घनी कहानी, छोटी शाखा: मुंशी प्रेमचंद की कहानी “कोई दुःख न हो तो बकरी ख़रीद लो” का अंतिम भाग

कोई दुःख न हो तो बकरी ख़रीद लो- मुंशी प्रेमचंद

भाग-5

(अब तक आपने पढ़ा…अच्छा और शुद्ध दूध पाने की चाह में लेखक अपने दोस्त के साथ मिलकर एक गाय पालता है लेकिन कुछ दिन बाद उन्हें दूध के नाम पर मिलावट ही मिलती है, लेखक अपने दोस्त को कुछ भी नहीं कहता और जब दोस्त का तबादला होता है तो गाय बेच देता है. इसके बाद भी शुद्ध दूध की चाह मन में रहती है जिसके लिए बकरी पालने का निर्णय लिया जाता है..बकरी पालना जितना आसान काम लेखक को लगता है वो उतना ही मुश्किल साबित होता है. कुछ दिन तक बकरी ठीक दूध देती है लेकिन दूध कम होने पर उसे चराने के लिए जगह का प्रबंध न होने के कारण लेखक को अपना घर बदलकर बस्ती से बाहर रहना पड़ता है…वहाँ भी बकरी एक खेत में घुसकर फ़सल नष्ट कर देती है और लेखक को काछी से खरीखोटी सुननी पड़ती है…नौकर के मना करने पर लेखक खुद बकरी को चराने की ज़िम्मेदारी उठाते हैं…पहले दिन बकरी पत्तियाँ खाकर अच्छा दूध देती है तो लेखक उसके लिए पत्तियाँ तोड़ने पहुँच जाते हैं…काछी उन्हें इस बात पर कुछ बात सुना देता है जिससे लेखक शर्मसार होते हैं…अगले दिन उनकी हिम्मत ही नहीं होती की वो पत्तियाँ तोड़ने जाएँ या बकरी को ही चराने ले जाएँ…उस दिन छुट्टी का फायदा उठाते हुए वो परिवार सहित बाहर चले जाते हैं और बकरी को लम्बी रस्सी से एक पेड़ में बाँध देते हैं ताकि वो चर पाए…वापस आकर वो पाते हैं कि बकरी ने पेड़ से ख़ुद को इस तरह बाँध लिया है कि चराने से बचा समय ठण्ड की रात में उस रस्सी को सुलझाने में लग जाता है…लेखक बकरी की आवाज़ से तंग आकर दूसरे दिन घर से बाहर चले जाते हैं लेकिन बकरी की आवाज़ उनके कानों में बस गयी होती है…उसके बारे में सोच-सोच वो इतने परेशान हो चुके होते हैं कि एक गूलर का पेड़ नज़र आते ही उस पर चढ़कर बकरी के लिए पत्तियाँ तोड़कर गिराने लगते हैं…उसी समय कहीं से ढेर सारी बकरियों का झुण्ड आकर उनकी तोड़ी पत्तियाँ खाने लगता है..उन्हें भगाने की जल्दी में पेड़ से उतरते लेखक का पैर फिसलता है और कमर में चोट लगती है…फिर भी वो बाक़ी बची पत्तियों को समेटकर कंधे पर लादकर घर का रुख करते हैं…ऐसे में उन्हें नज़र आता है काछी…वो फिर कोई बात न सुनाये इस डर से लेखक किसी तरह बच निकलने की कोशिश करते हैं और इस तरह निकलना चाहते हैं कि काछी को वो कोई मजदूर लगें..किसी तरह काछी को पार करके निकलते लेखक पर काछी की नज़र पड़ जाती है और उसके सवाल करते ही लेखक के हाथ-पाँव फुल जाते हैं…अब आगे)

“कौन है रे, कहाँ से पत्तियाँ तोड़े लाता है?”

मुझे मालूम हुआ, नीचे से ज़मीन निकल गयी है और मैं उसके गहरे पेट में जा पहुँचा हूँ। रोएं बर्छियां बने हुए थे, दिमाग में उबाल-सा आ रहा था, शरीर को लकवा-सा मार गया, जवाब देने का होश न रहा।

तेज़ी से दो-तीन कदम आगे बढ़ गया, मगर वह ऐच्छिक क्रिया न थी, प्राण-रक्षा की सहज क्रिया थी कि एक ज़ालिम हाथ गट्ठे पर पड़ा और गट्ठा नीचे गिर पड़ा। फिर मुझे याद नहीं, क्या हुआ। मुझे जब होश आया तो मैं अपने दरवाज़े पर पसीने से तर खड़ा था गोया मिरगी के दौरे के बाद उठा हूं। इस बीच मेरी आत्मा पर उपचेतना का आधिपत्य था और बकरी की वह घृणित आवाज़, वह कर्कश आवाज़, वह हिम्मत तोड़नेवाली आवाज़, वह दुनिया की सारी मुसीबतों का खुलसा, वह दुनिया की सारी लानतों की रूह कानों में चुभी जा रही थी।

बीवी ने पूछा- “आज कहाँ चले गये थे? इस चुड़ैल को जरा बाग़ भी न ले गये,जीना मुहाल किये देती है। घर से निकलकर कहाँ चली जाऊँ?”

