घनी कहानी, छोटी शाखा: मुंशी प्रेमचंद की कहानी “विनोद” का तीसरा भाग

विनोद- मुंशी प्रेमचंद 

भाग-3

(अब तक आपने पढ़ा..कॉलेज में सबसे कटकर सिर्फ़ अपने में डूबे रहने वाला चक्रधर, अपने साथियों के मज़ाक़ का शिकार हो जाता है। जहाँ वो पहले पढ़ाई और पूजा पाठ से इतर कहीं  झाँकता भी नहीं है, वहीं कॉलेज में नई आयी लूसी की ओर उठी उसकी नज़र, साथियों से छुप नहीं पाती और सभी मिलकर चक्रधर को अपने विनोद का पात्र बनाते हैं। चक्रधर को लूसी के नाम से ख़त लिखते हैं और उसे विश्वास दिलाते हैं कि लूसी उसके प्रेम की गिरफ़्त में है। इस मोहपाश में बँधा चक्रधर भी साथियों से मिले लूसी के पत्रों को लूसी की ओर से आता जान, सिर से पैर तक रूप बदल लेता है। लेकिन साथियों को इसमें भी संतोष कहाँ, वो तो और बड़ी चाल चलना चाहते हैं..उनकी ये चाल क्या है जानेंगे आज की क़िस्त में..पढ़िए आगे..)

 

फिर क्या था, लूसी का एक पत्र आ गया- आपके रूपांतर से मुझे जितना आनन्द हुआ उसे शब्दों में नहीं प्रकट कर सकती ! आपसे मुझे ऐसी ही आशा थी। अब आप इस योग्य हो गये हैं कि कोई यूरोपियन लेडी आपके सहवास में अपना अपमान नहीं समझ सकती। अब आपसे प्रार्थना केवल यही है कि मुझे अपने अनंत और अविरल प्रेम का कोई चिह्न प्रदान कीजिए, जिसे मैं सदैव अपने पास रखूँ। मैं कोई बहुमूल्य वस्तु नहीं, केवल प्रेमोपहार चाहती हूँ”

चक्रधर ने मित्रों से पूछा- “अपनी पत्नी के लिए कुछ सौगात भेजना चाहता हूँ। क्या भेजना उचित होगा?”

नईम- “जनाब, यह तो उसकी तालीम और मिज़ाज पर मुनहसर है। अगर वह नये फ़ैशन की लेडी है, कोई बेशक़ीमत, सुबुक वजहदार चीज़ या ऐसी ही कई चीज़ें भेजिए। मसलन रूमाल, रिस्टवॉच, लवेंडर की शीशी, फँसी कंघी, आईना, लॉकेट, ब्रूस वगैरह। और ख़ुदा न खास्ता अगर गँवारिन है, तो किसी दूसरे आदमी से पूछिए। मुझे गँवारियों के मिज़ाज का इल्म नहीं”

चक्रधर- “जनाब, अंग्रेजी पढ़ी हुई हैं। बड़े ऊँचे खानदान की हैं”

नईम- “तो फिर मेरी सलाह पर अमल कीजिए”

संध्या समय मित्रगण चक्रधर के साथ बाजार गए और ढेर-की-ढेर चीज़ें बटोर लाये। सब-की-सब ऊँचे दर्जे की। कोई 75 रु. खर्च हुए। मगर पंडितजी ने उफ़ तक न की। हँसते हुए रुपये निकाले।

लौटते वक्त नईम ने कहा- “अफ़सोस, हमें ऐसी ख़ुशमिज़ाज बीवी न मिली!”

गिरिधर- “ज़हर खा लो, ज़हर!”

नईम- “भई, दोस्ती के माने तो यही हैं कि एक बार हमें भी उनकी जियारत हो। क्यों पंडितजी, आप इसमें कोई हरज समझते हैं?”

