घनी कहानी, छोटी शाखा: सआदत हसन ‘मंटो’ की कहानी ‘नया क़ानून’ का दूसरा भाग

नया क़ानून (दूसरा भाग)

तालीम में सिफ़र होने के बावजूद मंगू कोचवान को उसके अड्डे पर एक अक़्लमंद आदमी समझा जाता था. वो अपनी सवारियों की आपस की बातचीत से कुछ वैश्विक ख़बरें पा जाता था जिसको वो अड्डे पर सुनाता था और वाहवाही लूटता था. उसे अंग्रेज़ों से सख्त़ नफ़रत थी, उसकी वजह ये थी क्यूँकि उसकी छावनी में रहने वाले गोरे उसे बहुत प्रताड़ित करते थे. मंगू हमेशा ये सोचता था कि कोई नया क़ानून अगर बने तो वो अंग्रेज़ों को सबक़ सिखाए लेकिन उसे लगता था कि ऐसा कभी न होगा और हिन्दुस्तान सदा ग़ुलाम ही रहेगा. एक रोज़ मंगू को दो सावारियों से मालूम हुआ कि हिन्दुस्तान में नया क़ानून लागू होने वाला है, ये सुन कर उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा. अब आगे…

दो मारवाड़ी जो कचहरी में अपने दीवानी मुक़दमे के सिलसिले में आये थे, घर जाते हुए नये संविधान यानी इण्डिया ऐक्ट के बारे में आपस में बातें कर रहे थे।
“सुना है कि पहली अप्रैल से हिन्दुस्तान में नया क़ानून चलेगा–क्या हर चीज बदल जायेगी”
“हर चीज़ तो नहीं बदलेगी मगर कहते हैं कि बहुत कुछ बदल जायेगा और हिन्दुस्तानियों को आज़ादी मिल जायेगी।”
“क्या ब्याज के बारे में भी कोई नया क़ानून पास होगा?”
“यह पूछने की बात है, कल किसी वकील से बात करेंगे।”
इन मारवाड़ियों की गुफ़्तगू उस्ताद मंगू के दिल में नाक़ाबिले बयान ख़ुशी पैदा कर रही थी। वह अपने घोड़े को हमेशा गालियाँ देता था और चाबुक से बहुत बुरी तरह पीटा करता था। मगर उस रोज़ वह बार-बार पीछे मुड़कर मारवाड़ियों की तरफ़ देखता रहा और अपनी बढ़ी हुई मूंछों के बाल एक उंगली से बड़ी सफ़ाई के साथ ऊंचे करके घोड़े की पीठ पर बागें ढीली करते हुए बड़े प्यार से कहता,
“चल बेटा चल–ज़रा हवा से बातें करके दिखा दे।”
मारवाड़ियों को उनके ठिकाने पहुंचा कर उसने अनारकली में दीनू हलवाई की दुकान पर आधा सेर दही की लस्सी पी कर एक बड़ी डकार ली और मूंछों को मुँह में दबाकर उनको चूसते हुए ऐसे ही बुलन्द आवाज़ में कहा,
“हट तेरी ऐसी की तैसी”
शाम को जब वह अड्डे को लौटा तो मामूल के ख़िलाफ़ उसे वहाँ कोई जान-पहचान वाला आदमी नहीं मिला। यह देखकर उसके सीने में एक अजीबोग़रीब तूफ़ान मचलने लगा। आज वह एक बड़ी खबर अपने दोस्तों को सुनाने वाला था–बहुत बड़ी ख़बर, और इस ख़बर को अपने अन्दर से बाहर निकालने के लिए वह छटपटा रहा था, लेकिन वहाँ कोई था ही नहीं।

आधे घंटे तक वह चाबुक़ बग़ल में दबाये स्टेशन के अड्डे की लोहे की छत के नीचे बैचेनी की हालत में टहलता रहा, उसके दिमाग़ में बड़े अच्छे-अच्छे ख़यालात आ रहे थे। नये क़ानून के लागू होने की ख़बर ने उसको एक नई दुनिया में ला खड़ा किया था। वह उस नये क़ानून के बारे में, जो पहली अप्रैल को हिन्दुस्तान में रायज़ होने वाला था, अपने दिमाग़ की तमाम बत्तियाँ रौशन करके, गहराई से सोच रहा था। उसके कानों में मारवाड़ी की यह आशंका कि,

“क्या ब्याज के बारे में भी कोई नया क़ानून पास होगा?”

