घनी कहानी, छोटी शाखा: मास्टर भगवानदास की कहानी “प्लेग की चुड़ैल” का चौथा भाग

प्लेग की चुड़ैल- मास्टर भगवानदास 

भाग-4

(अब तक आपने पढ़ा..प्रयाग में प्लेग के फैलने पर ठाकुर विभवसिंह अपने परिवार के साथ वापस अपने इलाक़े जाने की तैयारियों में होते हैं कि उनकी पत्नी को प्लेग हो जाता है। अपने पाँच वर्षीय पुत्र के कारण वो पत्नी के पास रुकते तो हैं किंतु उसके प्राण त्यागते ही ठाकुर भी इलाक़े के लिए निकल जाते हैं और पत्नी की अंतिम क्रिया को भी नौकरों के भरोसे छोड़ देते हैं। इधर नौकर भी आपसी सहमति से ठाकुर की पत्नी को जलाने की बजाय बांस से बँधी हुई गंगा में बहा देते हैं। बहते हुए शव किनारे लग जाता है और ठाकुर की पत्नी को होश आता है..क्योंकि डॉक्टर ने उनकी ठीक से जाँच नहीं की होती और उन्हें अचेत अवस्था में मृत घोषित किया होता है। एक काँटा लगने से उनके गले का घाव फूटता है और सारी पीड़ा जाती रहती है। किसी तरह ख़ुद को मुक्त करके ठाकुराईन एक किनारे पहुँचती हैं और वहाँ तरह-तरह के फूल और हरियाली देखते हुए उन्हें ख़याल आता है कि कहीं वो मरकर स्वर्ग तो नहीं, इसी भाँति के अलग-अलग विचारों में खोए हुए उन्हें अपने पुत्र की याद आती है और वो दुखी होकर वहीं घाट के पास बैठ जाती हैं। अब आगे..) 

इतने ही में दक्षिण दिशा से एक दासी हाथ में घड़ा लिए गंगाजल भरने को आयी। जब उसने पीछे से ही देखा कि कोई स्‍त्री कफ़न का श्‍वेत कपड़ा पहने अकेली चुपचाप बैठी है उसके मन में कुछ शंका हुई। जब उसने देखा कि नीचे पानी में एक मुर्दावाली सीढ़ी भी तैर रही है, तब तो उसे अधिक भय मालूम हुआ और उसने सोचा कि अवश्‍य कोई मरी हुई स्‍त्री चुड़ैल होकर बैठी है। जब उसके पाँव की आहट पाकर बहूजी ने उसकी ओर मुँह फेरा और गिड़गिड़ाकर उससे कुछ पूछने लगी तो वह उनकी खोड़रायी हुई आँखों और अधमरी स्‍त्री की-सी चेष्‍टा देखकर भय से चिल्‍ला उठी और चुड़ैल-चुड़ैल, करके वहीं घड़ा पटककर भागी। 

बहूजी ने गला फाड़-फाड़कर उसे बहुत पुकारा, पर वह न लौटी और अपने ग्राम में ही जाकर उसने दम लिया। जब उसकी भयभीत दशा देखकर और स्त्रियों ने उसका कारण पूछा तब उसने सब वृत्तान्‍त कह सुनाया, परंतु वह ऐसी डर गयी थी कि बार-बार घाट ही की ओर देखती थी कि कहीं वह चुड़ैल पीछे-पीछे आती न हो। 

उस समय ग्राम के कुछ मनुष्‍य खेत काटने चले गये थे और कुछ ठाकुर विभवसिंह के साथ टहलने निकल गये थे। केवल स्त्रियाँ और लड़के गाँव में रह गये थे। उनमें से किसी को यह साहस नहीं होता था कि घाट पर जाकर उस दासी की अपूर्व कथा की जाँच करे। चुड़ैल का नाम सुनते ही वे सब ऐसी डर गयी थीं कि अपने-अपने लड़कों को घर में बंद करने लगीं कि कहीं चुड़ैल आकर उन्‍हें चबा न डाले।

