घनी कहानी, छोटी शाखा: मुंशी प्रेमचंद की कहानी “ढपोरशंख” का चौथा भाग

ढपोरशंख- मुंशी प्रेमचंद
भाग-4

(अब तक आपने पढ़ा…लेखक अपने एक मित्र के यहाँ आए हैं जिन्हें वो ढपोरशंख कहकर बुलाते हैं। इस मित्र के यहाँ आने पर उन्हें ढेर सारी चिट्ठियाँ मिलती हैं, जिसके बारे में पूछने पर पता चलता है कि वो उन्हें एक नए मित्र करुणाकर ने लिखी हैं। इस बात पर मित्र की पत्नी करुणाकर को धोखेबाज़ बताती हैं जबकि मित्र का कहना होता है कि वो एक ज़रूरतमंद इंसान था। यहाँ लेखक को पाँच बनाया जाता है और उन्हें ढपोरशंख करुणाकर की बातें बताते हैं। करुणाकर ने उन्हें एक किताब की आरम्भिक समीक्षा लिखने के लिए पत्र लिखा था लेकिन बाद में वो उनसे लगातार पत्र व्यवहार करने लगा। इसी दौरान उसने अपनी एक साहित्यकार के यहाँ नौकरी के बारे में भी बताया और बाद में उस नौकरी के छूटने के बारे में भी। कुछ दिनों बाद उसे एक नौकरी के लिए ज़मानत के तौर पर सौ रुपए देने की ज़रूरत होती है तो वो न होने की बात भी ख़त में लिख देता है। ढपोरशंख पत्नी से बात करके उसे रुपए भेज देता है और उसकी नौकरी लग जाती है। उसकी ओर से भेजा धन्यवाद का पत्र ढपोरशंख को काफ़ी प्रभावित करता है। अब तक तो ढपोरशंख को करुणाकर पर गर्व भी हो चुका होता है, उसी नौकरी के सिलसिले में करुणाकर काशी आकर रहने लगता है और कुछ ही दिनों में वहाँ से भी परेशानी भरे ख़त भेजने लगता है।आख़िर एक दिन वो ढपोरशंख के यहाँ रहने आ जाता है। पास के होटल में अपनी जेब से पैसे देकर उसके रहने का प्रबंध करवा देते हैं क्योंकि करुणाकर ने अपना वेतन उनके ही पते पर मँगवाया है। ढपोरशंख बताते हैं कि किस तरह करुणाकर की दोस्ती उनके एक दोस्त से हो गयी थी और ओ और ढपोरशंख की पत्नी ने तो उससे संगीत सीखना भी शुरू कर दिया था। यही नहीं उन दोनों को करुणाकर से ख़ास लगाव भी हो गया था। अब आगे….)

एक दिन मुझसे अपने एक ड्रामे की बड़ी तारीफ़ की। वह ड्रामा कलकत्ते में खेला गया। और मदन कंपनी के मैनेजर ने उसे बधाइयाँ दी थीं। ड्रामे के दो-चार टुकड़े जो उसके पास पड़े थे, मुझे सुनाये। मुझे ड्रामा बहुत पसन्द आया। उसने काशी के एक प्रकाशक के हाथ वह ड्रामा बेच दिया था और कुल पच्चीस रुपये पर। मैंने कहा,उसे वापस मँगा लो। रुपये मैं दे दूँगा। ऐसी सुन्दर रचना किसी अच्छे प्रकाशक को देंगे, या किसी थियेटर कम्पनी से खेलवायेंगे। तीन-चार दिन के बाद मालूम हुआ कि प्रकाशक अब पचास रुपये लेकर लौटाएगा। कहता है, मैं इसका कुछ अंश छपा चुका हूँ। मैंने कहा,मँगा लो पचास रुपये ही सही। ड्रामा वी.पी. से वापस आया। मैंने पचास रुपये दे दिए। महीना ख़त्म हो रहा था। होटलवाले दूसरा महीना शुरू होते ही रुपये पेशगी माँगेंगे। मैं इसी चिन्ता में था, कि जोशी ने आकर कहा, मैं अब माथुर के साथ रहूँगा। बेचारा ग़रीब आदमी है। अगर मैं बीस रुपये भी दे दूँगा, तो उसका काम चल जायगा। मैं बहुत ख़ुश हुआ। दूसरे दिन वह माथुर के घर डट गया।

