घनी कहानी, छोटी शाखा: सआदत हसन ‘मंटो’ की कहानी ‘नया क़ानून’ का तीसरा भाग

नया क़ानून (तीसरा भाग)

तालीम में सिफ़र होने के बावजूद मंगू कोचवान को उसके अड्डे पर एक अक़्लमंद आदमी समझा जाता था. वो अपनी सवारियों की आपस की बातचीत से कुछ वैश्विक ख़बरें पा जाता था जिसको वो अड्डे पर सुनाता था और वाहवाही लूटता था. उसे अंग्रेज़ों से सख्त़ नफ़रत थी, उसकी वजह ये थी क्यूँकि उसकी छावनी में रहने वाले गोरे उसे बहुत प्रताड़ित करते थे. मंगू हमेशा ये सोचता था कि कोई नया क़ानून अगर बने तो वो अंग्रेज़ों को सबक़ सिखाए लेकिन उसे लगता था कि ऐसा कभी न होगा और हिन्दुस्तान सदा ग़ुलाम ही रहेगा. एक रोज़ मंगू को दो सावारियों से मालूम हुआ कि हिन्दुस्तान में नया क़ानून लागू होने वाला है, ये सुन कर उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा. इस ख़ुशी को वो अपने अड्डे के साथियों से बाँटता है और दिल ही दिल ख़ुश होता है कि अँगरेज़ देश से जाने वाले हैं, उसे इस बात से भी ख़ुशी थी कि अमीरों को नए क़ानून में परेशानी होगी और ग़रीब ख़ुश होंगे. वो उन लोगों को भी हिकारत की नज़र से देखता था. अब आगे..

इस घटना के तीसरे दिन वह गवर्नमेंट कालेज के तीन छात्रों को अपने ताँगे में बिठाकर मिजंग जा रहा था कि उसने इन तीन लड़कों को आपस में बातें करते सुना,

“नये संविधान ने मेरी उम्मीदें बढ़ा दी हैं, अगर— साहब असेम्बली के मेम्बर हो गये तो किसी सरकारी आफिस में नौकरी जरूर मिल जायेगी।”

“वैसे भी बहुत सी जगहें और निकलेंगी, शायद इसी गड़बड़ में हमारे हाथ भी कुछ आ जाये”

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं।”

“वो बेकार ग्रेजुएट जो मारे-मारे फिर रहे हैं, उनमें कुछ तो कमी होगी”

इस वार्तालाप ने उस्ताद मंगू के मन में नये क़ानून की अहमियत और भी बढ़ा दी और वह उसको ऐसी चीज समझने लगा जो बहुत चमकती हो, “नया क़ानून—?” वह दिन में कई बार सोचता “यानी कोई नई चीज” और हर बार उसकी नजरों के सामने अपने घोड़े का वह नया साजोसामान आ जाता जो उसने दो साल पहले चौधरी खुदाबख़्श से बड़ी अच्छी तरह ठोंक-बजाकर खरीदा था। उस साज पर जब वह नया था, जगह-जगह लोहे की निकिल चढ़ी हुई कीलें चमकती थीं और जहाँ-जहाँ पीतल का काम था वह तो सोने की तरह दमकता था। इस लिहाज से भी “नये क़ानून” का चमकदार व रौशन होना जरूरी था।

पहली अप्रैल तक उस्ताद मंगू ने नये क़ानून के खि़लाफ़ और उसकी हिमायत में बहुत कुछ सुना मगर उसके बारे में जो तस्वीर वह अपने जेहन में बना चुका था, बदल न सका। वह समझता कि पहली अप्रैल को नये क़ानूनों के लागू होते ही सब गड़बड़ ठीक हो जायेगी और उसको विश्वास था कि उसकी आमद पर जो चीजे़ं नजर आयेंगी उनसे आँखों को ठंडक जरूर पहुंचेगी।,

आखिरकार मार्च के इक्तीस दिन खत्म हो गये और अप्रैल के शुरू होने में रात के चन्द खामोश घंटे बाकी रह गये थे। मौसम खि़लाफ़ेमामूल सर्द था और हवा में ताजगी थी। पहली अप्रैल को उस्ताद मंगू सुबह-सवेरे उठा और अस्तबल में जाकर घोड़े को ताँगे में जोता और बाहर निकल गया। उसकी तबियत आज गैरमामूली तौर पर खुशी व जोश से भरी हुई थी–वह नये क़ानून को देखने वाला था। उसने सुबह के सर्द धुंधलके में कई तंग और खुले बाजारों का चक्कर लगाया मगर उसे हर चीज पुरानी नजर आई–आसमान की तरह पुरानी। उसकी आँखें आज खास तौर पर नया रंग देखना चाहती थीं, मगर सिवाये उस कलगी के जो रंग बिरंगे परों से बनी थीं और उसके घोड़े के सर पर जमी हुई थी और सब चीजें पुरानी नजर आती थीं। यह नई कलगी उसने नये क़ानून की खुशी में 31 मार्च को चौधरी खुदाबख़्श से साढ़े चौदह आने में खरीदी थी।

