घनी कहानी, छोटी शाखा- मुंशी प्रेमचंद की कहानी “विनोद” का अंतिम भाग

विनोद- मुंशी प्रेमचंद 

भाग-5

(अब तक आपने पढ़ा..कॉलेज और हॉस्टल में सिर्फ़ अपने काम से काम रखने वाले और पूजा-पाठ में व्यस्त रहने वाले चक्रधर को अपने मज़ाक़ का पात्र बनाने का इरादा रखे उसके सहपाठी एक मौक़े की तलाश में होते हैं। इसी बीच कॉलेज में नई आयी लूसी की ओर चक्रधर के देखने के अन्दाज़ को भाँपकर ही लड़कों को चक्रधर के मन के अरमानों की भनक लग जाती है और शुरू होता है उनके विनोद का एक सिलसिला। जिसमें सबसे पहले चक्रधर से थोड़ी दोस्ती गाँठी जाती है और उनके पास पहुँचता है लूसी के नाम से एक पत्र, जिसे पढ़कर चक्रधर ख़ुशी से फूले नहीं समाते और उनके जवाबी ख़त से लड़कों का उत्साह भी अपनी योजना के सफल होने की ख़ुशी से बढ़ जाता है। बस फिर ख़तों के सिलसिले के साथ ही शुरू होता है चक्रधर की वेशभूषा और दिनचर्या बदलने का सिलसिला, लूसी के लिए पूरी तरह बदलने वाले चक्रधर, इस बात से अनजान होते हैं कि ये सब लड़कों की ख़ुराफ़ात है। आख़िर कॉलेज के सेशन ख़त्म होने से पहले ही लड़के इस मज़ाक़ को चरम पर ले जाने के लिए महाभोज की माँग करते हैं क्यूँकि चक्रधर के लिए वो लूसी की फ़रमाइश होती है इसलिए वो महाभोज का भी आयोजन करते हैं। सब उसका आनंद ले रहे होते हैं कि चक्रधर इशारों और ख़तों से आगे बढ़कर लूसी से अपने दिल का हाल ज़ुबानी बयान करने पहुँचता है और रास्ते में उसे अपने इस प्रेम का फल गाल पर एक तमाचे के रूप में मिलता है। चाँटे से हिला चक्रधर का दिमाग़ अब ये समझ जाता है कि लड़कों ने उसे बेवक़ूफ़ बनाया और वो उनके पास जाकर अपना ग़ुस्सा निकालते हैं, लेकिन अब सभी के सामने ये परेशानी खड़ी हो गयी है कि अगर लूसी ने प्रिंसिपल से शिकायत कर दी तो उनका क्या होगा..अब आगे)

आख़िर बहुत वाद-विवाद के पश्चात् यह निश्चित हुआ कि नईम और गिरिधर प्रातःकाल मिस लूसी के बँगले पर जायँ, उससे क्षमा-याचना करें। और इस अपमान के लिए वह जो प्रायश्चित्त कहे, उसे स्वीकार करें।

चक्रधर- “मैं एक कौड़ी न दूँगा”

नईम- “न देना भाई ! हमारी जान तो है न”

गिरिधर- “जान लेकर वह चाटेगी। पहले रुपये की फ़िक्र कर लो ! वह बिना तावान लिये न मानेगी।“

नईम- “भाई चक्रधर, ख़ुदा के लिए इस वक्त दिल न छोटा करो, नहीं तो हम तीनों की मिट्टी ख़राब होगी। जो कुछ हुआ उसे मुआफ करो, अब फिर ऐसी ख़ता न होगी”

चक्रधर- “ऊँह, यही न होगा निकाल दिया जाऊँगा। दुकान खोल लूँगा। तुम्हारी मिट्टी ख़राब होगी। इस शरारत का मजा चखोगे। ओह, कैसा चकमा दिया”

बहुत ख़ुशामद और चिरौरी के बाद देवता सीधे हुए। प्रातःकाल नईम लूसी के बँगले पर पहुँचे। वहाँ मालूम हुआ कि वह प्रिंसिपल के बँगले पर गयी है। अब काटो तो बदन में लहू नहीं।

