दो शाइर, दो ग़ज़लें (21): जन्मदिन विशेष में मजरूह सुल्तानपुरी की ग़ज़लें

दो शा’इर, दो ग़ज़लें सिरीज़ में यूँ तो हम दो अलग-अलग शाइरों की ग़ज़लें पाठकों के लिए साझा करते हैं लेकिन आज मजरूह सुल्तानपुरी के जन्मदिन पर हम उन्हीं की दो ग़ज़लें पेश कर रहे हैं.

ग़ज़ल 1

डरा के मौज ओ तलातुम से हम-नशीनों को
यही तो हैं जो डुबोया किए सफ़ीनों को

शराब हो ही गई है ब-क़द्र-ए-पैमाना
ब-अज़्म-ए-तर्क निचोड़ा जब आस्तीनों को

जमाल-ए-सुब्ह दिया रू-ए-नौ-बहार दिया
मिरी निगाह भी देता ख़ुदा हसीनों को

हमारी राह में आए हज़ार मय-ख़ाने
भुला सके न मगर होश के क़रीनों को

कभी नज़र भी उठाई न सू-ए-बादा-ए-नाब
कभी चढ़ा गए पिघला के आबगीनों को

यही जहाँ है जहन्नम यही जहाँ फ़िरदौस
बताओ आलम-ए-बाला के सैर-बीनों को

तुझे न माने कोई तुझ को इस से क्या ‘मजरूह’
चल अपनी राह भटकने दे नुक्ता-चीनों को
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ग़ज़ल 2

हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह
उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह

इस कू-ए-तिश्नगी में बहुत है कि एक जाम
हाथ आ गया है दौलत-ए-बेदार की तरह

वो तो कहीं है और मगर दिल के आस-पास
फिरती है कोई शय निगह-ए-यार की तरह

सीधी है राह-ए-शौक़ पे यूँही कहीं-कहीं
ख़म हो गई है गेसू-ए-दिलदार की तरह

अब जा के कुछ खुला हुनर-ए-नाख़ून-ए-जुनूँ
ज़ख़्म-ए-जिगर हुए लब-ओ-रुख़्सार की तरह

‘मजरूह’ लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह

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