घनी कहानी, छोटी शाखा: मुंशी प्रेमचंद की कहानी “कोई दुःख न हो तो बकरी ख़रीद लो” का पहला भाग

कोई दुःख न हो तो बकरी ख़रीद लो- मुंशी प्रेमचंद

भाग-1

उन दिनों दूध की तकलीफ़ थी। कई डेरी फ़ार्मों की आज़माइश की, अहारों का इम्तहान लिया, कोई नतीजा नहीं हुआ। दो-चार दिन तो दूध अच्छा मिलता फिर मिलावट शुरू हो जाती। कभी शिकायत होती दूध फट गया, कभी उसमें से नागवार बू आने लगी, कभी मक्खन के रेजे निकलते। आख़िर एक दिन एक दोस्त से कहा-

“भाई, आओ साझे में एक गाय ले लें, तुम्हें भी दूध का आराम होगा, मुझे भी, लागत आधी-आधी, ख़र्च आधा-आधा, दूध भी आधा-आधा”

दोस्त साहब राज़ी हो गए। मेरे घर में जगह न थी और गोबर वगैरह से मुझे नफ़रत है। उनके मकान में काफ़ी जगह थी इसलिए प्रस्ताव हुआ कि गाय उन्हीं के घर रहे। इसके बदले में उन्हें गोबर पर एकछत्र अधिकार रहे। वह उसे पूरी आज़ादी से पाथें, उपले बनाएँ, घर लीपें, पड़ोसियों को दें या उसे किसी आयुर्वेदिक उपयोग में लाएँ, इकरार करनेवाले को इसमें किसी प्रकार की आपत्ति या प्रतिवाद न होगा और इकरार करनेवाला सही होश-हवास में इकरार करता है कि वह गोबर पर कभी अपना अधिकार जमाने की कोशिश न करेगा और न किसी का इस्तेमाल करने के लिए आमादा करेगा।

दूध आने लगा, रोज़-रोज़ के झंझट से मुक्ति मिली। एक हफ़्ते तक किसी तरह की शिकायत न पैदा हुई। गरम-गरम दूध पीता था और ख़ुश होकर गाता था-

रब का शुक्र अदा कर भाई जिसने हमारी गाय बनाई।

ताजा दूध पिलाया उसने लुत्फ़-ए-हयात चखाया उसने।

दूध में भीगी रोटी मेरी उसके करम ने बख्शी सेरी।

ख़ुदा की रहमत की है मूरत कैसी भोली-भाली सूरत”

मगर धीरे-धीरे यहां पुरानी शिकायतें पैदा होने लगीं। यहाँ तक नौबत पहुंची कि दूध सिर्फ़ नाम का दूध रह गया। कितना ही उबालो, न कहीं मलाई का पता न मिठास। पहले तो शिकायत कर लिया करता था इससे दिल का बुख़ार निकल जाता था। शिकायत से सुधार न होता तो दूध बन्द कर देता था। अब तो शिकायत का भी मौक़ा न था, बन्द कर देने का ज़िक्र ही क्या? भिखारी का ग़ुस्सा अपनी जान पर, पियो या नाले में डाल दो। आठ आने रोज़ का नुस्खा क़िस्मत में लिखा हुआ। बच्चा दूध को मुँह न लगाता, पीना तो दूर रहा। आधों आध शक्कर डालकर कुछ दिनों दूध पिलाया तो फोड़े निकलने शुरू हुए और मेरे घर में रोज बमचख मची रहती थी।

बीवी नौकर से फ़रमाती- “दूध ले जाकर उन्हीं के सर पटक आ”

मैं नौकर को मना करता। वह कहतीं-

“अच्छे दोस्त हैं तुम्हारे, उसे शरम भी नहीं आती। क्या इतना अहमक है कि इतना भी नहीं समझता कि यह लोग दूध देखकर क्या कहेंगे! गाय को अपने घर मँगवा लो, बला से बदबू आएगी, मच्छर होंगे, दूध तो अच्छा मिलेगा। रुपये ख़र्चे हैं तो उसका मज़ा तो मिलेगा”

चड्ढा साहब मेरे पुराने मेहरबान हैं। ख़ासी बेतक़ल्लुफ़ी है उनसे। यह हरकत उनकी जानकारी में होती हो यह बात किसी तरह गले के नीचे नहीं उतरती या तो उनकी बीवी की शरारत है या नौकर की लेकिन ज़िक्र कैसे करूँ और फिर उनकी बीवी से भी तो राह-रस्म है। कई बार मेरे घर आ चुकी हैं। मेरी बीवी जी भी उनके यहाँ कई बार मेहमान बनकर जा चुकी हैं। क्या वह यकायक इतनी बेवकूफ़ हो जायेंगी, सरीहन आंखों में धूल झोंकेंगी! और फिर चाहे किसी की शरारत हो, मेरे लिए यह ग़ैरमुमकिन था कि उनसे दूध की ख़राबी की शिकायत करता। खैरियत यह हुई कि तीसरे महीने चड्ढा का तबादला हो गया। मैं अकेले गाय न रख सकता था। साझा टूट गया। गाय आधे दामों बेच दी गई। मैंने उस दिन इत्मीनान की साँस ली।