“या अली, तुम्हीं मुश्किल को आसान करनेवाले हो, अब जान की ख़ैर नहीं। प्रिंसिपल ने सुना, तो कच्चा ही खा जायगा, नमक तक न माँगेगा। इस कम्बख्त पंडित की बदौलत अजाब में जान फँसी। इस बेहूदे को सूझी क्या? चला नाज़नीन से इश्क़ जताने ! बनबिलास की-सी तो आपकी सूरत है। और खब्त यह कि यह माहरू मुझ पर रीझ गयी। हमें भी अपने साथ डुबोये देता है। कहीं लूसी से रास्ते में मुलाकात हो गयी, तो शायद आरज़ू-मिन्नत करने से मान जाए; लेकिन जो वहाँ पहुँच चुकी है तो फिर कोई उम्मीद नहीं”

वह फिर पैरगाड़ी पर बैठे और बेतहाशा प्रिंसिपल के बँगले की तरफ भागे। ऐसे तेज़ जा रहे थे, मानो पीछे मौत आ रही है। ज़रा-सी ठोकर लगती, तो हड्डी-पसली चूर-चूर हो जाती। पर शोक ! कहीं लूसी का पता नहीं। आधा रास्ता निकल गया और लूसी की गर्द तक न नज़र आयी। नैराश्य ने गति को मंद कर दिया। फिर हिम्मत करके चले। बँगले के द्वार पर भी मिल गयी, तो जान बच जायगी। सहसा लूसी दिखायी दी। नईम ने पैरों को और भी तेज चलाना शुरू किया। वह प्रिंसिपल के बँगले के दरवाजे पर पहुँच चुकी थी। एक सेकेंड में वारा-न्यारा होता था, नाव डूबती थी या पार जाती थी। हृदय उछल-उछलकर कंठ तक आ रहा था। जोर से पुकारा- “मिस टरनर, हेलो मिस टरनर, जरा ठहर जाओ”

लूसी ने पीछे फिरकर देखा, नईम को पहचानकर ठहर गयी और बोली- “मुझसे उस पंडित की सिफ़ारिश करने तो नहीं आये हो ! मैं प्रिंसिपल से उसकी शिकायत करने जा रही हूँ”

नईम- “तो पहले मुझे और गिरिधर- दोनों को गोली मार दो, फिर जाना”

लूसी- “बेहया लोगों पर गोली का असर नहीं होता। उसने मुझे बहुत इंसल्ट किया है”

नईम- “लूसी, तुम्हारे क़सूरवार हम दोनों हैं। वह बेचारा पंडित तो हमारे हाथ का खिलौना था। सारी शरारत हम लोगों की थी। कसम तुम्हारे सिर की!”

लूसी- “ल्वन दंनहीजल इवल!”

नईम- हम दोनों उसे दिल-बहलाव का एक स्वाँग बनाये हुए थे। इसकी हमें ज़रा भी ख़बर न थी कि वह तुम्हें छेड़ने लगेगा। हम तो समझते थे कि उसमें इतनी हिम्मत ही नहीं है। ख़ुदा  के लिए मुआफ़ करो, वरना हम तीनोंका ख़ून तुम्हारी गरदन पर होगा।

लूसी- “ख़ैर, तुम कहते हो तो प्रिंसिपल से न कहूँगी, लेकिन शर्त यह है कि पंडित मेरे सामने बीस मरतबा कान पकड़कर उठे-बैठे और मुझे कम से कम 200) रुपए तावान दे”

नईम- “लूसी इतनी बेरहमी न करो। यह समझो, उस गरीब के दिल पर क्या गुजर रही होगी। काश, अगर तुम इतनी हसीन न होतीं”

लूसी मुस्कराकर बोली- “ख़ुशामद करना कोई तुमसे सीख ले”

नईम- “तो अब वापस चलो”

लूसी- “मेरी दोनों शर्तें मंजूर करते हो न?”

