घनी कहानी छोटी शाखा: सत्यजीत रे की कहानी “कॉर्वस” का चौथा भाग

कॉर्वस- सत्यजीत रे

भाग- 4

(अब तक आपने पढ़ा…सत्यजीत रे की इस कहानी में हम एक वैज्ञानिक की डायरी की प्रविष्टियाँ पढ़ रहे हैं। जिसमें वैज्ञानिक यानी श्रीमान शोंकू बचपन से ही पक्षियों के गुणों से प्रभावित हैं और वो उन पर काम करना चाहते हैं आख़िरकार उन्हें सालों बाद इस बात की याद आती है और वो इसके लिए एक मशीन बनाने में जुट जाते हैं जिसके ज़रिए वो पक्षियों को पढ़ना लिखना और इंसानी गुण सीखा सकें। इसके लिए पक्षियों को ढूँढते समय उन्हें सभी पक्षियों से अलग व्यवहार करने वाला कौवा मिलता है। जिसे चुनकर श्रीमान शोंकू बांग्ला और अंग्रेज़ी भाषा सिखाने लगते हैं, साथ ही उसे और भी कई गुण सिखाते हैं। उसे श्रीमान शोंकू “कॉर्वस” नाम देते हैं और उसे सेंटियागो के पक्षी सम्मेलन में ले जाने का विचार भी बनाते हैं। उन्हें इस काम में सफलता मिलती है। एक विशेष पिंजरे में कॉर्वस को लेकर श्रीमान शोंकू वहाँ पहुँचते हैं और सभी कॉर्वस से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते। सम्मेलन के बाद श्रीमान शोंकू को पता चलता है कि सभी अतिथियों के मनोरंजन के लिए वहाँ के मशहूर जादूगर ऑर्गस का एक शो आयोजित किया गया है। इस जादूगर की ख़ास बात ये है कि वो अपने शो में ख़ासतौर से पक्षियों का उपयोग करता है। श्रीमान शोंकू इस शो को देखने के बाद जादूगर की कला से प्रभावित होते हैं किंतु उन्हें ये सोचकर गर्व भी होता है कि उनके कॉर्वस जितना कोई भी पक्षी हुनरमंद नहीं है। वो ये बात मज़ाक़ में अपने साथी से कहते हुए ये भी कहते हैं कि वो जादूगर को अपना कॉर्वस दिखाना चाहेंगे। रात में होटल रूम में श्रीमान शोंकू के लिए स्वागत कक्ष से एक फ़ोन आता है, जिससे उन्हें पता चलता है कि कोई उनसे मिलने आया है। उनके आश्चर्य की सीमा नहीं रहती जब उन्हें पता चलता है कि मिलने आने वाला कोई और नहीं बल्कि ख़ुद जादूगर ऑर्गस है। अब आगे…)

ऑर्गस ! मैं थोड़ा चौंका। नाम सुनकर उसे मिलने के लिए ऊपर बुलाने के अलावा मेरे पास अब कोई चारा ही न था। मैंने बिस्तर के सहारे लगा लैम्प फिर जला दिया और उसका इन्तज़ार करने लगा कोई तीन मिनट बाद ही दरवाज़े की घण्टी बजी। मैंने दरवाज़ा खोला। मैंने आज तक इतना लम्बा आदमी नहीं देखा था।

ऑर्गस स्टेज पर क़रीब 6 फ़ीट का लगता था पर निकला साढे़ छः। झुककर मेरा अभिवादन करने के दौरान भी वह मुझसे पूरा आधा फुट तो ऊँचा रहा ही होगा । मैंने उसे भीतर चले आने के लिए कहा। वह जादूगर के लबादे में नहीं बल्कि एक सूट में था पर रंग इसका भी था काला ही। मैंने देखा कि “कॉराइरा डैल सैन्टियागो” का साँयकालीन संस्करण उसकी जेब से बाहर झाँक रहा था। हम सोफ़े पर जा बैठे। मैंने उसके जादू की तारीफ़ करते हुए कहा-

“जहाँ तक मुझे याद आ रहा है ‘ऑर्गस’ ग्रीक-पुराणों में एक ऐसे प्रतिभाशाली आदमी का नाम था जिसके सारे जिस्म पर आँखें ही आँखें थीं। जादूगर को ही ‘ऑर्गस’ कहते हैं न?”

