घनी कहानी, छोटी शाखा: सआदत हसन मंटो की कहानी “राम खिलावन” का अंतिम भाग

राम खिलावन
अंतिम भाग
अब तक आपने पढ़ा.. कहानी बम्बई के एक मस्त-मौला हिन्दू धोबी राम खिलावन और उसके मुस्लिम साब की है जिसके घर वो हर इतवार कपड़े लेने और देने के सिलसिले में जाता है। साब के पास पैसों की इस क़दर दिक़्क़त है कि वो धोबी का हिसाब नहीं चुका पा रहा, बहरहाल बातचीत के दौरान राम खिलावन को ये मालूम चलता है कि ग़रीब सा दिख रहा साब असल में कोलाबा के सईद नामक एक बड़े बैरिस्टर का भाई है जो अब विदेश चला गया है। अपनी शर्मिंदगी को ना छुपाते हुए साब धोबी को उसका पैसा आइंदा में चुकाने की बात कहता है। कुछ दिनों में साब की शादी हो जाती है और इसके साथ ही उसके मुफ़लिसी के दिन ख़त्म हो जाते हैं। साब की बीवी राम खिलावन की ईमानदारी की परीक्षा लेती है जिसमें राम खिलावन कामयाब रहता है। शादी के दो साल बाद साब बम्बई से दिल्ली चला जाता है जहाँ वो डेढ़ साल रहकर वापिस आ जाता है। साब के घर फिर वही धोबी राम खिलावन आने लगता है लेकिन इस बीच वो ज़्यादा शराब पीने की वजह से बुरी तरह बीमार हो जाता है, उसकी बीमारी की हालत में साब की बेगम उसका ख़याल रखती हैं और जल्दी ही वो अच्छा हो जाता है। राम खिलावन साब की बीवी का ये एहसान बार-बार याद करता है लेकिन इसी बीच देश में बँटवारे की वजह से बड़े स्तर पर हिन्दू-मुसलमान के फ़साद शुरु हो जाते हैं। राम खिलावन जो कि दारु से तौबा कर चुका था, फिर शराब पीने लगता है। अब आगे..

मैंने उस की बात काट कर ज़रा तेज़ी से कहा। “धोबी……. दारू शुरू करदी?”
धोबी हँसा “दारू?……. दारू कहाँ मिलती है साब?”
मैंने और कुछ कहना मुनासिब न समझा। उसने मैले कपड़ों की गठड़ी बनाई और सलाम करके चला गया।

चंद दिनों में हालात बहुत ही ज़्यादा ख़राब होगए। लाहौर से तार पर तार आने लगे कि सब कुछ छोड़ो और जल्दी चले आओ। मैंने हफ़्ते के रोज़ इरादा कर लिया कि इतवार को चल दूंगा। लेकिन मुझे सुबह सवेरे निकल जाना था। कपड़े धोबी के पास थे। मैंने सोचा कर्फ्यू से पहले-पहले उसके यहाँ जा कर ले आऊं,चुनाँचे शाम को विक्टोरिया लेकर महा कुशमी रवाना हो गया।

कर्फ़यू के वक़्त में भी एक घंटा बाक़ी था। इसलिए आमद-ओ-रफ़्त जारी थीं। ट्रेनें चल रही थीं। मेरी विक्टोरिया पुल के पास पहुंची तो एकदम शोर बरपा हुआ। लोग अंधाधुंद भागने लगे। ऐसा मालूम हुआ जैसे सांडों की लड़ाई हो रही हो……. हुजूम छदरा हुआ तो देखा, दो भैंसों के पास बहुत से धोबी लाठियाँ हाथ में लिए नाच रहे हैं और तरह-तरह की आवाज़ें निकाल रहे हैं। मुझे उधर ही जाना था मगर विक्टोरिया वाले ने इनकार कर दिया। मैंने उसका किराया अदा किया और पैदल चल पड़ा……. जब धोबियों के पास पहुंचा तो वो मुझे देख कर ख़ामोश होगए।

मैंने आगे बढ़ कर एक धोबी से पूछा। “राम खिलावन कहाँ रहता है?”
एक धोबी जिस के हाथ में लाठी थी झूमता हुआ उस धोबी के पास आया जिससे मैंने सवाल किया। “क्या पूछत है?”
“पूछत है राम खिलावन कहाँ रहता है?”
शराब से धुत धोबी ने क़रीब-क़रीब मेरे ऊपर चढ़ कर पूछा। “तुम कौन है?”
“मैं?……. राम खिलावन मेरा धोबी है।”
“राम खिलावन तहार धोबी है……. तू किस धोबी का बच्चा है।”
एक चिल्लाया। “हिंदू धोबी या मुस्लिमीन धोबी का।”