नईम- “तुम्हारी दूसरी शर्त तो हम सब मिलकर पूरी कर देंगे, लेकिन पहली शर्त सख़्त है, बेचारा ज़हर खाकर मर जायगा। हाँ, उसके एवज में मैं पचास दफ़ा कान पकड़कर उठ-बैठ सकता हूँ”

लूसी- “तुम छँटे हुए शोहदे हो। तुम्हें शर्म कहाँ ! मैं उसी को सज़ा देना चाहती हूँ। बदमाश, मेरा हाथ पकड़ना चाहता था”

नईम- “ज़रा भी रहम न करोगी !”

लूसी- “नहीं, सौ बार नहीं”

नईम लूसी को साथ लाए। पंडित के सामने दोनों शर्तें रखी गयीं, तो बेचारा बिलबिला उठा। लूसी के पैरों पर गिर पड़ा और सिसक-सिसककर रोने लगा। नईम और गिरिधर भी अपने कुकृत्य पर लज्जित हुए। अन्त में लूसी को दया आयी। बोली- “अच्छा, इन दोनों में से कोई एक शर्त मंज़ूर कर लो मैं मुआफ़ कर दूँगी”

लोगों को पूरा विश्वास था कि चक्रधर रुपएवाली ही शर्त स्वीकार करेंगे। लूसी के सामने वह कभी कान पकड़कर उठा-बैठी न करेंगे। इसलिए जब चक्रधर ने कहा,“मैं रुपये तो न दूँगा। हाँ, बीस की जगह चालीस बार उठा-बैठी कर लूँगा”, तो सब लोग चकित हो गये।

नईम ने कहा- “यार, क्यों हम लोगों को ज़लील करते हो ? रुपये क्यों नहीं देते?”

चक्रधर- “रुपये बहुत खर्च कर चुका। अब इस चुड़ैल के लिए कानी कौड़ी तो खर्च करूँगा नहीं, दो सौ बहुत होते हैं। इसने समझा होगा, चलकर मज़े से दो सौ रुपये मार लाऊँगी और गुलछर्रे उड़ाऊँगी। यह न होगा। अब तक रुपये खर्च करके अपनी हँसी करायी है, अब बिना खर्च किए हँसी कराऊँगा। मेरे पैरों मे दर्द हो बला से, सब लोग हँसें बला से, पर इसकी मुट्ठी तो न गरम होगी”

यह कहकर चक्रधर ने कुर्ता उतार फेंका, धोती ऊपर चढ़ा ली और बरामदे से नीचे मैदान में उतरकर उठा-बैठी करने लगे। मुख-मंडल क्रोध से तमतमाता हुआ था, पर वह बैठकें लगाए जाते थे। मालूम होता था, कोई पहलवान अपना करतब दिखा रहा है। पंडित ने अगर बुद्धिमता का कभी परिचय दिया तो इसी अवसर पर। सब लोग खड़े थे, पर किसी के होंठों पर हँसी न थी ? सब लोग दिल में कटे जाते थे। यहाँ तक कि लूसी को भी सिर उठाने का साहस न होता था। सिर गड़ाये बैठी थी। शायद उसे खेद हो रहा था कि मैंने नाहक यह दंड-योजना की।

बीस बार उठते-बैठते कितनी देर लगती है। पण्डित ने ख़ूब उच्च स्वर से गिन-गिनकर बीस की संख्या पूरी की और गर्व से सिर उठाए अपने कमरे में चले गये। लूसी ने उन्हें अपमानित करना चाहा था, उलटे उसी का अपमान हो गया।

इस दुर्घटना के पश्चात् एक सप्ताह तक कॉलेज खुला रहा; किन्तु पण्डितजी को किसी ने हँसते नहीं देखा। वह विमन और विरक्त भाव से अपने कमरे में बैठे रहते थे। लूसी का नाम ज़बान पर आते झल्ला पड़ते थे।

इस साल की परीक्षा में पंडितजी फेल हो गये; पर इस कॉलेज में फिर न आये, शायद अलीगढ़ चले गए।

समाप्त

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