घनी कहानी, छोटी शाखा: सआदत हसन मंटो की कहानी “राम खिलावन” का दूसरा भाग

राम खिलावन
दूसरा भाग
अब तक आपने पढ़ा.. कहानी बम्बई के एक मस्त-मौला हिन्दू धोबी राम खिलावन और उसके मुस्लिम साब की है जिसके घर वो हर इतवार कपड़े लेने और देने के सिलसिले में जाता है। साब के पास पैसों की इस क़दर दिक़्क़त है कि वो धोबी का हिसाब नहीं चुका पा रहा, बहरहाल बातचीत के दौरान धोबी को ये मालूम चलता है कि ग़रीब सा दिख रहा साब असल में कोलाबा के सईद नामक एक बड़े बैरिस्टर का भाई है जो अब विदेश चला गया है। अपनी शर्मिंदगी को ना छुपाते हुए साब धोबी को उसका पैसा आइंदा में चुकाने की बात कहता है। कुछ दिनों में साब की शादी हो जाती है और इसके साथ ही उसके मुफ़लिसी के दिन ख़त्म हो जाते हैं। साब की बीवी धोबी की ईमानदारी की परीक्षा लेती है जिसमें धोबी कामयाब रहता है.. अब आगे..

शादी के दो बरस बाद मैं दिल्ली चला गया। डेढ़ साल वहाँ रहा, फिर वापस बंबई आ गया और माहिम में रहने लगा। तीन महीने के दौरान में हमने चार धोबी तबदील किए क्यूँकि बेहद बेईमान और झगड़ालू थे। हर धुलाई पर झगड़ा खड़ा हो जाता था। कभी कपड़े कम निकलते थे, कभी धुलाई निहायत ज़लील होती थी। हमें अपना पुराना धोबी याद आने लगा। एक रोज़ जबकि हम बिलकुल बग़ैर धोबी के रह गए थे वो अचानक आ गया और कहने लगा। “साब को हमने एक दिन बस में देखा.. हम बोला, ऐसा कैसा…साब तो दिल्ली चला गया था……हमने इधर बाई-ख़ला में तपास किया। छापा वाला बोला, उधर माहिम में तपास करो……. बाजू वाली चाली में साब का दोस्त होता……. उससे पूछा और आ गया।”

हम बहुत ख़ुश हुए और हमारे कपड़ों के दिन हंसी ख़ुशी गुज़रने लगे।

कांग्रस बरसर-ए-इक्तदार आई तो इम्तिना-ए-शराब का हुक्म नाफ़िज़ हो गया। अंग्रेज़ी शराब मिलती थी लेकिन देसी शराब की कशीद और फ़रोख़्त बिलकुल बंद होगई। निन्नानवे फ़ीसदी धोबी शराब के आदी थे.. दिन भर पानी में रहने के बाद शाम को पाओ आध पाओ शराब उनकी ज़िंदगी का जुज़्व बन चुकी थी… हमारा धोबी बीमार हो गया। इस बीमारी का इलाज उसने उस ज़हरीली शराब से किया जो नाजायज़ तौर पर कशीद करके छुपे चोरी बिकती थी। नतीजा ये हुआ कि उसके मादे में ख़तरनाक गड़बड़ पैदा हो गई जिस ने उसको मौत के दरवाज़े तक पहुंचा दिया।

मैं बेहद मसरूफ़ था। सुबह छः बजे घर से निकलता था और रात को दस-साढ़े दस बजे लौटता था। मेरी बीवी को जब उस की ख़तरनाक बीमारी का इल्म हुआ तो वो टैक्सी लेकर उस के घर गई। नौकर और शोफ़र की मदद से उसको गाड़ी में बिठाया और डाक्टर के पास ले गई। डाक्टर बहुत मुतअस्सिर हुआ चुनाँचे उसने फ़ीस लेने से इनकार कर दिया। लेकिन मेरी बीवी ने कहा। “डाक्टर साहिब, आप सारा सवाब हासिल नहीं कर सकते।”

