घनी कहानी छोटी शाखा: सत्यजीत रे की कहानी “कॉर्वस” का तीसरा भाग

कॉर्वस- सत्यजीत रे

भाग- 3

(अब तक आपने पढ़ा..सत्यजीत रे इस कहानी में एक वैज्ञानिक की डायरी की प्रविष्टियाँ हमें पढ़ा रहे हैं। यहाँ वैज्ञानिक बचपन से अपने पक्षी प्रेम के बारे में बताते हुए ये बताते हैं कि किस तरह उनके घर की पालतू मैना ने आम बोलचाल के सीखे हुए शब्द से अलग हटकर “भूचाल- भूचाल” चिल्लाया था जबकि उस वक़्त किसी ने भूचाल महसूस भी नहीं किया था लेकिन अगले दिन की ख़बर से ये साबित हो गया था कि उस रात भूचाल आया था। इस घटना ने वैज्ञानिक के मन में पक्षियों के प्रति अतिरिक्त जिज्ञासा पैदा कर दी थी। लेकिन अपने अन्य शोध कार्यों में व्यस्त होने के कारण और साथ ही अपने पालतू बिल्ले न्यूटन के पक्षियों को नापसंद करने के कारण वैज्ञानिक ने इस ओर ख़ास ध्यान नहीं दिया था। किंतु कई दिनों से वो एक मशीन बनाने लगे हैं जिसके ज़रिए वो पक्षियों को इसानों की भाषा और उनके गुण सिखाने की कोशिश करने वाले हैं। इसके साथ ही वो सारे दिन उनमें आने वाले बदलावों पर भी नज़र रखने वाले हैं। इस मशीन के बनने की प्रक्रिया के बीच ही वैज्ञानिक रोज़ घर में आने वाले पक्षियों पर नज़र रखना शुरू करते हैं। ऐसे में उनके ध्यान का केंद्र बनता है एक कौवा जो बाक़ी पक्षियों से अलग कभी पंजे में पेंसिल पकड़कर कुछ लिखने की कोशिश करता है तो कभी माचिस की तीली जलाने की कोशिश करता है। वैज्ञानिक उसे भगाते हैं तो वो शैतानी सी हँसी हँसता हुआ उड़ता है। इस तरह की बातों के बाद वैज्ञानिक उसे अपने शोध का हिस्सा बना लेते हैं। उन्होंने उसका नाम “कॉर्वस” रखा है, जो सीखने में बड़ा ही होशियार है और बांग्ला, अंग्रेज़ी आदि बड़ा मगन होकर सीखता है। यहाँ तक कि उसने न्यूटन से दोस्ती भी गाँठ ली है और तो और वो अपना नाम, माह का नाम, दिन का नाम आदि लिखना भी सीख चुका है। वैज्ञानिक उसे अपने साथ पक्षी विशेषज्ञों के सम्मेलन में सेन्टियागो ले जानेकि तैयारी कर रहे हैं। इसी बीच उन्हें एक रोज़ ये देखकर आश्चर्य होता है कि घर के बाहर ढेर सारे कौवे बिजली गिरने से मृत कौवे के लिए चीख़ पुकार मचा रहे होते हैं पर कॉर्वस उस समय भी अपनी पढ़ाई में व्यस्त होता है। अब आगे…)

7 नवम्बर

कॉर्वस को अब दुनिया के वैज्ञानिक समुदाय के सम्मुख पेश किया जा सकता है। हालाँकि पक्षियों को सिखाने की मिसालें बहुतेरी हैं पर मैं नहीं समझता कि कॉर्वस के बराबर किसी पक्षी को कभी दीक्षित किया गया हो।

‘आरनिथन’-मेरी मशीन ने अपने काम को बख़ूबी अंजाम दिया है। गणित, भूगोल, इतिहास और प्राकृतिक विज्ञान के वे सवाल जिनका उत्तर संख्याओं के माध्यम से अथवा थोड़े बहुत शब्दों में दिया जा सकता है- कॉर्वस द्वारा हल किए जा सकते हैं। न केवल यह बल्कि उसने कुछ ऐसी ‘मानवीय’ समझ भी विकसित कर ली है जो किसी पक्षी में मिलने का तो सवाल ही नहीं है। यक़ीनन यह चीज अपने आप में बहुत अनूठी है। एक उदाहरण से यह बात और साफ हो जाएगी। आज मैं अपनी सैन्टियागो-यात्रा के लिए सामान बाँध रहा था। ज्यों ही मैं सूटकेस बन्द करने लगा- मैंने पाया कॉर्वस मुझे थमाने के लिए पहले से ही अपनी चोंच में चाबी दबाए खड़ा था।