आंर्गस मुस्कराया और बोला “फिर तो आप मानेंगे न कि ऑर्गस का और पक्षियों का सम्बन्ध पुराना है”

मैंने सहमति में सिर हिलाया।

“हाँ..कथा है कि ग्रीक देवी ‘हेरा’ ने ऑर्गस के शरीर से आँखें निकालकर मोर की पूँछ पर लगा दीं थीं। कहा जाता है कि इसीलिए उसके पंख पर गोल-गोल निशान होते हैं। पर मुझे तो हैरत आपकी आँखों को देखकर हो रही है। माफ़ कीजिए – आपके चश्मे का नंबर कितना है?”

“माइनस बीस”- ऑर्गस ने जवाब दिया। “पर इससे फ़र्क़ क्या पड़ता है? मेरे पक्षी चश्मा थोड़े ही लगाते हैं- और स्वयं ही अपने इस मज़ाक़ पर हॅंस पड़ा।

एकाएक हॅंसते हुए वह चुप हो गया और विस्मय से उसका मुँह खुला का खुला रह गया। उसकी आँखें प्लास्टिक के उस पिंजरे पर जमी हुई थीं जिसमें कॉर्वस सो रहा था। ऑर्गस के ज़ोरदार ठहाके से चौंककर कॉर्वस अचानक उठ बैठा था और आँखें फाड़कर उसकी तरफ देख रहा था। आश्चर्य में डूबा हुआ ऑर्गस कुर्सी से उठा और पिंजरे की तरफ बढ़ा कॉर्वस को एक मिनट ग़ौर से देखते रहने के बाद वह बोला “तुम क्या जानो दोस्त आज के अख़बार में तुम्हारे बारे में पढ़कर मैं तुमसे मिलने के लिए किस क़दर बेताब था। मेरा दुर्भाग्य है कि मैंने तुम्हें बोलते हुए नहीं सुना। मैं कोई पक्षी विशेषज्ञ तो नहीं पर चिड़ियों को ट्रेनिंग ज़रूर देता हूँ”

वह लौटकर आया और वापस अपनी कुर्सी पर बैठ गया। उसके चेहरे पर खेद के भाव उभरे- “मैं जानता हॅूं कि आप इस वक़्त थकान में किस क़दर चूर होंगे – पर बड़ी मेहरबानी होगी अगर आप एक बार, केवल एक बार, इसे पिंजरे से बाहर निकाल सकें। इसकी बुद्धिमानी का एक छोटा सा नमूना मुझे…………”

मैंने उसकी बात काटकर कहा – “केवल मैं ही थका हुआ नहीं हूँ – कॉर्वस भी है। मैं उसकी इच्छा के विपरीत उसे कोई आदेश नहीं दे सकता। मैं पिंजरा खोलता हूँ- बाकी कॉर्वस जाने और उसका काम”

“बिलकुल ठीक है। बजा फ़रमाते हैं आप” वह बोला

मैंने पिंजरे का दरवाज़ा खोला। कॉर्वस बाहर आया, बिस्तर के सहारे लगे लैम्प तक गया और अपनी चोंच से उसका स्विच दबा दिया। कमरा एकाएक अंधेरे में डूब गया।

खिड़की से छनकर सड़क पार के होटल मैट्रोपोल की हरी रोशनियाँ भीतर आ रहीं थीं। मैं चुप था। कॉर्वस दोबारा उड़ा और पिंजरे में जाकर अपनी चोंच से उसने दरवाज़ा बन्द कर लिया। हरी नियॉन बत्तियों की हल्की रोशनी में ऑर्गस की साँप जैसी आँखें चश्मे के सुनहरे फ़्रेम में चमक रहीं थीं।

ताज्जुब में डूबा वह स्तब्ध था। ऑर्गस समझ गया था कि कॉर्वस के बत्ती बुझाकर यों पिंजरे में लौट जाने का प्रयोजन क्या था। कॉर्वस आराम करना चाहता था। वह रोशनी नहीं अंधेरा चाहता था, आराम से सोने के लिए।

ऑर्गस के पतले होंठों से अचानक निकला “कमाल है”

अपने हाथ ठोढ़ी के नीचे दबाए हुए वह अब भी हैरत में, अविश्वास में डूबा हुआ था। मैंने देखा उसके नाखून बहुत लम्बे थे और सिल्वर रंग की नेलपालिश की वजह से वे हल्के अंधेरे में भी दमक रहे थे। बार बार जल बुझ रही रोशनियों के अक्स उसके जगमगाते नाखूनों पर पड़कर एक अजीब सा प्रभाव पैदा कर रहे थे।