उस समय ठाकुर साहब का लड़का नवलसिंह भी अपनी मृत माता का स्‍मरण कर-कर नेत्रों से आँसू बहाता हुआ इधर-उधर घूम रहा था और लड़कों के साथ खेलने की उसे इच्‍छा न होती थी। जब एक स्‍त्री ने उससे भी कहा कि भैया, तुम अपने बँगले में छिप जाओ, नहीं तो वह चुड़ैल आकर तुम्‍हें पकड़ लेगी, वह आश्‍चर्यचकित होकर पूछने लगा कि “चुड़ैल कैसी होती है? यदि वह यहाँ आवेगी भी तो मुझे क्‍यों पकड़ेगी, मैंने उसकी कोई हानि नहीं की है”

इधर तो यह बातें हो रही थीं, उधर बहूजी निराश होकर फिर मन में सोचने लगीं कि यह तो निश्‍चय है कि मैं अभी तक मृत्‍युलोक में ही हूँ पर क्‍या वास्‍तव में मेरा पुनर्जन्‍म हुआ है? क्‍या मैं सचमुच चुड़ैल हो गई हूँ, जैसा कि यह स्‍त्री मुझे देखकर कहती हुई भागी है! अवश्‍य इसमें कुछ भेद है वरना मैं इन कृशित अंगों पर कफ़न का श्‍वेत वस्‍त्र लपटाये, काले नागों के-से बालों के लट लटकाये हुए इस अज्ञात निर्जन स्‍थान में कैसे आ जाती! हे विधाता! मैंने कौन-सा पाप किया जो तूने मुझे चुड़ैल का जन्‍म दिया! क्‍या पतिव्रत धर्म का यही फल है? अब मैं इस अवस्‍था में अपने प्‍यारे पुत्र को कहाँ पाऊँगी, और यदि पाऊँगी तो कैसे उसे गले लगाऊँगी? वह तो मेरी डरावनी सूरत देखते ही भागेगा, पर जो हो, मैं उसे अवश्‍य तलाश करूँगी और यदि वह मुझसे सप्रेम नहीं मिलेगा तो उसको भी इसी दशा में परिवर्तित करने की चेष्‍टा करूँगी। यह सोचकर वह धीरे-धीरे उसी ओर चली, जिधर वह दासी भागी थी।

दुर्बलता के मारे सारा देह काँपता था, पर क्‍या करे, क्षुधा के मारे रहा नहीं जाता था, निदान खिसकते-खिसकते उपवन डाककर वह वाटिका में पहुँची जिसमें अमरूद, नारंगी, फालसा, लीची, संतरा इत्‍यादि के पेड़ लगे हुए थे और क्‍यारियों में अनेक प्रकार के अँग्रेजी और हिंदुस्‍तानी फूल फले हुए थे। वाटिका के दक्षिण ओर एक छोटा-सा बँगला मालूम होता है जैसा मेरे इलाके पर के बगीचे में बना हुआ है; क्‍या मैं ईश्‍वर की कृपा से अपनी ही वाटिका में तो नहीं आ गई हूँ! अरे, यह पुष्‍प-मण्‍डल भी तो वैसा ही जान पड़ता है जिसमें तीन वर्ष हुए नवलजी को गोद में लेकर खिलाती थी। मैं जब यहाँ आयी थी तो ग्राम की स्त्रियों से सुना था कि निकट ही गंगाजी का घाट है। मैंने ठाकुर साहब से वहाँ स्‍नान करने की आज्ञा माँगी थी, परंतु उन्‍होंने नहीं दी, क्‍या उसी पाप का तो यह फल नहीं है कि मैं इस दशा को प्राप्‍त हुई हूँ! परंतु उसमें मेरा क्‍या दोष था! स्‍त्री के लिए तो पति की आज्ञा पालन करना ही परम धर्म है। यह फल मेरे किसी और जन्‍म के पापों का मालूम होता है।

इसी तरह मन में अनेक कल्‍पनाएँ करती हुई बहूजी एक नारंगी के पेड़ के नीचे बैठ गयीं और लटकी हुई डाल से एक नारंगी तोड़कर अपनी प्रज्‍वलित क्षुधाग्नि को बुझाना चाहती थीं कि इतने में नवलसिंह घूमता-घूमता उसी स्‍थान पर आ गया, उसको देखते ही बहूजी की भूख-प्‍यास जाती रही। जैसे मृगी अपने खोए हुए शावक को पाकर उसकी ओर दौड़ती है वैसे ही बहूजी झपटकर नवलसिंह से लिपट गयी और ‘बेटा नवलजी! बेटा नवलजी’ कहकर उसका मुख चूमने लगी।

क्रमशः

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!