घनी कहानी, छोटी शाखा: रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी “गूँगी” का दूसरा भाग

गूँगी-रविंद्रनाथ टैगोर
भाग-2

(अब तक आपने पढ़ा..चंडीपुर में रहने वाली सुभाषिणी जन्म से ही मूक है इसलिए माता-पिता उसके लिए मन में अलग से भाव रखते हैं जहाँ पिता उसे बड़ी दोनों बहनों से ज़रा ज़्यादा स्नेह देते हैं वहीं माँ के लिए वो चिंता का विषय है। सुभा बोल तो नहीं पाती लेकिन महसूस सब करती है ये बात घर के लोगों के लिए मायने नहीं रखते और वो उसके भविष्य और वर्तमान को लेकर तरह-तरह की चिन्ताएँ और आशंकाएँ उसके सामने ही आपस में व्यक्त करते हैं, जो उसके लिए दुःख का कारण बनता है। यूँ तो मुँह से कुछ भी कहकर व्यक्त कर पाना असम्भव है लेकिन सुभा की आँखें हर समय कुछ न कुछ कहती रहती हैं लेकिन उसे समझने का वक़्त किसी के पास नहीं है। सुभाषिणी यूँ तो घर के कामों में लगी रहती है लेकिन जैसे ही उसे वक़्त मिलता है वो सीधे नदी किनारे जा बैठती है यहीं उसे सुकून के कुछ पल भी मिलते हैं और बेचैनी भरे विचार भी, इसके अलावा वो अगर किसी से कुछ कह पाती है तो वो हैं उसकी गौशाला की गायें सरस्वती और पार्वती, जिनके वो गले भी लग जाया करती है और जिनसे उसे प्रेम भी मिल जाता है। अब आगे..)

सुभाषिणी दिन-भर में कम-से-कम दो-तीन बार तो नियम से गौ-घर में जाया करती। इसके सिवा अनियमित आना-जाना भी बना रहता। घर में जिस दिन वह कोई सख़्त बात सुनती, उस दिन उसका समय अपनी गूँगी सखियों के पास बीतता। सुभाषिणी की सहनशील और विषाद-शान्त चितवन को देखकर वे न जाने कैसी एक अन्य अनुमान शक्ति में उसकी मर्म-वेदना को समझ जातीं और उसकी देह से सटकर धीरे-धीरे उसकी बाहों पर सींग घिस-घिसकर अपनी मौन आकुलता से उसको धैर्य बँधाने का प्रयत्न करतीं। इसके सिवा, एक बकरी और बिल्ली का बच्चा भी था। उनके साथ सुभाषिणी की गहरी मित्रता तो नहीं थी, फिर भी वे उससे बहुत प्यार रखते और कहने के अनुसार चलते। बिल्ली का बच्चा, चाहे दिन हो या रात, जब-तब सुभाषिणी की गर्म गोद पर बिना किसी संकोच के अपना हक जमा लेता और सुख की नींद सोने की तैयारी करता और सुभाषिणी जब उसकी गर्दन और पीठ पर अपनी कोमल उंगलियां फेरती, तब तो वह ऐसे आन्तरिक भाव दर्शाने लगता, मानो उसको नींद में ख़ास सहायता मिल रही है।

ऊँची श्रेणी के प्राणियों में सुभाषिणी को और भी एक मित्र मिल गया था, किन्तु उसके साथ उसका ठीक कैसा सम्बन्ध था, इसकी पक्की ख़बर बताना मुश्किल है। क्योंकि उसके बोलने की जिह्ना है और वह गूँगी है, अत: दोनों की भाषा एक नहीं थी। वह था गुसाइयों का छोटा लड़का प्रताप! प्रताप बिल्कुल आलसी और निकम्मा था। उसके माता-पिता ने बड़े प्रयत्नों के उपरान्त इस बात की आशा तो बिल्कुल छोड़ दी थी कि वह कोई काम-काज करके घर-गृहस्थी की कुछ सहायता करेगा। निकम्मों के लिए एक बड़ा सुभीता यह है कि परिजन उन पर बेशक नाराज़ रहें पर बाहरी जनों के लिए वे प्राय: स्नेहपात्र होते हैं, कारण, किसी विशेष काम में न फंसे रहने से वे सरकारी मिलकियत-से बन जाते हैं। नगरों में जैसे घर के पार्श्व में या कुछ दूर पर एक-आध सरकारी बगीचे का रहना आवश्यक है, वैसे ही गांवों में दो-चार निठल्ले-निकम्मे सरकारी इन्सानों का रहना आवश्यक है। काम-धन्धों में, हास-परिहास में और जहाँ कहीं भी एक-आध की कमी देखी, वहीं वे चट-से हाथ के पास ही मिल जाते हैं।