गिरिधर- “ख़ैर, ख़ुदा उन्हें जल्द दुनिया से नजात दे।“

रातोंरात पैकेट बना और प्रातःकाल पंडितजी उसे ले जाकर लाइब्रेरी में रख आये। लाइब्रेरी सवेरे ही खुल जाती थी। कोई अड़चन न हुई। उन्होंने इधर मुँह फेरा। उधर यारों ने माल उड़ाया और चम्पत हुए। नईम के कमरे में चंदे के हिसाब से हिस्सा-बाँट हुआ। किसी ने घड़ी पायी, किसी ने रूमाल, किसी ने कुछ। एक रुपये के बदले पाँच-पाँच रुपये हाथ लगे।

प्रेमीजन का धैर्य अपार होता है। निराशा पर निराशा होती है, पर धैर्य हाथ से नहीं छूटता। पंडितजी बेचारे विपुल धन व्यय करने के पश्चात् भी प्रेमिका से सम्भाषण का सौभाग्य न प्राप्त कर सके। प्रेमिका भी विचित्र थी, जो पत्रों में मिसरी की डली घोल देती, मगर प्रत्यक्ष दृष्टिपात भी न करती थी। बेचारे बहुत चाहते थे कि स्वयं ही अग्रसर हों, पर हिम्मत न पड़ती थी। विकट समस्या थी। किंतु इससे भी वह निराश न थे। हवन-संध्या तो छोड़ ही बैठे थे। नये फ़ैशन के बाल कट ही चुके थे। अब बहुधा अँग्रेजी ही बोलते, यद्यपि वह अशुद्ध और भ्रष्ट होती थी। रात को अँग्रेजी मुहावरों की किताब लेकर पाठ की भाँति रटते। नीचे के दर्जों में बेचारे ने इतने श्रम से कभी पाठ न याद किया था। उन्हीं रटे हुए मुहावरों को मौके-बे-मौके काम में लाते। दो-चार लूसी के सामने भी अँग्रेजी बघारने लगे, जिससे उनकी योग्यता का परदा और भी खुल गया।

किंतु दुष्टों को अब भी उन पर दया न आयी। एक दिन चक्रधर के पास लूसी का पत्र पहुँचा, जिसमें बहुत अनुनय-विनय के बाद यह इच्छा प्रकट की गयी थी कि- “मैं भी आपको अँग्रेजी खेल खेलते देखना चाहती हूँ। मैंने आपको कभी फ़ुटबॉल या हॉकी खेलते नहीं देखा। अँग्रेज जेंटलमैन के लिए हॉकी, क्रिकेट आदि में सिद्धहस्त होना परमावश्यक है ! मुझे आशा है, आप मेरी यह तुच्छ याचना स्वीकार करेंगे। अँग्रेजी वेष-भूषा में, बोलचाल में, आचार-व्यवहार में, कॉलेज में अब आपका कोई प्रतियोगी नहीं रहा। मैं चाहती हूँ कि खेल के मैदान में भी आपकी सर्वश्रेष्ठता सिद्ध हो जाय। कदाचित् कभी आपको मेरे साथ लेडियों के सम्मुख खेलना पड़े, तो उस समय आपकी और आपसे ज़्यादा मेरी हेठी होगी। इसलिए टेनिस अवश्य खेलिए”

दस बजे पंडितजी को वह पत्र मिला। दोपहर को ज्यों ही विश्राम की घंटी बजी कि आपने नईम से जाकर कहा- “यार, ज़रा फ़ुटबॉल निकाल दो।

नईम फुटबाल के कप्तान भी थे। मुस्कराकर बोले- “ख़ैर तो है, इस दोपहर में फ़ुटबॉल लेकर क्या कीजिएगा ?आप तो कभी मैदान की तरफ झाँकते भी नहीं। आज इस जलती-बलती धूप में फ़ुटबॉल खेलने की धुन क्यों सवार है?”

चक्रधर- “आपको इससे क्या मतलब। आप गेंद निकाल दीजिए। मैं गेंद में भी आप लोगों को नीचा दिखाऊँगा”

नईम- “जनाब, कहीं चोट-चपेट आ जायगी, मुफ़्त में परेशान होइएगा। हमारे ही सिर मरहम-पट्टी का बोझ पड़ेगा। ख़ुदा के लिए इस वक़्त रहने दीजिए।“

चक्रधर- “आख़िर चोट तो मुझे लगेगी आपका इससे क्या नुकसान होता है ? आपको ज़रा-सा गेंद निकाल देने में इतनी आपत्ति क्यों है?”