जब आता, तो माथुर के घर का कोई-न-कोई रहस्य लेकर आता। यह तो मैं जानता था, कि माथुर की आर्थिक दशा अच्छी नहीं है। बेचारा रेलवे के दफ़्तर में नौकर था। वह नौकरी भी छूट गई थी। मगर यह न मालूम था कि उसके यहाँ फाँकें हो रहे हैं। कभी मालिक मकान आकर गालियाँ सुना जाता है, कभी दूधवाला, कभी बनिया, कभी कपड़ेवाला। बेचारा उनसे मुँह छिपाता फिरता है। जोशी आँखों में आँसू भर-भरकर उसके संकटों की करुण कहानी कहता और रोता। मैं तो जानता था, मैं ही एक आफ़त का मारा हूँ। माथुर की दशा देखकर मुझे अपनी विपत्ति भूल गई। मुझे अपनी ही चिन्ता है, कोई दूसरी फ़िक्र नहीं। जिसके द्वार पर जा पडूँ दो रोटियाँ मिल जायँगी, मगर माथुर के पीछे तो पूरा खटला है। माँ, दो विधवा बहनें, एक भांजी, दो भांजे, एक छोटा भाई। इतने बड़े परिवार के लिए पचास रुपए तो केवल रोटी-दाल के लिए चाहिए। माथुर सच्चा वीर है, देवता है जो इतने बड़े परिवार का पालन कर रहा है। वह अब अपने लिए नहीं, माथुर के लिए दुखी था।

देवीजी ने टीका की- “जभी माथुर की भांजी पर डोरे डाल रहा था। दु:ख का भार कैसे हलका करता?”

ढपोरशंख ने बिगड़कर कहा, “अच्छा तो अब तुम्हीं कहो”

मैंने समझाया – “तुम तो यार, ज़रा-ज़रा सी बात पर तिनक उठते हो ! क्या तुम समझते हो, यह फुलझड़ियाँ मुझे न्याय-पथ से विचलित कर देंगी?”

फिर कहानी शुरू हुई।

एक दिन आकर बोला, आज मैंने माथुर के उद्धार का उपाय सोच निकाला। मेरे एक माथुर मित्र बैरिस्टर हैं। उनसे जग्गो (माथुर की भांजी) के विवाह के विषय में पत्र-व्यवहार कर रहा हूँ। उसकी एक विधवा बहन को दोनों बच्चों के साथ ससुराल भेज दूँगा। दूसरी विधवा बहन अपने देवर के पास जाने पर राज़ी है। बस, तीन-चार आदमी रह जायँगे। कुछ मैं दूँगा, कुछ माथुर पैदा करेगा, गुजर हो जायेगा। मगर आज उसके घर का दो महीनों का किराया देना पड़ेगा। मालिक मकान ने सुबह ही से धरना दे रखा है। कहता है, अपना किराया लेकर ही हटूँगा। आपके पास तीस रुपये हों तो दे दीजिए। माथुर के छोटे भाई का वेतन कल-परसों तक मिल जायगा, रुपये मिल जायँगे। एक मित्र संकट में पड़ा हुआ है; दूसरा मित्र उसकी सिफ़ारिश कर रहा है। मुझे इनकार करने का साहस न हुआ ! देवीजी ने उस वक्त नाक-भौं जरूर सिकोड़ा था पर मैंने न माना, रुपये दे दिये।

देवीजी ने डंक मारा, “यह क्यों नहीं कहते, कि वह रुपए मेरी बहन ने बर्तन खरीदकर भेजने के लिए भेजे थे”

