लू शुन की कहानी ‘साबुन की टिकिया’ का तीसरा भाग..

अब तक आपने पढ़ा.. श्रीमती किंग अपनी बेटी एलिगैन्स के साथ कमरे को व्यवस्थित कर रही थी तभी उसको मालूम हुआ कि सू मिंग घर आ गया. एलिगैन्स ने अपने पिता के हाथ में पार्सल देखा तो वो उस पर झपटी लेकिन उसकी माँ ने उसे एक ओर धकेल दिया. वो एक सुगन्धित साबुन था. विदेशी साबुन को पाकर श्रीमती किंग ने रात में घिस घिस कर नहाया और कान के नीचे गर्दन पर लगे मैल को साफ़ किया. बच्चे साबुन पर लिपटा काग़ज़ चाहते थे, इसलिए उसने नहाने के बाद साबुन को ऊपर के स्थान पर रख दिया ताकि वो बच्चों की पहुँच से दूर हो जाए. इस बीच उसके पति ने बेटे को आवाज़ दी और उससे सवाल करने लगा. किसी बात से परेशान सू मिंग बच्चे पर बेवजह अपनी नाराज़गी दिखाने लगा. आख़िर उसने बताया कि जब वो साबुन की टिकिया ख़रीद रहा था तो किस तरह कुछ विद्यार्थी उसका मज़ाक़ उड़ा रहे थे. अब आगे..

स्वे-चेंग ”जी अच्छा ।” कह कर वहाँ से चला गया ।

उसके जाने के बाद सू-मिंग ने पत्नी से अपनी शिकायतें जारी रखी । ”यह नई तहज़ीब सब ढकोसला है । क्या कहते हैं नई तहजीब के !” उसने आँखें फाड़ कर छत की ओर देखते हुए कहा । ”विद्यार्थी लोग बिगड़ गए हैं । समाज की धज्जियाँ उड़ गयी हैं । अगर उसका कोई इलाज न हुआ तो चीन का सत्यानाश हो जायेगा । तबाही आ जाएगी! कितने दुःख की बात है !”

”इसमें दुःख की क्या बात है ?” पत्नी ने उससे पूछा । ”जिस ओर नज़र डालो कलेजा फटता है, खास तौर पर नयी पीढ़ी के रँग ढँग देख कर । माता-पिता का आज्ञापालन, जो चीनी जाति का महान गुण था, ग़ायब होता जा रहा है । ख़ुशकिस्मतती से आज सवेरे मुझे एक आज्ञाकारिणी मालिन दिख पड़ी । सड़क पर दो भिखारिनें जा रहीं थीं । उनमें से एक करीब सत्रह-अट्ठारह वर्ष की होगी । इतनी सयानी लड़की को भीख माँगना उचित नहीं-पर बेचारी अपनी अंधी दादी की सहायता कर रही थी । दोनों भीख माँगती-माँगती कपड़े की दुकान के नीचे की नाली तक जा पहुँचीं । हर कोई कहता था कि लड़की बड़ी सुशील है । जो भी मिलता, दादी को खिला देती और खुद भूखी रहती । लेकिन क्या इस सड़े-गले समाज में लोग उसकी सुशीलता पर तरस खाते हैं ?” सू-मिंग ने पत्नी के चेहरे पर नज़र गड़ा कर सवाल पूछा, मानो वह उसकी समझदारी की परीक्षा ले रहा हो ।

वह गुमसुम प्रश्नसूचक दृष्टि से पति की ओर देखने लगी मानो कह रही हो ”तुम्हीं बता दो न !”

“बिलकुल नहीं ।” सू-मिंग आख़िर अपने सवाल का जवाब देने पर विवश हुआ । ” इतनी देर तक, मेरी आखों के सामने सिर्फ एक आदमी ने उसकी झोली में ताँबे का एक सिक्का फेंका । दर्जनों लोग खड़े तमाशा देखते रहे । दो बेहया छोकरे लड़की के बारे में बातें कह रहे थे । एक ने कहा, ‘इसकी मैल देख कर क्यों नाक-भौं सिकोड़ते हो? अगर दो टिकिया साबुन से इसे रगड़ कर नहला दो तो यह बड़ी मजेदार निकल आएगी ।’ मैं पूछता हूँ कि यह कैसी बातचीत है ?”

