दो शाइर, दो ग़ज़लें (22): मिर्ज़ा ग़ालिब और परवीन शाकिर…

मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल

घर हमारा जो न रोते भी तो वीराँ होता
बहर गर बहर न होता तो बयाबाँ होता

तंगी-ए-दिल का गिला क्या ये वो काफ़िर-दिल है
कि अगर तंग न होता तो परेशाँ होता

बाद यक-उम्र-ए-वरा बार तो देता बारे
काश रिज़वाँ ही दर-ए-यार का दरबाँ होता

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परवीन शाकिर की ग़ज़ल

बहुत रोया वो हम को याद कर के
हमारी ज़िंदगी बरबाद कर के

पलट कर फिर यहीं आ जाएँगे हम
वो देखे तो हमें आज़ाद कर के

रिहाई की कोई सूरत नहीं है
मगर हाँ मिन्नत-ए-सय्याद कर के

बदन मेरा छुआ था उसने लेकिन
गया है रूह को आबाद कर के

हर आमिर तूल देना चाहता है
मुक़र्रर ज़ुल्म की मीआ’द कर के

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