घनी कहानी, छोटी शाखा: सआदत हसन ‘मंटो’ की कहानी ‘नया क़ानून’ का पहला भाग

नया क़ानून (पहला भाग)

मंगू कोचवान अपने अड्डे में बहुत अक़्लमंद आदमी समझा जाता था, हालाँकि उसकी तालीमी हैसियत सिफ़र के बराबर थी और उसने कभी स्कूल का मुँह भी नहीं देखा था। लेकिन इसके बावजूद उसे दुनिया भर की चीज़ों का इल्म था। अड्डे के वह तमाम कोचवान जिनको यह जानने की ख्व़ाहिश होती थी कि दुनिया के अन्दर क्या हो रहा है, उस्ताद मंगू के व्यापक ज्ञान से अच्छी तरह परिचित थे।

पिछले दिनों उस्ताद मंगू ने अपनी एक सवारी से स्पेन में जंग छिड़ जाने की अफ़वाह सुनी थी तो उसने गामा चौधरी के चौड़े काँधे पर थपकी देकर गंभीर लहजे से भविष्यवाणी की थी–

“देख लेना चौधरी, थोड़े ही दिनों में स्पेन के अन्दर जंग छिड़ जायेगी।”
और जब गामा चौधरी ने उससे यह पूछा था कि स्पेन कहाँ पड़ता है तो उस्ताद मंगू ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया था,
“विलायत में और कहाँ”?
स्पेन में जंग छिड़ी और जब हर शख्स को इसका पता चल गया तो स्टेशन के अड्डे में जितने कोचवान घेरा बनाकर हुक्का पी रहे थे, दिल ही दिल में उस्ताद मंगू का लोहा मान रहे थे और उस्ताद मंगू उस वक़्त माल रोड की चमकीली सतह पर ताँगा चलाते हुए अपनी सवारी से ताज़ा हिन्दू-मुस्लिम दंगे पर विचार-विमर्श कर रहे थे!

उस रोज़ शाम के क़रीब जब वह अड्डे में आया तो उसका चेहरा असाधारण तौर पर तमतमा रहा था। हुक्के का दौर चलते-चलते जब हिन्दू-मुस्लिम दंगे की बात छिड़ी तो उस्ताद मंगू ने सर पर से ख़ाकी पगड़ी उतारी और बग़ल में दाब कर बड़े चिंतित स्वर में कहा–
“यह किसी पीर की बददुआओं का नतीजा है कि आये दिन हिन्दुओं और मुसलमानों में चाकू-छूरियाँ चलते रहते हैं और मैंने अपने बड़ों से सुना है कि अकबर बादशाह ने किसी पीर का दिल दुखाया था, उस पीर ने जलकर बददुआ दी थी– “जा तेरे हिन्दुस्तान में हमेशा फ़साद ही होते रहेंगे”–और देख लो जब से अकबर बादशाह का राज ख़त्म हुआ है–हिन्दुस्तान में फ़साद पर फ़साद होते रहते हैं”। यह कहकर उसने ठंडी साँस भरी और फिर हुक्के का दम लगाकर अपनी बात शुरू की,
“ये कांग्रेसी हिन्दुस्तान को आज़ाद करना चाहते हैं। मैं कहता हूँ कि अगर ये लोग हज़ार साल भी सर पटकते रहें तो कुछ न होगा। बड़ी से बड़ी बात यह होगी कि अंग्रेज चला जायेगा और कोई इटली वाला आ जायेगा। या वह रूस वाला जिसके बारे में मैंने सुना है कि बहुत तगड़ा आदमी है, लेकिन हिन्दुस्तान सदा गुलाम रहेगा। हाँ, मैं यह कहना भूल ही गया कि पीर ने यह बददुआ भी दी थी कि हिन्दुस्तान पर हमेशा बाहर के आदमी राज करते रहेंगे।”

उस्ताद मंगू को अंग्रेजों से बड़ी नफ़रत थी, इस नफ़रत का सबब तो वह यह बतलाया करता था कि वो उसके हिन्दुस्तान पर अपना सिक्का चलाते हैं और तरह-तरह के ज़ुल्म ढाते हैं। मगर उसकी घृणा की सबसे बड़ी वजह यह थी कि छावनी के गोरे उसे बहुत सताया करते थे। वो उसके साथ कुछ ऐसा सुलूक करते थे गोया वह ज़लील कुत्ता हो। इसके अलावा उसे उनका रंग भी बिल्कुल पंसद नहीं था। जब किसी गोरे के सुर्ख व सफेद चेहरे को देखता तो उसे मतली सी आ जाती। न मालूम क्यों वह कहा करता था कि उनके लाल झुर्रियों भरे चेहरे देखकर मुझे वह लाश याद आ जाती है, जिसके जिस्म पर से ऊपर की झिल्ली गल-गल कर सड़ रही हो।

जब किसी शराबी गोरे से उसका झगड़ा हो जाता तो सारा दिन उसका जी खराब रहता और शाम को अड्डे में आकर वह हल मार्का सिगरेट पीता या हुक्के के कश लगाते हुए उस गोरे को जी भरकर सुनाया करता।

“^^^^” यह मोटी गाली देने के बाद वह अपने सर को ढीली पगड़ी समेत झटका देकर कहा करता था,
“आग लेने आये थे, अब घर के मालिक ही बन गये हैं। नाक में दम कर रखा है इन बन्दरों की औलादों ने, यूँ रोब गाँठते हैं, जैसे हम उनके बाबा के नौकर हैं—।”
इस पर भी उसका ग़ुस्सा ठंडा नहीं होता था। जब तक उसका कोई साथी उसके पास बैठा रहता, वह अपने सीने की आग उगलता रहता।

“शक्ल देखते हो न तुम उसकी–जैसे कोढ़ हो रहा है। बिल्कुल मुर्दार, एक धप्पे की मार और गिट-पिट-गिट-पिट यों बक रहा था, जैसे मार ही डालेगा। तेरी जान की कसम, पहले पहल जी में आया उस गोरे बदख्वार की खोपड़ी के पुर्ज़े उड़ा दूँ लेकिन इस ख़याल से टल गया कि इस मरदूद को मारना अपनी हतक है—” यह कहते-कहते वह थोड़ी देर के लिए ख़ामोश हो जाता और नाक को ख़ाकी कमीज की आस्तीन से साफ़ करने के बाद फिर बड़बड़ाने लग जाता–

“क़सम है भगवान की इन लाट साहबों के नाज़ उठाते-उठाते तंग आ गया हूँ। जब कभी इनका मनहूस चेहरा देखता हूँ, रगों में ख़ून खौलने लग जाता है। कोई नया क़ानून-वानून बने तो इन लोगों से निजात मिले। तेरी क़सम जान में जान आ जाये।”

और जब एक रोज़ उस्ताद मंगू ने कचहरी से अपने ताँगे पर दो सवारियाँ लादीं और उनकी गुफ्तगू से उसे पता चला कि हिन्दुस्तान में नया संविधान लागू होने वाला है तो उसकी ख़ुशी की हद न रही।

क्रमशः

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