श्रीमती सू-मिंग का सर झुक गया था । काफ़ी देर सुस्ताने. के बाद उसने पूछा, ”क्या तुमने उसे कुछ दिया ?”

. ”मैंने? नहीं । भला किस मुँह से उसे एक या दो सिक्के देता? वह ऐसी-वैसी भिखारिन तो थी नहीं ।”

उसकी बात अधूरी ही थी कि उसकी पत्नी नाक साफ़ करती हुई उठी और शाम का खाना पकाने के लिये रसोई की ओर चल दी । अँधेरा बढ़ गया था और खाने का समय नजदीक आ गया था ।

सू-मिंग भी उठ कर आँगन में आ गया जहाँ कमरे की अपेक्षा अभी अधिक प्रकाश था । स्वे-चेंग दीवार के सहारे कसरत करने में मग्न था । पिता की आज्ञा थी कि संध्या के समय ही वह अभ्यास करे । बेटे को देख कर सू-मिंग ने तेजी से सर हिलाया और दोनों हाथों को पीछे की ओर कर के इधर-उधर टहलने लगा । शीघ्र ही आंगन में पड़ा एकमात्र सदाबहार के फूलों का गमला भी सांग के झुट-पुटे में अदृष्य हो गया । रुई के फोहों की तरह छितरे बादलों में से तारे झिलमिलाने लगे और निशा का’ आगमन हुआ । सू-मिंग परेशानी से उत्तेजित हो उठा । उसे लगा कि जैसे वह कोई बड़ा काम करने जा रहा है । वह भ्रष्ट विद्यार्थियों और समूचे सड़े-गले समाज के विरुद्ध जिहाद करेगा । उसकी आकांक्षा तमाम वीर तथा संकटग्रस्त आत्माओं को मुक्ति प्रदान करने की थी ।

उसके क़दम तेज़ होते गये और पुराने ढँग के कपड़े के जूतों की कर्कश आवाज़ से बाड़े में बन्द मुर्गियाँ और वृक्षों में ख़लबली मच गई और वे चौंक कर चीख़ने चिल्लाने लगे ।

खाना खाने का समय आ पहुंचा था । कमरे में जलता लैम्प पूरे परिवार को खाने के लिए आमन्त्रित कर रहा था । थोड़ी देर बाद ही सब लोग खाने की चौकोर मेज़ के गिर्द अपनी सलाईयों से कटोरियों को खटखटाने लगे । गर्म करमकल्ले के शोरबे में से भाप निकल रही थी और सू-मिंग मन्दिर की अधिष्ठात्री देवी की तरह सभापति के आसन पर बैठा था ।

खाने के बीच में कोई न कोई दुर्धटना अवश्य हो जाती । आज इंगित ने अपनी कटोरी लुड़का दी, सारा शोरबा मेज़ पर फैल गया । सू-मिंग ने उसे कठोर दृष्टि से देखा, लड़की सहम गई और रोने लगी । इस गड़बड़ में गोभी की डण्ठल जो सू-मिंग को बहुत पसन्द थी कहीं गिर पड़ी थी । उसे ढूँढने के लिए जब उसने तीलियाँ आगे बढ़ाई तो देखा कि स्वे-चिंग उसे अपने मुँह में ठूँस रहा है । जब उसे पुराना पत्ता खाकर ही सन्तोष करना पड़ा तो उसका गुस्सा और भी भड़क उठा ।

‘ स्वे-चेंग’ ‘ उसने लड़के की ओर कठोर मुद्रा से देखते हुए पूछा, ”क्या तुमने उस शब्द का अर्थ ढूँढ लिया?”

”किस शब्द का?….. .जी, अभी नहीं । ”

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क्रमशः

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