घोड़े के टापों की आवाज, काली सड़क और उसके आस-पास थोड़ा-थोड़ा फासला छोड़कर लगाये हुए बिजली के खंभों, दुकानों के बोर्ड, उसके घोड़े के गले में पड़े हुए घुंघरू की झनझनाहट, बाजार में चलते-फिरते आदमी— इनमें से कौन सी चीज नई थी। जाहिर है कि कोई भी नहीं। लेकिन उस्ताद मंगू मायूस नहीं था।

“अभी बहुत सवेरा है, दुकानें भी सब की सब बन्द हैं” इस ख़्याल से उसे तसकीन थी। इसके अलावा वह यह भी सोचता था “हाईकोर्ट में तो नौ बजे के बाद ही काम शुरू होता है। अब इससे पहले नये क़ानून का क्या नजर आयेगा।”

जब उसका ताँगा गवर्नमेंट कालेज के दरवाजे के करीब पहुंचा तो कालेज के घड़ियाल ने बड़े गर्व से नौ बजाये। जो छात्र कालेज के बड़े गेट से बाहर निकल रहे थे, साफ सुन्दर कपड़े पहने हुए थे, मगर उस्ताद मंगू को न जाने क्यों उनके कपड़े मैले-मैले से नजर आये। शायद इसकी वजह यह थी कि उसकी निगाहें आज किसी बहुत जोरदार दृश्य का नजारा करने वाली थीं।

ताँगे को दायें मोड़कर वह थोड़ी देर के बाद फिर अनारकली में था। बाजार की आधी दुकानें खुल चुकी थीं और अब लोगों का आना-जाना भी बढ़ गया था। हलवाई की दुकान पर ग्राहकों की खूब भीड़ थी। मनिहारों की नुमाइशी चीजें शीशे की अलमारियों में लोगों को दर्शन का निमंत्रण दे रही थीं और बिजली के तारों पर कई कबूतर आपस में लड़-झगड़ रहे थे। मगर उस्ताद मंगू के लिए इन तमाम चीजों में कोई दिलचस्पी न थी–वह तो नये क़ानून को देखना चाहता था। ठीक उसी तरह जिस तरह वह अपने घोड़े को देख रहा था।

जब उस्ताद मंगू के घर में बच्चा पैदा होने वाला था तो उसने चार-पाँच महीने बड़ी व्याकुलता में गुजारे थे। उसको यकीन था कि बच्चा किसी न किसी दिन अवश्य पैदा होगा, मगर वह इंतजार की घड़ियाँ नहीं काट सकता था। वह चाहता था, अपने बच्चे को सिर्फ एक नजर देख ले, उसके बाद वह पैदा होता रहे। चुनांचे इसी पराजित इच्छा के तहत उसने कई बार अपनी बीमार बीवी के पेट को दबाकर और उसके ऊपर कान रख-रखकर अपने बच्चे के सम्बन्ध में कुछ जानना चाहा था। मगर नाकाम रहा था, एक दफा वह इंतजार करते-करते इस कदर तंग आ गया था कि अपनी बीवी पर भी बरस पड़ा था–

“तू हर वक्त मुर्दे की तरह पड़ी रहती है, उठ जरा चल-फिर, तेरे अंग में थोड़ी सी ताकत तो आये, यों तख्ता बने रहने से कुछ न हो सकेगा। तू समझती है, इस तरह लेटे-लेटे बच्चा जन देगी।”

उस्ताद मंगू स्वभाव से बहुत जल्दबाज था। वह हर सबब की अमली तशकील देखने का न सिर्फ ख़्वाहिशमन्द था बल्कि जिज्ञासु था। उसकी बीवी गंगावती, उसकी इस किस्म की बेकरारी को देखकर आमतौर पर यह कहा करती थी–

“अभी कुंआ खोदा नहीं गया और तुम प्यास से बेहाल हो रहे हो।”

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