घनी कहानी, छोटी शाखा: भुवनेश्वर की कहानी ‘माँ-बेटे’ का अंतिम भाग

माँ-बेटे – भुवनेश्वर

भाग-2

(अब तक आपने पढ़ा…घर में बड़ी-बूढ़ी माँ मरणासन्न पड़ी है और पास-पड़ोस ही नहीं बल्कि घर के लोग भी अब इस बात में कम रुचि ले रहे हैं कि वो मरने वाली हैं। शायद कुछ लम्बे समय से ये माहौल यूँ ही बना हुआ है जिससे सबके रवैए भी बदले हुए से हैं। घर के सारे बच्चे अपनी माँ के पास ही इकट्ठा हैं, लड़कियाँ अपनी-अपनी गृहस्थी छोड़कर माँ को देखने आ गयी हैं। बहुएँ ही नहीं बल्कि छोटे-बड़े दोनों भाई कई दिनों बाद एक-दूसरे से मिले हैं और अजीब सा महसूस कर रहे हैं..लड़कियाँ अपनी आदतानुसार भाभियों से एक-दूसरे की चुग़ली करना चाहती हैं वहीं घर की बहुएँ भी एक-दूसरे से कोई ख़ास प्रेम नहीं रखतीं। इन सबके बीच लेटी हैं अपने मौत का इंतज़ार करती माँ..जो भी बच्चों द्वारा अजायबघर बनी हुई हैं कोई छोटे नाती-पोतों से माँ का पैर छुआता है और माँ को आशीर्वाद देने कहता है, तो कोई माँ को भगवान का नाम जपने कहता है। जबकि माँ इन सभी के चेहरों में बसी ज़िंदगी देख रही हैं और मन ही मन यादों में उलझी हुई सोच रही हैं कि आख़िर ये सारे असफल क्यों रह गए? जहाँ सब उसकी वजह से एक छत के नीचे अपने-अपने गिले-शिकवे के साथ इकट्ठा हैं वहीं मरणासन्न माँ उन सभी से दूर होती चली जा रही हैं। अब आगे…)

वाकई यह सब लोग असफल रहे। एक आदमी मरते वक़्त ही दूसरे की इस बेमतलब और शर्मनाक असफलता को पूरी तरह जान सकता है। कुच्चो एक जमाने में हसीन-उमंगोंवाली थी। पहली सन्तान, माँ-बाप की लाड़ली। हौसले से ब्याही गई, पर यही नहीं कि समय-सूरमा से हार गई हो, पर रीति-रीति हो गयी। अम्मा का एक वक़्त इस पर अटूट प्यार था, जो बाद में बड़े लड़के के हिस्से में पड़ा। वह भी असफल रहा। अम्मा ने इन सबके लिए गहरे रंगों के पैटर्न बनाए, पर वह सब टूट गए। इनमें से एक भी उसके नज़दीक न था, उसका न था। इस वक़्त तो उसके वही अपने थे जो बिलकुल पूरे-पूरे उसके बनाए थे। हो सकता है, उसने उनसे बहुत ज़्यादा चाहा, पर क्या हुआ। किसी को अपनाना कुछ कम है? आधी रात को वह सब जमीन में बिस्तर बिछाए सो रहे थे, सिर्फ अम्मा जाग रही थी और जैसे डूब रही थी। ताज्जुब है कि उसकी तकलीफ़ भी डूब रही थी। वह दूर-दूर की बातें सोचने लगी। बेमतलब, बेजोड़। कोई मकान, कोई कभी का देखा हुआ आदमी, वह अजीब आवाज़ें सुनने लगी। पर यह हालत बहुत देर तक न रही। वह घबराने लगी जैसे वह अकेली किसी अँधेरे रास्ते पर जाने से डर रही है। बदन में शक्ति न थी, वह बहुत दिन हुए जान चुकी थी, इसकी आदी हो चकी थी, पर इस वक़्त वह उस शक्ति के लिए लड़ने को तैयार हो गई। और सब सो रहे थे। वह उनके नथनों की आवा़ज सुन रही थी, पहचान रही थी, पर यह सब उसके लिए क्या है, जब उसके ही अपने जिस्म में शक्ति न थी? वह तो उसके लिए लड़ेगी! उसके चेहरे की शान्ति गायब हो गई। वहाँ एक कड़वे संग्राम ने जगह पाई। उसका मुँह तीखा और – और भी बेजान हो चला।

बड़ा लड़का इत्तफ़ाक़ से जाग उठा, वह कोई अप्रिय सपना देख रहा था। उसने खाँसकर सिरहाने रखा पानी पिया और उठकर अम्मा के पास आया, झुककर धीमी रोशनी में उसने उसका मुँह देखा, सिरहाने खाट पर ही सर रखे सोती हुई छोटी बहन को जगाना चाहा, पर फिर अम्मा के बाल सँभालते हुए बोला – “अम्मा!”

अम्मा ने चौंककर उसकी तरफ देखा और वह अन्दर का संग्राम जैसे धीमा पड़ गया, उसमें उसे थोड़ी-सी शान्ति मिली।

बड़े लड़के ने फिर पुकारा- “अम्मा!”

अम्मा फिर जैसे सोते से जगी। उसके पूरे-पूरे मन ने लड़के को पहचान लिया। वह एक पल के लिए उसके सिवा सब कुछ भूल गई। उसके स्तनों से एक गहरी और तीव्र लालसा बह उठी, उसे कुछ दे डालने को – “कुछ!”

“पानी पिओगी!”- लड़के ने कहा।

अम्मा के अंग-अंग ने कुछ बोलना चाहा, पर वह बोल न सकी। संग्राम फिर शुरू हो गया। उसने मुँह फेरकर जोर-जोर से साँस लेना शुरू किया।

बड़े लड़के ने कुछ घबराकर उसकी दोनों बाँहों पर हाथ रखकर कहा – “क्या है अम्मा?”

अचानक अम्मा ने पाया, अपने अन्दर एक पुरानी पहचानी हुई लपट को तीर की तरह सब तरफ से घुसते हुए। उसने जाना था कि यह लपट हमेशा के लिए बुझ गई है; पर इस वक़्त इस समूचे और सच्चे संग्राम के वक़्त इसके छू-भर जाने से वह पुरानी लपट उसके रोएँ-रोएँ में नाच उठी। वह सिहर उठी और अब सारा संग्राम उस लपट की ओर मुड़ गया। बड़ा बेटा काँपती हुई अम्मा को मजबूती से थामकर उसके बिलकुल नज़दीक आ गया था, यहाँ तक कि उनके सीने मिल गए और वह लपट और ते़ज हो गयी और कमर के नीचे के हिस्से में बढ़कर उसकी पिंडलियों में चक्कर काटने लगी। उसने मुश्किल से अपने कमजोर हाथ उठाए और एक प्रेत के स्पर्श की तरह उसकी पीठ को सहलाने लगी। सारा संग्राम ख़त्म हो चुका था, सिर्फ़ उसके कमज़ोर मरते हुए हाथ एक अन्दर की प्रेरणा से बेटे की पीठ पर घिसटते रहे और फिर धीरे-धीरे मर गए। बड़े ने आज तक किसी को मरते न देखा था इसीलिए वह किसी को वक़्त पर जगा भी न सका।

समाप्त

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