बार-बार गूंज रहा था और उसके तमाम जिस्म में ख़ुशी की एक लहर दौड़ रही थी, कई बार अपनी घनी मूंछों के अन्दर हंस कर उसने मारवाड़ियों को गाली दी—

“ग़रीबों की खटिया में घुसे हुए खटमल–नया क़ानून इनके लिये खौलता हुआ पानी होगा”

वह बहुत प्रसन्न था। ख़ासकर उस वक़्त उसके दिल में ठंडक पहुंचती जब वह ख़याल करता कि गोरों–सफ़ेद चूहों (वह उनको इसी नाम से याद करता था) की थूथनियाँ नये क़ानून के आते ही बिलों में हमेशा के लिए ग़ायब हो जायेंगी।

जब नन्हू गंजा, पगड़ी बगल में दबाये अड्डे में दाखिल हुआ तो उस्ताद मंगू उससे बढ़कर मिला और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बुलन्द आवाज़ से कहने लगा,

“ला हाथ इधर— ऐसी खबर सुनाऊं कि जी ख़ुश हो जाये–तेरी इस गंजी खोपड़ी पर बाल उग आयें।”

और यह कहकर मंगू ने बड़े मज़े ले-लेकर नये क़ानून के बारे में अपने दोस्तों से बातें शुरू कर दीं। बातचीत के दौरान उसने कई बार नत्थू गंजे के हाथ पर जोर से अपना हाथ मार कर कहा,

“तू देखता रह, क्या बनता है, यह रूस वाला बादशाह कुछ न कुछ जरूर करके रहेगा।”

उस्ताद मंगू मौजूदा सोवियत व्यवस्था की साम्यवादी गतिविधियों के बारे में बहुत कुछ सुन चुका था और उसे वहाँ के नये क़ानून और दूसरी नई चीजें बहुत पंसद थीं। इसीलिए उसने रूस वाले बादशाह को “इण्डिया ऐक्ट” यानी नये संविधान के साथ मिला दिया और पहली अप्रैल को जो नये परिवर्तन होने वाले थे, उन्हें वह “रूस वाले बादशाह” के असर का नतीजा समझता था। कुछ अर्से से पेशावर और दूसरे शहरों में “सुर्ख पोशों” का आन्दोलन जारी था। उस्ताद मंगू ने इस आन्दोलन को अपने दिमाग में “रूस वाले बादशाह” और फिर नये क़ानून के साथ घुला-मिला दिया था। इसके अलावा जब कभी वह किसी से सुनता कि फलाँ शहर में इतने बम बनाने वाले पकड़े गये हैं, या फलाँ जगह इतने लोगों पर बगावत के आरोप में मुकदमा चलाया गया है तो इन तमाम घटनाओं को नये क़ानून की पूर्वपीठिका समझता और दिल ही दिल में बहुत खुश होता था। एक दिन उसके ताँगे में दो बैरिस्टर बैठे नये क़ानून पर बड़े जोर-जोर से आलोचना कर रहे थे और वह खामोशी से उनकी बातें सुन रहा था। उनमें से एक, दूसरे से कह रहा था–

“नये विधान का दूसरा हिस्सा फैडरेशन है, जो मेरी समझ में अभी तक नहीं आया–ऐसी फैडरेशन संसार के इतिहास में आज तक न सुनी, न देखी गई। राजनैतिक दृष्टिकोण के हिसाब से भी यह फैडरेशन बिल्कुल गलत है, यों कहना चाहिए कि यह कोई फैडरेशन है ही नहीं।”

इन बैरिस्टरों के दरम्यान जो वार्ता हुई, चूंकि उसमें अधिकांश शब्द अंग्रेजी के थे, इससे उस्ताद मंगू सिर्फ ऊपर के ही वाक्य को किसी हद तक समझा और उससे धारणा बनाई कि ये लोग हिन्दुस्तान में नये क़ानून की आमद को बुरा समझते हैं। ये नहीं चाहते कि हमारा वतन आजाद हो। चुनांचे इस विचार के तहत उसने इन दो बैरिस्टरों को हिकारत की निगाह से देखकर मन ही मन कहा, “टोडी बच्चे।”

जब कभी वह किसी को दबी जबान में “टोडी बच्चा” कहता तो दिल में यह महसूस करके बड़ा प्रसन्न होता था कि उसने इस नाम को सही जगह इस्तेमाल किया है और यह कि वह शरीफ आदमी और टोडी बच्चे में भेद करने की क्षमता रखता है।

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