प्रताप की विशेष रुचि एक ही है, वह है मछली पकड़ना। इससे उसका बहुत-सा समय आसानी के साथ कट जाता है। तीसरे पहर सरिता के तीर पर बहुधा वह इस काम में तल्लीन दिखाई देता और इसी बहाने सुभाषिणी से उसकी भेंट हुआ करती। चाहे किसी भी काम में हो, पार्श्व में एक हमजोली मिलने मात्र से ही प्रताप का हृदय ख़ुशी से नाच उठता। मछली के शिकार में मौन साथी ही सबसे श्रेयस्कर माना जाता है, अत: प्रताप सुभाषिणी की ख़ूबी को जानता है और क़द्र करता है। यही कारण है कि और सब तो सुभाषिणी को ‘सुभा’ कहते, किन्तु प्रताप उसमें और भी स्नेह भरकर सुभा को ‘सू’ कहकर पुकारता।

सुभाषिणी इमली के वृक्ष के नीचे बैठी रहती और प्रताप पास ही ज़मीन पर बैठा हुआ सरिता-जल में काँटा डालकर उसी की ओर निहारता रहता। प्रताप के लिए उसकी ओर से हर रोज़ एक पान का बीड़ा बँधा हुआ था और उसे स्वयं वह अपने हाथ से लगाकर लाती। और शायद, बहुत देर तक बैठे-बैठे, देखते-देखते उसकी इच्छा होती कि वह प्रताप की कोई विशेष सहायता करे, उसके किसी काम में सहारा दे। उसके ऐसा मन में आता कि किसी प्रकार वह यह बता दे कि संसार में वह भी एक कम आवश्यक व्यक्ति नहीं। लेकिन उसके पास न तो कुछ करने को था और वह न कुछ कर ही सकती थी। तब वह मन-ही-मन भगवान से ऐसी अलौकिक शक्ति के लिए विनती करती कि जिससे वह जादू-मन्तर से चट से ऐसा कोई चमत्कार दिखा सके जिसे देखकर प्रताप दंग रह जाये, और कहने लगे- “अच्छा! ‘सू’ में यह करामात! मुझे क्या पता था?”

मान लो, सुभाषिणी यदि जल-परी होती और धीरे-धीरे जल में से निकलकर सर्प के माथे की मणि घाट पर रख देती और प्रताप अपने उस छोटे-से धंधे को छोड़कर मणि को पाकर जल में डुबकी लगाता और पाताल में पहुँचकर देखता कि रजत-प्रासाद में स्वर्ण-जड़ित शैया पर कौन बैठी है? और आश्चर्य से मुँह खोलकर कहता- “अरे! यह तो अपनी वाणीकंठ के घर की वही गूँगी छोटी कन्या है “सू’! मेरी सू’ आज मणियों से जटित, गम्भीर, निस्तब्ध पातालपुरी की एकमात्र जलपरी बनी बैठी है। तो! क्या यह बात हो ही नहीं सकती, क्या यह नितान्त असम्भव ही है? वास्तव में कुछ भी असम्भव नहीं। लेकिन फिर भी, ‘सू’ प्रजा-शून्य पातालपुरी के राजघराने में जन्म न लेकर वाणीकंठ के घर पैदा हुई है, और इसीलिए वह आज ‘गुसांइयों के घर के लड़के प्रताप को किसी प्रकार के आश्चर्य से अचम्भित नहीं कर सकती।

सुभाषिणी की अवस्था दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। धीरे-धीरे मानो वह अपने आपको अनुभव कर रही है। मानो किसी एक पूर्णिमा को किसी सागर से एक ज्वार-सा आकर उसके अन्तराल को किसी एक नवीन अनिर्वचनीय चेतना-शक्ति से भर-भर देता है। अब मानो वह अपने-आपको देख रही है, अपने विषय में कुछ सोच रही है, कुछ पूछ रही है, लेकिन कुछ समझ नहीं पाती। पूर्णिमा की गाढ़ी रात्रि में उसने एक दिन धीरे-से कक्ष के झरोखे को खोलकर, भयत्रस्तावस्था में मुँह निकाल कर बाहर की ओर देखा। देखा कि सम्पूर्ण-प्रकृति भी उसके समान सोती हुई दुनिया पर अकेली बैठी हुई जाग रही है। वह भी यौवन के उन्माद से, आनन्द से, विषाद से, असीम नीरवता की अन्तिम परिधि तक, यहां तक कि उसे भी पार करके चुपचाप स्थिर बैठी है, एक शब्द भी उसके मुख से नहीं निकल रहा है। मानो इस स्थिर निस्तब्ध प्रकृति के एक छोर पर उससे भी स्थिर और उससे भी निस्तब्ध एक भोली लड़की खड़ी हो।

क्रमशः

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