दो शा’इर दो रूबाई (6): मीर और सादिक़ैन

मीर तक़ी मीर की रूबाई

तुम तो ऐ महरबान अनूठे निकले
जब आन के पास बैठे रूठे निकले
क्या कहिए वफ़ा एक भी वअ’दा न किया
ये सच है कि तुम बहुत झूठे निकले

…..

सादिक़ैन की रूबाई

इस शाम वो सर में दर्द सहना उसका,
मैं पास हुआ तो दूर रहना उसका
मुझसे ज़रा शर्मा के तबीअत मेरी
कुछ आज है ना-साज़ ये कहना उसका

रूबाई– रूबाई चार-चार मिसरों की ऐसी शा’इरी को कहते हैं जिनके पहले, दूसरे और चौथे मिसरों का एक ही रदीफ़, क़ाफ़िये में होना ज़रूरी है. इसमें एक बात समझनी ज़रूरी है कि ग़ज़ल के लिए प्रचलित 35-36 बह्र में से कोई भी रूबाई के लिए इस्तेमाल में नहीं लायी जाती है. रूबाइयों के लिए चौबीस छंद अलग से तय हैं, रूबाई इन चौबीस बह्रों में कही जाती है

फ़ोटो क्रेडिट (फ़ीचर्ड इमेज): प्रियंका शर्मा

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