मैंने इत्मीनान दिलाया- “आज चिल्ला लेने दो, कल सबसे पहला यह काम करूँगा कि इसे घर से निकाल बाहर करूँगा , चाहे कसाई को देना पड़े”

“और लोग न जाने कैसे बकरियाँ पालते हैं”

“बकरी पालने के लिए कुत्ते का दिमाग चाहिए”

सुबह को बिस्तर से उठकर इसी फ़िक्र में बैठा था कि इस काली बला से क्यों कर मुक्ति मिले कि सहसा एक गड़रिया बकरियों का एक गल्ला चराता हुआ आ निकला। मैंने उसे पुकारा और उससे अपनी बकरी को चराने की बात कही। गड़रिया राजी हो गया। यही उसका काम था। मैंने पूछा- “क्या लोगे?”

“आठ आने बकरी मिलते हैं हजूर”

“मैं एक रुपया दूँगा लेकिन बकरी कभी मेरे सामने न आवे”

गड़रिया हैरत में रह गया- “मरकही है क्या बाबूजी?”

“नही, नहीं, बहुत सीधी है, बकरी क्या मारेगी, लेकिन मैं उसकी सूरत नहीं देखना चाहता”

“अभी तो दूध देती है?”

“हाँ, सेर-सवा सेर दूध देती है”

“दूध आपके घर पहुँच जाया करेगा”

“तुम्हारी मेहरबानी”

जिस वक़्त बकरी घर से निकली है मुझे ऐसा मालूम हुआ कि मेरे घर का पाप निकला जा रहा है। बकरी भी खुश थी गोया क़ैद से छूटी है, गड़रिये ने उसी वक़्त दूध निकाला और घर में रखकर बकरी को लिये चला गया। ऐसा बेगरज गाहक उसे ज़िन्दगी में शायद पहली बार ही मिला होगा।

एक हफ़्ते तक दूध थोड़ा-बहुत आता रहा फिर उसकी मात्रा कम होने लगी, यहाँ तक कि एक महीना ख़त्म होते-होते दूध बिलकुल बन्द हो गया। मालूम हुआ बकरी गाभिन हो गयी है। मैंने ज़रा भी एतराज़ न किया काछी के पास गाय थी, उससे दूध लेने लगा। मेरा नौकर ख़ुद जाकर दुह लाता था।

कई महीने गुज़र गये। गड़रिया महीने में एक बार आकर अपना रुपया ले जाता। मैंने कभी उससे बकरी का ज़िक्र न किया। उसके ख़याल ही से मेरी आत्मा काँप जाती थी। गड़रिये को अगर चेहरे का भाव पढ़ने की कला आती होती तो वह बड़ी आसानी से अपनी सेवा का पुरस्कार दुगना कर सकता था।

एक दिन मैं दरवाज़े पर बैठा हुआ था कि गड़रिया अपनी बकरियों का गल्ला लिये आ निकला। मैं उसका रुपया लाने अन्दर गया, कि क्या देखता हूं मेरी बकरी दो बच्चों के साथ मकान में आ पहुँची। वह पहले सीधी उस जगह गयी जहाँ बंधा करती थी फिर वहाँ से आँगन में आयी और शायद परिचय दिलाने के लिए मेरी बीवी की तरफ ताकने लगी। उन्होंने दौड़कर एक बच्चे को गोद में ले लिया और कोठरी में जाकर महीनों का जमा चोकर निकाल लायीं और ऐसी मुहब्बत से बकरी को खिलाने लगीं कि जैसे बहुत दिनों की बिछुड़ी हुई सहेली आ गयी हो। न वह पुरानी कटुता थी न वह मनमुटाव। कभी बच्चे को चुमकारती थीं। कभी बकरी को सहलाती थीं और बकरी डाकगड़ी की रफ्तार से चोकर उड़ा रही थी।

तब मुझसे बोलीं- “कितने खूबसूरत बच्चे हैं”

“हाँ, बहुत खूबसूरत”

“जी चाहता है, एक पाल लूँ”

“अभी तबियत नहीं भरी?”

“तुम बड़े निर्मोही हो”

चोकर ख़त्म हो गया, बकरी इत्मीनान से विदा हो गयी। दोनों बच्चे भी उसके पीछे फुदकते चले गये। देवी जी आँख में आँसू भरे यह तमाशा देखती रहीं।

गड़रिये ने चिलम भरी और घर से आग माँगने आया। चलते वक़्त बोला- “कल से दूध पहुँचा दिया करूँगा, मालिक”

देवीजी ने कहा- “और दोनों बच्चे क्या पियेंगे?”

“बच्चे कहाँ तक पियेंगे बहूजी। दो सेर दूध अच्छा न होता था, इस मारे नहीं लाया”

मुझे रात की वह मर्मान्तक घटना याद आ गयी।

मैंने कहा- “दूध लाओ या न लाओ, तुम्हारी खुशी, लेकिन बकरी को इधर न लाना”

उस दिन से न वह गड़रिया नज़र आया न वह बकरी, और न मैंने पता लगाने की कोशिश की। लेकिन देवीजी उसके बच्चों को याद करके कभी-कभी आँसू बहा रोती हैं।

-‘समाप्त

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