“मुझे यह चाहिए” अंग्रेजी में ऑर्गस खरखराती आवाज़ में फुसफुसाया। अब तक वह मुझसे स्पेनी में बोल रहा था। अब उसकी आवाज़ में लालच का पुट नहीं बल्कि धमकी थी।

“मुझे यह पक्षी चाहिए” उसने दोहराया।

मैंने चुप रहकर उसे घूरा । ऐसे में कहने को मेरे पास था भी क्या? मैं केवल इंतज़ा र करने लगा कि आगे क्या कहता है वह? वह जो अब तक खिड़की की तरफ देखता रहा था मुड़कर मेरी तरफ मुख़ातिब हुआ। जलती बुझती नियॉन बत्तियाँ अंधेरे उजाले के प्रतिबिम्ब कमरे में रच रहीं थीं, जहाँ यह नाटक चल रहा था। रोशनियाँ बुझ जाने पर वह जैसे कमरे से ग़ायब हो जाता और जलने पर कुर्सी पर बैठा फिर दीख पड़ता। जैसे कोई इंद्रजाल हो।

ऑर्गस ने अपनी तरफ ऊँगली का इशारा किया – “मेरी तरफ देखो प्रोफेसर! मैं ऑर्गस हूं…… ऑर्गस। दुनिया का मशहूर जादूगर। अमरीका के हर शहर में बेशुमार लोग मुझे जानते हैं – मेरे जादू के क़ायल हैं। अगले महीने मैं दुनिया भर में अपने जादू दिखलाने के लिए जा रहा हूँ । रोम, मैड्रिड, पैरिस, लंदन, स्टॉकहोम, टोक्यो, हांगकांग…. सारी दुनिया के लोग मेरा लोहा मानेंगे। पर जानते हैं आप; क्या होगी इस बार असली चीज़? कौआ….यही भारतीय कौआ !! प्रोफेसर! मुझे किसी भी क़ीमत पर यह चाहिए। यही कौआ….!”

ऑर्गस अपने चमकीली नाखूनों वाली उँगलियों को मेरी आँखों के सामने कुछ ऐसे नचा रहा था मानो कोई सपेरा हो। मैं मन ही मन मुस्कराया। मेरी जगह अगर उस समय कोई दूसरा आदमी होता तो निश्चय ही उसके हावभाव और आवाज़ से हिप्नोटाइज़ हो चुका होता और ऑर्गस पक्षी पर हाथ साफ कर जाता। पर मैंने से दृढ़ और स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि उसका जादू मुझ पर नहीं चलने वाला!

मैंने कहा – “मिस्टर ऑर्गस। आप बेकार में अपना क़ीमती वक़्त बर्बाद कर रहे हैं। मुझे हिप्नोटाइज़ करने की कोशिश करना बेकार है। मैं आपके झाँसे में नहीं आने का। आपकी बात मानना मेरे लिए क़तई संभव नहीं है। कॉर्वस मेरा शिष्य ही नहीं मेरे बेटे के समान है। उसे कितनी मेहनत और लगन से मैंने तैयार किया है मेरा दिल ही जानता है…”

“प्रोफेसर…!” ऑर्गस मेरी बात काट कर एकाएक तीव्र स्वर में चिल्लाया फिर उसका स्वर एकाएक मन्द पड़ गया।

“प्रोफेसर….क्या तुम्हें पता नहीं कि मैं करोड़पति हूँ? इसी शहर के पूरब में मेरी पचास मंज़िला इमारत है? मेरे यहां 26 नौकर और चार कैडलक कारें हैं? मेरे लिए कोई चीज़ महँगी नहीं है…प्रोफेसर! मैं अभी हाथों हाथ इस कौए के लिए तुम्हें बीस हज़ार एस्क्यूडोज़ दे सकता हूँ”

बीस हज़ार एस्क्यूडोज़ का मायना था क़रीब एक लाख रूपये। पर ऑर्गस को शायद पता नहीं था कि जैसे अनापशनाप खर्च कर डालना उसके बाएँ हाथ का खेल था ठीक वैसे ही मेरे लिए भी पैसे टके का कोई मूल्य न था। मैंने उस पर यह दो टूक ज़ाहिर कर दिया।

आख़िर ऑर्गस ने आख़िरी पासा फेंका-”आप तो भारतीय हैं न प्रोफेसर। क्या आप हिन्दुस्तानी रहस्यमय सम्बन्धों में विश्वास नहीं करते? ऑर्गस और कॉर्वस …..कॉर्वस और ऑर्गस ….कितना साम्य है दोनों लफ़्ज़ों में? क्यों है न प्रोफेसर?”