कल ग्रेनफैल का एक पत्र और मिला है। आजकल वह सौन्टियागो में ही है। सम्मेलन के आयोजक मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। अब तक के आयोजनों में वैज्ञानिकों और विषेशज्ञों ने केवल नीरस भाषण ही दिए होंगे पर किसी पक्षी का इस तरह जीवन्त प्रदर्शन तो शायद पहली दफ़ा ही हो।

पक्षियों के मस्तिष्क के बारे में जो अनूठा अनुसंधान मैंने पिछले दो महीनों में किया है उसी पर सम्मेलन में मैं अपना शोध-पत्र पढूंगा। और सबसे बढ़कर कॉर्वस तो वहाँ होगा ही जो आलोचकों की चोंच ही बंद कर देगा।

10 नवम्बर

ये पंक्तियाँ मैं दक्षिणी अमरीका की तरफ उड़ रहे हवाई जहाज में बैठा लिख रहा हूँ । यहाँ केवल एक घटना का ब्यौरा दूँगा। ज्यों ही हम घर से चलने को हुए कॉर्वस पिंजड़े से बाहर आने के लिए बहुत बेताब और बेचैन नजर आया। न जाने क्या चाहता था वह? मैंने आगे बढ़कर पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया। कॉर्वस तेज़ी से उड़कर मेरी लिखने की मेज़ तक गया और लगा उसकी दराज़ पर चोंच मारने। मैंने ज्यों ही दराज़ खोला तो देखा कि मेरा पासपोर्ट वहाँ पड़ा हुआ है।

मैंने कॉर्वस के लिए एक नया पिंजरा बनवा लिया है। जिस तापमान पर कॉर्वस सबसे ज्यादा आराम में रहता है- वही तापमान इस पिंजरे में बरकरार रहता है। इसके भोजन के लिए मैंने पौष्टिक विटामिनयुक्त कुछ गोलियाँ भी तैयार की हैं। कॉर्वस ने हवाई जहाज के हरेक यात्री का ध्यान आकर्षित किया है। शायद किसी ने भी आज तक कोई पालतू कौआ नहीं देखा। मैंने भी इसके चमत्कारी ‘स्वरूप’ के बारे में किसी को कुछ भी नहीं बतलाया है। वैज्ञानिक सम्मेलन तक मैं इस बात को गुप्त ही रखना चाहता हॅूं। और शायद कॉर्वस भी इसी बात को भाँपकर सामान्य कौओं का सा ही व्यवहार कर रहा है।

14 नवम्बर

होटल एक्सैल्सियर, सैन्टियागो

अभी रात के ग्यारह बजे हैं। दो दिन तक कुछ इस क़दर व्यस्त रहा कि लिखने की फ़ुर्सत मिली ही नहीं। मैं अपने भाषण तथा इसके बाद होने वाले सनसनीखेज़ घटनाक्रम का ब्यौरा ही दूंगा। संक्षेप में कहूँ तो कॉर्वस ने मेरी शान में चार चाँद लगा दिए हैं। मुझे अपना लिखित भाषण पढ़ने में क़रीब-क़रीब आधा घण्टा लगा और एक घण्टा लगा कॉर्वस के सनसनीखेज़ प्रदर्शनों में।

ज्यों ही भाषण समाप्त कर मैं मंच से नीचे उतर कर आया, मैंने पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया और ठाठ से कॉर्वस महाशय मेज पर आये। महोगनी की उस लम्बी शानदार मेज़ पर जिसके पीछे एक क़तार में समिति के सम्मानित सदस्य बैठे थे। कोने में पोडियम-माइक से मैंने अपना भाषण दिया।

भाषण ख़त्म होने तक कॉर्वस एक सूत भी अपनी जगह से नहीं हिला। किन्तु भाषण के दौरान बीच-बीच में उसने सहमति में अपनी गर्दन हिलाई उसे देखकर ऐसा लगता था मानो ध्यानपूर्वक सुनकर वह मेरी बात का समर्थन कर रहा हो। भाषण की समाप्ति के बाद सारा हॉल तालियों की भारी गड़गड़ाहट से गूंज गया। कॉर्वस भी पीछे ही थोड़े रहने वाला था। उसने भी चोंच से मेज़ थपथपा कर इसमें अपना योगदान दिया।

भाषण के बाद कॉर्वस के प्रदर्शनों ने तो बस समाँ ही बांध दिया। पिछले दो महीनों में उसने जो कुछ सीखा था उसका गवाह थी वैज्ञानिकों की वह आश्चर्यचकित भीड़। लोगों ने एकमत से इस बात को स्वीकार किया कि अपनी ज़िंदगी में इन्होंने कभी इतने बड़े चमत्कार की आशा नहीं की थी। स्थानीय अख़बार ‘कॉराइरा डैल सैन्टियागो’ ने चोंच में पैंसिल थामे कॉर्वस का सचित्र समाचार अपने सांयकालीन संस्करण के मुखपृष्ठ पर सुर्खियों में छापा था।