नईम ने गेंद निकाल दिया और पंडितजी उसी जलती हुई दोपहरी में अभ्यास करने लगे। बार-बार गिरते थे, बार-बार तालियाँ पड़ती थीं, मगर वह अपनी धुन में ऐसे मस्त थे कि उसकी कुछ परवा ही न करते थे। इसी बीच में आपने लूसी को आते देख लिया, और भी फूल गये। बार-बार पैर चलाते थे, मगर निशाना खाली जाता था; पैर पड़ते भी थे तो गेंद पर कुछ असर न होता था। और लोग आकर गेंद को एक ठोकर में आसमान तक पहुँचा देते, तो आप कहते हैं, मैं जोर से मारूँ, तो इससे भी ऊपर जाय, लेकिन फ़ायदा क्या ? लूसी दो-तीन मिनट तक खड़ी उनकी बौखलाहट पर हँसती रही। आखिर नईम से बोली- वेल नईम, इस पंडित को क्या हो गया है ? रोज एक न एक स्वाँग भरा करता है। इसके दिमाग में ख़लल तो नहीं पड़ गया ?

नईम- “मालूम तो कुछ ऐसा ही होता है।“

शाम को सब लोग छात्रालय में आये, तो मित्रों ने जाकर पंडितजी को बधाई दी। यार, हो बड़े खुशनसीब, हम लोग फ़ुटबॉल को कॉलेज की चोटी तक पहुँचाते रहे, मगर किसी ने तारीफ़ न की। तुम्हारे खेल की सबने तारीफ़ की, ख़ासकर लूसी ने। वह तो कहती थी, “जिस ढंग से यह खेलते हैं, उस ढंग से मैंने बहुत कम हिंदुस्तानियों को खेलते देखा है। मालूम होता है, ऑक्सफ़ोर्ड का अभ्यस्त खिलाड़ी है।“

चक्रधर- “और भी कुछ बोली ? क्या कहा, सच बताओ?”

नईम- “अजी, अब साफ-साफ न कहलवाइए। मालूम होता है, आपने टट्टी की आड़ से शिकार खेला है। बड़े उस्ताद हो यार ! हम लोग मुँह ताकते रहे और तुम मैदान मार ले गये। जभी आप रोज यह कलेवर बदला करते थे ? अब भेद खुला। वाकई ख़ुशनसीब हो”

चक्रधर- “मैं उसी क़ायदे से गेंद में ठोकर मारता था, जैसे किताब में लिखा है”

नईम- “तभी तो बाज़ी मार ले गये भाई ! और नहीं क्या हम आपसे किसी बात में कम हैं। हाँ, तुम्हारी-जैसी सूरत कहाँ से लावें”

चक्रधर- “बहुत बनाओ नहीं। मैं ऐसा कहाँ का बड़ा रूपवान हूँ”

नईम- “अजी यह तो नतीजे ही से जाहिर है। यहाँ साबुन और तेल लगाते-लगाते भौंरा हुआ जाता हूँ और कुछ असर नहीं होता। मगर आपका रंग बिना हर्रे-फिटकिरी के ही चोखा है”

चक्रधर- “कुछ मेरे कपड़े वगैरह की निस्बत तो नहीं कहती थी?”

नईम- “नहीं, और तो कुछ नहीं कहा। हाँ, इतना देखा कि जब तक खड़ी रही, आपकी ही तरफ उसकी टकटकी लगी हुई थी”

पंडितजी अकड़े जाते थे। हृदय फूला जाता था। जिन्होंने उनकी वह अनुपम छवि देखी, वे बहुत दिनों तक याद रखेंगे। मगर इस अतुल आनन्द का मूल्य उन्हें बहुत देना पड़ा, क्योंकि अब कॉलेज का सेशन समाप्त होने वाला था और मित्रों की पंडितजी के माथे एक बार दावत खाने की बड़ी अभिलाषा थी। प्रस्ताव होने की देर थी। तीसरे दिन उनके नाम लूसी का पत्र पहुँचा-

क्रमशः

 

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