घनी कहानी, छोटी शाखा: राधिकारमण प्रसाद सिंह की लिखी कहानी “कानों में कँगना” का अंतिम भाग

(हिंदी की पहली कहानी कौन-सी है? इस सवाल पर अलग-अलग जानकारों के अलग-अलग मत हैं और उन मतों के अनुसार ही कुछ कहानियों को हिंदी की पहली कहानी माना जाता है। कुछ दिनों से आप “घनी कहानी छोटी शाखा” में पढ़ रहे हैं, ऐसी ही कुछ कहानियों को, जो मानी जाती हैं हिंदी की पहली कहानियों में से एक..इन दिनों आप पढ़ रहे हैं “राधिकारमण प्रसाद सिंह” की लिखी कहानी “कानों में कँगना”..आज पढ़िए तीसरा और अंतिम भाग)

कानों में कँगना-राधिकारमण प्रसाद सिंह 

भाग-3 

 (अब तक आपने पढ़ा..नरेंद्र, जो हृषीकेश में अपने पिता के मित्र योगीश्वर के पास रहकर धर्म ग्रंथों की शिक्षा ले रहा है, योगीश्वर की बेटी किरन की निश्छल स्वभाव से रोज़ मिलता है, लेकिन मन उससे इस तरह जुड़ा नहीं होता। अपनी शिक्षा के आख़िरी दिन जब नरेंद्र  पिता की भेंट योगीश्वर के पास लाता है तो योगीश्वर लेने से मना कर देते हैं पर किरन भेंट में अपने लिए आए कँगन लेकर भाग जाती है। बाद में नरेंद्र देखता है किरन ने कँगन कानों में पहने हैं क्योंकि वो इस बात से अनभिज्ञ है कि कँगन हाथों में पहने जाते हैं। उसका ये भोलापन और मासूमियत नरेंद्र के हृदय तक पहुँचते हैं और इस बात का आभास योगीश्वर को भी होता है और वो किरन का हाथ नरेंद्र को सौंप देते हैं। नरेंद्र के मन में एक ही बात होती है कि क्या दुनियादारी से दूर रहती आयी ये सादगी दुनिया में सुरक्षित रह पाएगी? होता भी यही है कँगन को कानों में सजाने वाली किरन अब साज-सज्जा और बनाव-शृंगार में डूबी मिलती। उसका ये रूप नरेंद्र को और भी भाता, पर कभी-कभी मन पहले की सादगी को भी ढूँढने लगता, फिर रूप-सौंदर्य से बहल भी जाता। अब आगे…)

यों ही साल-दो-साल मुरादाबाद में कट गये। एक दिन मोहन के यहाँ नाच देखने गया। वहीं किन्नरी से आँखें मिलीं, मिलीं क्या, लीन हो गईं। नवीन यौवन, कोकिल-कण्ठा, चतुर चंचल चेष्टा तथा मायावी चमक – अब चित्त को चलाने के लिए और क्या चाहिए। किन्नरी सचमुच किन्नरी ही थी नाचनेवाली नहीं, नचानेवाली थी। पहली बार देखकर उसे इस लोक की सुन्दरी समझना दुस्तर था। एक लपट जो लगती – किसी नशा-सी चढ़ जाती। यारों ने मुझे और भी चढ़ा दिया। आँखें मिलती-मिलती मिल गईं, हृदय को भी साथ-साथ घसीट ले गईं।

फिर क्या था – इतने दिनों की धर्मशिक्षा, शतवत्सर की पूज्य लक्ष्मी, बाप-दादों की कुल-प्रतिष्ठा, पत्नी से पवित्र-प्रेम एक-एक करके उस प्रतीप्त वासना-कुण्ड में भस्म होने लगे। अग्नि और भी बढ़ती गई। किन्नरी की चिकनी दृष्टि, चिकनी बातें घी बरसाती रहीं। घर-बार सब जल उठा। मैं भी निरन्तर जलने लगा, लेकिन ज्यों-ज्यों जलता गया, जलने की इच्छा जलाती रही।

