दो कहानीकार, दो कहानियाँ (6): हरिशंकर परसाई और मंटो

हरिशंकर परसाई की कहानी: अपना-पराया

“आप किस स्कूल में शिक्षक हैं?”

“मैं लोकहितकारी विद्यालय में हूँ, क्यों, कुछ काम है क्या?”

“हाँ, मेरे लड़के को स्कूल में भर्ती करना है”

“तो हमारे स्कूल में ही भर्ती करवा दीजिए।”

“पढ़ाई-वढ़ाई कैसी है?”

“नम्बर वन! बहुत अच्छे शिक्षक हैं, बहुत अच्छा वातावरण है, बहुत ही अच्छा स्कूल है।”

“आपका बच्चा भी वहाँ पढ़ता होगा?”

“जी नहीं, मेरा बच्चा तो ‘आदर्श विद्यालय’ में पढ़ता है”

समाप्त

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सआदत हसन मंटो की कहानी- करामात

लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरू किए।
लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अंधेरे में बाहर फेंकने लगे, कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल मौक़ा पाकर अपने से अलहदा कर दिया, ताकि क़ानूनी गिरफ़्त से बचे रहें।
एक आदमी को बहुत दिक़्क़त पेश आयी। उसके पास शक्कर की दो बोरियाँ थीं जो उसने पनपंसारी की दुकान से लूटी थी। एक तो वह जूँ-तूँ रात के अंधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक आया, लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा ख़ुद भी साथ चला गया।
शोर सुनकर लोग आ गए, कुएँ में रस्सियाँ डाली गयीं। जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया। लेकिन वो चंद घंटों में मर गया।
दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए उस कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था।
उसी रात उस आदमी की क़ब्र पर दीए जल रहे थे।

समाप्त
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