाज होते है! उनकी आँखें तो आसमान पर चढ़ी रहती हैं-जमीन पर टिकती ही नहीं । जिस छोकरे ने मुझे चीजें दिखाई वह अपनी कुत्ते की सी थूथनी फुला कर अपनी उपेक्षा दिखा रहा था । और वे कमजात विद्यार्थी एक दूसरे की ओर कनखियों से देख कर शैतानी भाषा में मेरी हँसी उड़ा रहे थे । फिर जब मैंने काग़ज खोल कर अन्दर से टिकिया को देखने का आग्रह किया तो दुकान के छोकरे ने बड़ी ऊटपटाँग बातें कीं और उन बन्दर जैसे विद्यार्थियों की खी-खी बन्द ही न होने में आती थी । भला सोचो तो, बिना जाँचे-देखे मैं कैसे मान लेता कि साबुन सचमुच बढ़िया है सबसे छोटे विद्यार्थी ने मेरी ओर देख कर यह शब्द कहा था-और सब के सब दाँत निपोरने लगे । अब अनुमान लगाओ कि वह शब्द कितना बुरा होगा? स्वे-चेंग, तुम इस शब्द को गालियों की सूची में ढूँढो ।”

क्रमशः

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