पाँच महीने कट गये – नशा उतरा नहीं। बनारसी साड़ी, पारसी जैकेट, मोती का हार, कटकी कर्णफूल – सब कुछ लाकर उस मायाकारी के अलक्तक-रंजित चरणों पर रखे। किरन हेमन्त की मालती बनी थी, जिस पर एक फूल नहीं – एक पल्लव नहीं। घर की वधू क्या करती? जो अनन्त सूत्र से बँधा था, जो अनंत जीवन का संगी था, वही हाथों-हाथ पराये के हाथ बिक गया – फिर ये तो दो दिन के चकमकी खिलौने थे, इन्हें शरीर बदलते क्या देर लगे। दिन भर बहानों की माला गूँथ-गूँथ किरन के गले में और शाम को मोती की माला उस नाचनेवाली के गले में सशंक निर्लज्ज डाल देना – यही मेरा जीवन निर्वाह था। एक दिन सारी बातें खुल गईं, किरन पछाड़ खाकर भूमि पर जा पड़ी। उसकी आँखों में आँसू न थे, मेरी आँखों में दया न थी।

बरसात की रात थी। रिमझिम बूँदों की झड़ी थी। चाँदनी मेघों से आँख-मुँदौवल खेल रही थी। बिजली काले कपाट से बार-बार झाँकती थी। किसे चंचला देखती थी तथा बादल किस मरोड़ से रह-रहकर चिल्लाते थे – इन्हें सोचने का मुझे अवसर नहीं था। मैं तो किन्नरी के दरवाजे से हताश लौटा था; आँखों के ऊपर न चाँदनी थी, न बदली थी। त्रिशंकु ने स्वर्ग को जाते-जाते बीच में ही टँगकर किस दुख को उठाया – और मैं तो अपने स्वर्ग के दरवाजे पर सर रखकर निराश लौटा था – मेरी वेदना क्यों न बड़ी हो।

हाय! मेरी अँगुलियों में एक अँगूठी भी रहती तो उसे नजर कर उसके चरणों पर लोटता।

घर पर आते ही जूही को पुकार उठा – “जूही, किरन के पास कुछ भी बचा हो तब फौरन जाकर माँग लाओ”

ऊपर से कोई आवाज़ नहीं आई, केवल सर के ऊपर से एक काला बादल कालान्त चीत्कार के चिल्ला उठा। मेरा मस्तिष्क घूम गया। मैं तत्क्षण कोठे पर दौड़ा।

सब सन्दूक झाँके, जो कुछ मिला, सब तोड़ डाला; लेकिन मिला कुछ भी नहीं। आलमारी में केवल मकड़े का जाल था। शृंगार बक्स में एक छिपकली बैठी थीं। उसी दम किरन पर झपटा।

पास जाते ही सहम गया। वह एक तकिये के सहारे नि:सहाय निस्पंद लेटी थी – केवल चाँद ने खिड़की से होकर उसे गोद में ले रखा था और वायु उस शरीर पर जल से भिगोया पंखा झल रही थी। मुख पर एक अपरूप छटा थी; कौन कहे, कहीं जीवन की शेष रश्मि क्षण-भर वहीं अटकी हो। आँखों में एक जीवन ज्योति थी। शायद प्राण शरीर से निकलकर किसी आसरे से वहाँ पैठ रहा था। मैं फिर पुकार उठा –

“किरन, किरन। तुम्हारे पास कोई गहना भी रहा है?”

“हाँ” – क्षीण कण्ठ की काकली थी।

“कहाँ हैं, अभी देखने दो”

उसने धीरे से घूँघट सरका कर कहा – “वही कानों का कँगना”

सर तकिये से ढल पड़ा – आँखें भी झिप गईं। वह जीवन्त रेखा कहाँ चली गई – क्या इतने ही के लिए अब तक ठहरी थी?

आँखें मुख पर जा पड़ीं – वहीं कँगन थे। वैसे ही कानों को घेरकर बैठे थे। मेरी स्मृति तड़ित वेग से नाच उठी। दुष्यन्त ने अँगूठी पहचान ली। भूली शकुन्तला उस पल याद आ गई; लेकिन दुष्यन्त सौभाग्यशाली थे, चक्रवर्ती राजा थे – अपनी प्राणप्रिया को आकाश-पाताल छानकर ढूँढ़ निकाला। मेरी किरन तो इस भूतल पर न थी कि किसी तरह प्राण देकर भी पता पाता। परलोक से ढूँढ़ निकालूँ – ऐसी शक्ति इस दीन-हीन मानव में कहाँ?

चढ़ा नशा उतर पड़ा। सारी बातें सूझ गईं – आँखों पर की पट्टी खुल पड़ी; लेकिन हाय! खुली भी तो उसी समय जब जीवन में केवल अन्धकार ही रह गया।

समाप्त

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