तमाम धोबी जो शराब के नशे में चूर थे मुक्के तानते और लाठियाँ घुमाते मेरे इर्द-गिर्द जमा हो गए। मुझे उनके सिर्फ़ एक सवाल का जवाब देना था। मुस्लमान हूँ या हिंदू?……. मैं बेहद ख़ौफ़ज़दा हो गया। भागने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। क्योंकि मैं उनमें घिरा हुआ था। नज़दीक कोई पुलिस वाला भी नहीं था। जिसको मदद के लिए पुकारता……. और कुछ समझ में न आया तो बेजोड़ अल्फ़ाज़ में उनसे गुफ़्तुगू शुरू कर दी। “राम खिलावन हिंदू है……. हम पूछता है वो किधर रहता है……. उसकी खोली कहाँ है……. दस बरस से वो हमारा धोबी है……. बहुत बीमार था…. हम ने उसका इलाज कराया था…. हमारी बेगम……. हमारी मेम साहब यहाँ मोटर लेकर आई थी……. ” यहाँ तक मैंने कहा कि तो मुझे अपने ऊपर बहुत तरस आया। दिल ही दिल में बहुत ख़फ़ीफ़ हुआ कि इंसान अपनी जान बचाने के लिए कितनी नीची सतह पर उतर आता है इस एहसास ने जुर्रत पैदा करदी चुनाँचे मैंने उन से कहा “मैं मुस्लिमीन हूँ।”

“मार डालो……. मार डालो” का शोर बुलंद हुआ।
धोबी जो कि शराब के नशे में धुत था एक तरफ़ देख कर चिल्लाया। “ठहरो……. इसे राम खिलावन मारेगा।”
मैंने पलट कर देखा। राम खिलावन मोटा डंडा हाथ में लिए लड़खड़ा रहा था। इस ने मेरी तरफ़ देखा और मुसलमानों को अपनी ज़बान में गालियाँ देना शुरू कर दीं। डंडा सर तक उठा कर गालियाँ देता हुआ वो मेरी तरफ़ बढ़ा। मैंने तहक्कुमाना लहजे में कहा। “राम खिलावन।”
राम खिलावन दहाड़ा। “चुप कर बे राम खिलावन के……. ”
मेरी आख़िरी उम्मीद भी डूब गई। जब वो मेरे क़रीब आ पहुंचा तो मैंने ख़ुश्क गले से हौले से कहा। “मुझे पहचानते नहीं राम खिलावन?”
राम खिलावन ने वार करने के लिए डंडा उठाया…. एकदम उस की आँखें सिकुड़ें, फिर फैलें, फिर सिकुड़ें। डंडा हाथ से गिराकर उसने क़रीब आकर मुझे ग़ौर से देखा और पुकारा। “साब!” फिर वो अपने साथियों से मुख़ातिब हुआ “ये मुस्लिमीन नहीं….साब है……. बेगम साब का साब……. वो मोटर लेकर आया था…….डाक्टर के पास ले गया था…. ने मेरा जुलाब ठीक किया था।”

राम खिलावन ने अपने साथियों को बहुत समझाया मगर वो न माने……. सब शराबी थे। तू-तू मैं-मैं शुरू हो गई। कुछ धोबी राम खिलावन की तरफ़ हो गए और हाथापाई की नौबत आ गई। मैंने मौक़ा ग़नीमत समझा और वहाँ से खिसक गया।
दूसरे रोज़ सुबह नौ बजे के क़रीब मेरा सामान तैय्यार था। सिर्फ़ जहाज़ के टिक्टों का इंतिज़ार था जो एक दोस्त ब्लैक मार्किट से हासिल करने गया था।

मैं बहुत बेक़रार था। दिल में तरह-तरह के जज़्बात उबल रहे थे। जी चाहता था कि जल्दी टिकट आ जाऐं और मैं बंदरगाह की तरफ़ चल दूँ। मुझे ऐसा महसूस होता था कि अगर देर हो गई तो मेरा फ़्लैट मुझे अपने अंदर क़ैद करलेगा।
दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने सोचा टिकट आ गए। दरवाज़ा खोला तो बाहर धोबी खड़ा था।
“साब सलाम!”
“सलाम”
“मैं अंदर आजाऊँ?”
“आओ”
वो ख़ामोशी से अंदर दाख़िल हुआ। गठड़ी खोल कर उसने कपड़े निकाल पलंग पर रखे। धोती से अपनी आँखें पोंछीं और गुलो गीर आवाज़ में कहा। “आप जा रहे हैं साब?”
“हाँ”
उसने रोना शुरू कर दिया। “साब, मुझे माफ़ कर दो……. ये सब दारू का क़ुसूर था……. और दारू……. दारू आजकल मुफ़्त मिलती है……. सेठ लोग बांटता है कि पी कर मुस्लिमीन को मारो……. मुफ़्त की दारू कौन छोड़ता है साब….. हम को माफ़ करदो…. हम पिए ला था…. साईद शालीम बालिशटर हमारा बहुत मेहरबान होता…. हम को एक पगड़ी, एक धोती, एक कुर्ता दिया होता……. तुम्हारा बेगम साब हमारा जान बचाया होता…. जुलाब से हम मरता होता…. वो मोटर लेकर आता। डाक्टर के पास ले जाता। इतना पैसा ख़र्च करता…. मुल्क-मुल्क जाता…. बेगम साब से मत बोलना। राम खिलावन……. ”
उसकी आवाज़ गले में रन्ध गई। गठड़ी की चादर कांधे पर डाल कर चलने लगा तो मैंने रोका “ठहरो राम खिलावन।”
लेकिन वो धोती का लॉंग सँभालता तेज़ी से बाहर निकल गया।

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