ढपोरशंख ने ग़ुस्सा पीकर कहा, “ख़ैर, यही सही ! मैंने रुपये दे दिए…मगर मुझे यह उलझन होने लगी कि इस तरह तो मेरा कचूमर ही निकल जायगा। माथुर पर एक-न-एक संकट रोज़ ही सवार रहेगा। मैं कहाँ तक उन्हें उबारूँगा? जोशी भी जान खा रहा था कि कहीं कोई जगह दिला दीजिए। संयोग से उन्हीं दिनों मेरे एक आगरे के मित्र आ निकले। काउंसिल में मेम्बर थे। अब जेल में हैं। गाने-बजाने का शौक है, दो-एक ड्रामे भी लिख चुके हैं, अच्छे-अच्छे रईसों से परिचय है ! ख़ुद भी बड़े रसिक हैं। अबकी वह आये, तो मैंने जोशी का उनसे ज़िक्र किया। उसका ड्रामा भी सुनाया। बोले तो उसे मेरे साथ कर दीजिए। अपना प्राइवेट सेक्रेटरी बना लूँगा। मेरे घर में रहे; मेरे साथ घर के आदमी की तरह रहे। जेब ख़र्च के लिए मुझसे तीस रुपये महीना लेता जाय। मेरे साथ ड्रामे लिखे। मैं फूला न समाया। जोशी से कहा,। जोशी भी तैयार हो गया; लेकिन जाने के पहले उसे कुछ रुपयों की जरूरत हुई। एक भले आदमी के साथ फटेहाल तो जाते नहीं बनता और न यही उचित था कि पहले ही दिन से रुपये का तकाजा होने लगे। बहुत काट-छाँट करने पर भी चालीस रुपये का ख़र्च निकल आया। जूते टूट गये थे, धोतियाँ फट गई थीं, और भी कई ख़र्च थे जो इस वक्त याद नही आते। मेरे पास रुपये न थे। श्यामा से माँगने का हौसला न हुआ।

देवीजी बोलीं -“मेरे पास तो कारूँ का ख़जाना रखा था न ! कई हज़ार महीने लाते हो, सौ-दो सौ रुपये बचत में आ ही जाते होंगे”

ढपोरशंख इस व्यंग्य पर ध्यान न देकर अपनी कथा कहते रहे — “रुपये पाकर जोशी ने ठाट बनाया और काउन्सिलर साहब के साथ चले। मैं स्टेशन तक पहुँचाने गया। माथुर भी था। लौटा, तो मेरे दिल पर से एक बोझ उतर गया था।”

माथुर ने कहा, “बड़ा मुहब्बती आदमी है”

मैंने समर्थन किया -“बड़ा। मुझे तो भाई-सा मालूम होता है”

“मुझे तो अब घर अच्छा न लगेगा। घर के सब आदमी रोते रहे। मालूम ही न होता था, कि कोई ग़ैर आदमी है। अम्माँ से लड़के की तरह बातें करता था। बहनों से भाई की तरह”

“बदनसीब आदमी है, नहीं तो जिसका बाप दो हजार रुपये माहवार कमाता हो, वह यों मारा-मारा फिरे”

“दार्जिलिंग में इनके बाप की दो कोठियाँ हैं?”

“आई.एम.एस. हैं”

“जोशी मुझे भी वहीं ले जाना चाहता है। साल-दो-साल में तो वहाँ जायगा ही। कहता है, तुम्हें मोटर की एजेंसी खुलवा दूँगा”- इस तरह ख़याली पुलाव पकाते हुए हम लोग घर आये।

मैं दिल में खुश था, कि चलो अच्छा हुआ, जोशी के लिए अच्छा सिलसिला निकल आया। मुझे यह आशा भी बँध चली, कि अबकी उसे वेतन मिलेगा, तो मेरे रुपये देगा। चार-पाँच महीने में चुकता कर देगा। हिसाब लगाकर देखा, तो अच्छी-ख़ासी रकम हो गई थी। मैंने दिल में समझा, यह भी अच्छा ही हुआ। यों जमा करता, तो कभी न जमा होते। इस बहाने से किसी तरह जमा तो हो गये। मैंने यह सोचा कि अपने मित्र से जोशी के वेतन के रुपये पेशगी क्यों न ले लूँ…कह दूँ, उसके वेतन से महीने-महीने काटते रहिएगा। लेकिन अभी मुश्किल से एक सप्ताह हुआ होगा कि एक दिन देखता हूँ, तो जोशी और माथुर, दोनों चले आ रहे हैं। मुझे भय हुआ, कहीं जोशीजी फिर तो नहीं छोड़ आये; लेकिन शंका को दबाता हुआ बोला, “कहो भाई, कब आये? मज़े में तो हो?”

क्रमशः

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