दो शाइर, दो ग़ज़लें (23): असग़र गोंडवी और अल्लामा इक़बाल

असग़र गोंडवी की ग़ज़ल: जीने का न कुछ होश न मरने की ख़बर है

जीने का न कुछ होश न मरने की ख़बर है
ऐ शोबदा-पर्दाज़ ये क्या तर्ज़-ए-नज़र है

सीने में यहाँ दिल है न पहलू में जिगर है
अब कौन है जो तिश्ना-ए-पैकान-ए-नज़र है

है ताबिश-ए-अनवार से आलम तह-ओ-बाला
जल्वा वो अभी तक तह-ए-दामान-ए-नज़र है

कुछ मिलते हैं अब पुख़्तगी-ए-इश्क़ के आसार
नालों में रसाई है न आहों में असर है

ज़र्रों को यहाँ चैन न अज्राम-ए-फ़लक को
ये क़ाफ़िला बे-ताब कहाँ गर्म-ए-सफ़र है

ख़ामोश ये हैरत-कदा-ए-दहर है ‘असग़र’
जो कुछ नज़र आता है वो सब तर्ज़-ए-नज़र है

रदीफ़: है
क़फ़िए: ख़बर, नज़र, नज़र, नज़र, असर, सफ़र, नज़र

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अल्लामा मुहम्मद इक़बाल की ग़ज़ल: जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में

जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में
या शम्अ’ जल रही है फूलों की अंजुमन में

आया है आसमाँ से उड़ कर कोई सितारा
या जान पड़ गई है महताब की किरण में

या शब की सल्तनत में दिन का सफ़ीर आया
ग़ुर्बत में आ के चमका गुमनाम था वतन में

तक्मा कोई गिरा है महताब की क़बा का
ज़र्रा है या नुमायाँ सूरज के पैरहन में

हुस्न-ए-क़दीम की इक पोशीदा ये झलक थी
ले आई जिस को क़ुदरत ख़ल्वत से अंजुमन में

छोटे से चाँद में है ज़ुल्मत भी रौशनी भी
निकला कभी गहन से आया कभी गहन में

रदीफ़: में
क़ाफ़िए: चमन, अंजुमन, किरण, वतन, पैरहन, अंजुमन, गहन

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