अब मैं अपने आप पर क़ाबू न रख सका। मैं कुर्सी से उठ गया और बोला- “मिस्टर ऑर्गस। आपकी धन दौलत, कारें, कोठियां और प्रसिद्धि आपको ही मुबारक हो। मेरा कॉर्वस मेरे साथ ही रहेगा। उसका प्रशिक्षण भी अभी समाप्त नहीं हुआ है और मुझे उस पर अभी भी और मेहनत करनी है। मैं आज बुरी तरह थका हुआ हूँ; आपने मुझसे सिर्फ पाँच मिनट चाहे थे और मैं आपको बीस दे चुका हूँ । मैं अब और बातें करने की स्थिति में नहीं हूँ। मैं और कॉर्वस अब दोनों ही सोना चाहते हैं। अच्छा – गुडनाइट !”

उसका चेहरा फक्क हो गया। उसकी उतरी हुई सूरत देखकर मेरा दिल भर आया। पर बाहर से ऐसा कुछ भी व्यक्त नहीं होने दिया मैंने। अंततः ऑर्गस आदर के अंदाज़ में अभिवादन के लिए झुका और जल्दी से स्पेनी में “शुभरात्रि” बुदबुदा कर कमरे से विदा हो गया।

मैंने दरवाजा बन्द कर लिया और पिंजरे तक गया। कॉर्वस अब तक जाग रहा था। मुझे देखते ही उसने चोंच खोली और मानो पूछा “कौन?” उसकी आवाज में जो जिज्ञासा थी मुझ से छिपी न रही।

“एक पागल जादूगर!” मैंने उसे बतलाया “पैसे की धौंस जमा रहा था। तुम्हारा मोल-भाव करने आया था। मैंने अंगूठा दिखा दिया। तुम अब चैन से सो जाओ।”

16 नवम्बर

घटनाओं को डायरी में मैं कल ही दर्ज करना चाहता था पर रात को मुझे इस बात का क़तई कोई अंदाज़ न था कि आने वाले कुछ घण्टों में ऐसी ख़तरनाक घटनाएँ घटेंगी। सवेरे की सभा में सबसे उल्लेखनीय था – जापान के पक्षी विशेषज्ञ तोमासाका मोरीमोती का काफ़ी कठिन भाषण, जिसमें मैं कॉवर्स को भी अपने साथ ही ले गया था। कोई एक घण्टे तक धाराप्रवाह बोलते रहने के बाद अचानक मोरीमोती महाशय यह भूल गए कि उनकी वार्ता का असल सूत्र था क्या? और उलझन में लगे बगलें झाँकने। तभी एकाएक अपनी चोंच को मेरी कुर्सी के हत्थे पर उत्साह में खटखटाते हुए कॉर्वस ने जैसे तालियाँ बजा दी। इसे सुनना था कि भीड़ बेतहाशा हँसी से फूट पड़ी और मैं तो मारे शर्म के बस ज़मीन में ही गड़ गया।

हमें होटल में दोपहर का भोजन कुछ प्रतिनिधियों के साथ करना था। वहाँ जाने से पहले मैं अपने कमरा नं. 71 में पहुंचा। कॉर्वस को उसके पिंजरे में छोड़ा, उसे खाना दिया और कहा “तुम यहीं रहो। मैं भी लंच खाकर अभी वापस आ रहा हूँ“ आज्ञाकारी कॉवर्स ने सहमति से सिर झुका दिया।

जब तक मैं खाना खाकर लौटा ढाई बज चुके थे। ज्यों ही कमरा खोलने के लिए मैंने चाबी की-होल में डाली, मुझे पता चल गया कि कमरा पहले से ही खुला हुआ था।

मेरा ख़ून आशंका से जम गया। कमरे में पहुंचते ही तो मुझ पर जैसे बिजली गिर पड़ी। बिल्कुल वही हुआ जिसका अंदेशा था।

कॉर्वस और उसका पिंजरा कमरे से ग़ायब था।

क्रमशः

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!