डाक्टर मुस्कुराया। “तो आधा-आधा कर लीजीए।”

डाक्टर ने आधी फ़ीस क़बूल कर ली।

धोबी का बाक़ायदा इलाज हुआ। मादे की तकलीफ़ चंद इंजैक्शनों ही से दूर होगई। नक़ाहत थी, वो आहिस्ता-आहिस्ता मुक़व्वी दवाओं के इस्तिमाल से ख़त्म होगई। चंद महीनों के बाद वो बिलकुल ठीक-ठाक था और उठते बैठते हमें दुआएँ देता था। “भगवान साब को साईद शालीम बालिशटर बनाए…. उधर कोलाबे में साब रहने को जाये…. बावा लोग हो… बहुत-बहुत पैसा हो…. बेगम साब धोबी को लेने आया…. मोटर में…. उधर किले(क़िले) में बहुत बड़े डाक्टर के पास ले गया जिसके पास मेम होता……. भगवान बेगम साब को ख़ुस रखे……. ”

कई बरस गुज़र गए। इस दौरान में कई सयासी इन्क़िलाब आए। धोबी बिला-नागा इतवार को आता रहा। उसकी सेहत अब बहुत अच्छी थी। इतना अर्सा गुज़रने पर भी वो हमारा सुलूक नहीं भूला था। हमेशा दुआएँ देता था। शराब क़तई तौर पर छूट चुकी थी। शुरू में वो कभी-कभी उसे याद किया करता था। पर अब नाम तक न लेता था। सारा दिन पानी में रहने के बाद थकन दूर करने के लिए अब उसे दारू की ज़रूरत महसूस नहीं होती थी।

हालात बहुत ज़्यादा बिगड़ गए थे। बटवारा हुआ तो हिंदू-मुस्लिम फ़सादात शुरू हो गए। हिंदूओं के इलाक़ों में मुस्लमान और मुस्लमानों के इलाक़ों में हिंदू दिन की रोशनी और रात की तारीकी में हलाक किए जाने लगे। मेरी बीवी लाहौर चली गई।

जब हालात और ज़्यादा ख़राब हुए तो मैंने धोबी से कहा। “देखो धोबी अब तुम काम बंद कर दो……. ये मुस्लमानों का मुहल्ला है, ऐसा न हो कोई तुम्हें मार डाले।”

धोबी मुस्कुराया। “साब अपुन को कोई नहीं मारता।”

हमारे मुहल्ले में कई वारदातें हुईं मगर धोबी बराबर आता रहा।

एक इतवार मैं घर में बैठा अख़बार पढ़ रहा था। खेलों के सफ़्हे पर क्रिकेट के मैचों का स्कोर दर्ज था और पहले सफ़ह पर फ़सादात के शिकार हिंदूओं और मुस्लमानों के आदाद-ओ-शुमार……. मैं इन दोनों की ख़ौफ़नाक मुमासिलत पर ग़ौर कर रहा था कि धोबी आ गया। कापी निकाल कर मैंने कपड़ों की पड़ताल शुरू कर दी तो धोबी ने हंस-हंस के बातें शुरू कर दीं। “साईद शालीम बालिशटर बहुत अच्छा आदमी होता…यहाँ से जाता तो हम को एक पगड़ी, एक धोती, एक कुर्ता दिया होता….. तुम्हारा बेगम साब भी एक दम अच्छा आदमी होता….. बाहर गाम गया है ना?……. अपने मुल्क में?……. उधर कागज लिखो तो हमारा सलाम बोलो….. मोटर लेकर आया हमारी खोली में……. हमको इतना जुलाब आना होता… डाक्टर ने सोई लगाया….. एक दम ठीक हो गया…..उधर कागज लिखो तो हमारा सलाम बोलो……. बोलो राम खिलावन बोलता है, हमको भी कागज लिखो……. ”

क्रमशः

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