आख़िर यह सलाह हुई कि एक बकरी रख ली जाए। वह बीच आँगन के एक कोने में पड़ी रह सकती है। उसे दुहने के लिए न ग्वाले की ज़रूरत न उसका गोबर उठाने, नांद धोने, चारा-भूसा डालने के लिए किसी अहीरिन की ज़रूरत। बकरी तो मेरा नौकर भी आसानी से दुह लेगा। थोड़ी-सी चोकर डाल दी, चलिए क़िस्सा तमाम हुआ। फिर बकरी का दूध फ़ायदेमंद भी ज़्यादा है, बच्चों के लिए ख़ास तौर पर। जल्दी हज़म होता है, न गर्मी करे न सर्दी, स्वास्थ्यवर्द्धक है। संयोग से मेरे यहाँ जो पंडित जी मेरे मसौदे नक़ल करने आया करते थे, इन मामलों में काफी तजुर्बेकार थे। उनसे ज़िक्र आया तो उन्होंने एक बकरी की ऐसी स्तुति गाई, उसका ऐसा क़सीदा पढ़ा कि मैं बिन देखे ही उसका प्रेमी हो गया। पछांही नसल की बकरी है, ऊँचे क़द की, बड़े-बड़े थन जो ज़मीन से लगते चलते हैं। बेहद कमखोर लेकिन बेहद दुधार। एक वक़्त में दो-ढाई सेर दूध ले लीजिए। अभी पहली बार ही बियाई है। पच्चीस रुपये में आ जाएगी। मुझे दाम कुछ ज़्यादा मालूम हुए लेकिन पंडितजी पर मुझे एतबार था।

फ़रमाइश कर दी गई और तीसरे दिन बकरी आ पहुँची। मैं देखकर उछल पड़ा। जो-जो गुण बताये गये थे उनसे कुछ ज़्यादा ही निकले। एक छोटी-सी मिट्टी की नांद मँगवाई गई, चोकर का भी इन्तज़ाम हो गया। शाम को मेरे नौकर ने दूध निकाला तो सचमुच ढाई सेर। मेरी छोटी पतीली लबालब भर गई थी। अब मूसलों ढोल बजायेंगे। यह मसला इतने दिनों के बाद जाकर कहीं हल हुआ। पहले ही यह बात सूझती तो क्यों इतनी परेशानी होती। पण्डितजी का बहुत-बहुत शुक्रिया अदा किया।

मुझे सवेरे तड़के और शाम को उसकी सींग पकड़ने पड़ते थे तब आदमी दुह पाता था। लेकिन यह तकलीफ़ इस दूध के मुकाबले में कुछ न थी। बकरी क्या है कामधेनु है। बीवी ने सोचा इसे कहीं नजर न लग जाय इसलिए उसके थन के लिए एक गिलाफ़ तैयार हुआ, इसकी गर्दन में नीले चीनी के दानों की एक माला पहनायी गयी। घर में जो कुछ जूठा बचता, देवी जी ख़ुद जाकर उसे खिला आती थीं।

लेकिन एक ही हफ़्ते में दूध की मात्रा कम होने लगी। ज़रूर नज़र लग गई। बात क्या है?

पण्डितजी से हाल कहा तो उन्होंने कहा- “साहब, देहात की बकरी है, ज़मींदार की। बेदरेग अनाज खाती थी और सारे दिन बाग़ में घूमा-चरा करती थी। यहॉँ बंधे-बंधे दूध कम हो जाये तो ताज्जुब नहीं। इसे जरा टहला दिया कीजिए। लेकिन शहर में बकरी को टहलाये कौन और कहाँ?इसलिए यह तय हुआ कि बाहर कहीं मकान लिया जाए। वहाँ बस्ती से ज़रा निकलकर खेत और बाग़ हैं। कहार घण्टे-दो घण्टे टहला लाया करेगा। झटपट मकान बदला और गौ कि मुझे दफ्तर आने-जाने में तीन मील का फ़ासला तय करना पड़ता था लेकिन अच्छा दूध मिले तो मैं इसका दुगना फ़ासला तय करने को तैयार था।

क्रमशः

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