अधिवेशन के बाद मैं ग्रेनफैल तथा सम्मेलन अध्यक्ष कॉवेरूबियस के साथ सैन्टियागो शहर की सैर के लिए निकला। सैन्टियागो एक आकर्षक महानगर है, जिसके पूर्व में ऐंडीज पहाड़ चिली और अर्जेन्टाइना राज्यों को दो हिस्सों में बाँटता शान से खड़ा है। कुछ देर बाद कॉवेरूबियस ने कहा “तुम्हें अतिथियों के स्वागत में किए जाने वाले मनोरंजक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बारे में तो सूचना है न? मैं चाहता हूं कि तुम आज रात चिली के मशहूर जादूगर ऑर्गस का प्रोगाम जरूर देखो। उसकी ख़ासियत यह है कि अपने कार्यक्रमों में वह पक्षियों से ख़ूब काम लेता है”

एकायक मेरे कान खड़े हो गये। मेरी दिलचस्पी जगाने के लिए इतनी सूचना ही काफ़ी थी।

शाम ग्रेनफैल को ले कर मैं ऑर्गस का जादू देखने प्लाज़ा थियेटर जा पहुंचा। वस्तुतः ऑर्गस के प्रदर्शन में पक्षियों की भरमार है। और मानना पड़ेगा कि बत्तखों, तोतों, कबूतरों, मुर्गियों, सारसों, मुर्गाबियों सब को काफ़ी मेहनत के साथ काम सिखलाया गया है। पर कॉर्वस का दूर दूर तक कोई सानी नहीं है।

हाँ, पंछियों से ज़्यादा रोचक लगा मुझे उनका मालिक जादूगर ऑर्गस । तोते जैसी नुकीली नाक, चमकते हुए बीच में माँग काढ़कर बनाए हुए लम्बे बाल और नाक पर टिका एक हाई पावर चश्मा । उसका कद शायद 6 फीट से भी कहीं लम्बा था। काले लम्बे लबादे से बाहर झाँकती अपनी लम्बी- लम्बी बाहों के बलबूते पर वह दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देने में कामयाब रहा। जादू के नाम पर तो उसके पास कोई उल्लेखनीय चीज़ न थी पर उसके हावभाव और अंदाज इतने जानदार थे कि प्रदर्शन में बस मज़ा ही आ जाता था। जादू के शो के बाद हॉल से बाहर निकलते समय मैंने अपने साथी ग्रेनफैल से मज़ाक़ ही मज़ाक़ में कहा “ऑर्गस ने तो हमें जादू का खेल दिखलाया है तो क्यों न बदले में हम उसे अपना कॉर्वस दिखाएँ?”

रात 9 बजे मैंने भोजन खाया और शानदार चिली कॉफी की चुस्कियां लेकर ग्रेनफैल के साथ हॉटल के बगीचे में कुछ देर चहलकदमी की। अपने कमरे में बिस्तर पर जा कर मैंने सोने के लिए बत्तियां बुझाई ही थी कि पास रखा टेलीफोन घनघनाने लगा।

“श्रीमान शोंकू?”

“हां” – मैंने जवाब दिया।

“मैं स्वागत कक्ष से बोल रहा हूँ सर। मुझे अफ़सोस है कि मैंने इस वक़्त फ़ोन कर श्रीमान के आराम में खलल डाला पर एक सज्जन आपसे मिलने के लिए बेताब हैं और बहुत देर से ज़िद कर रहे हैं”

मैंने कहा कि मैं बेहद थका हुआ हूँ और बेहतर अगर वह आगन्तुक महोदय मुझसे कल सवेरे मिलें । मैंने सोचा ज़रूर यह कोई सिरफिरा अख़बारनवीस ही होगा। आज पत्रकारों को मैंने चार लम्बे-लम्बे इन्टरव्यू दिये थे और उनके बेहूदा सवाल सुन- सुन कर तो मेरे जैसे धीरजवान आदमी तक के सब्र का बाँध टूट गया था। मसलन एक अख़बारची ने तो मुझे यहाँ तक पूछा और वह भी बहुत संजीदगी से कि “क्या हिन्दुस्तान में कौओं की पूजा भी की जाती है?”

स्वागत कक्ष के रिसेप्शनिस्ट ने आगन्तुक से कुछ बातचीत की और फिर कहा- “श्रीमान ये कह रहे हैं कि ये आपका 5 मिनट से ज़्यादा वक़्त नही लेंगे क्यों कि ये सवेरे कहीं और व्यस्त रहेंगे”

“ये कोई पत्रकार हैं क्या?”- मैंने सवाल दागा।

“नहीं सर..ये यहाँ के मशहूर जादूगर ऑर्गस हैं”

क्रमशः

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