घनी कहानी, छोटी शाखा: जयशंकर प्रसाद की कहानी “चूड़ीवाली” का अंतिम भाग  

चूड़ीवाली- जयशंकर प्रसाद

भाग-2

(अब तक आपने पढ़ा, नगर के प्रसिद्ध नर्तकी की कन्या विलासिनी अपने जीवन में सुख न पाकर, कुलवधु बनने की अभिलाषा और दाम्पत्य सुख का स्वप्न लिए, नगर के ज़मींदार विजयकृष्ण पर मोहित होती है। उसका दिल जीतने की उम्मीद लिए विलासिनी अपना वैभव छोड़कर एक चूड़ीवाली का रूप लेती है और रोज़ विजयकृष्ण के घर उसकी पत्नी को नई चूड़ियाँ पहनाने के बहाने आ जाया करती है। जब भी विलासिनी विजयकृष्ण को अपने सामने पाती तो उससे हँसी-मज़ाक़ की दो बातें भी कर लेती। विजयकृष्ण, विलासिनी की असलियत को जानते हुए भी उसे घर में आने देते ये सोचकर कि वो उनकी पत्नी के रूप वैभव को देखकर, आप ही वहाँ बसने का ख़याल छोड़ देगी। इसी दौरान विजयकृष्ण की पत्नी विलासिनी(चूड़ीवाली) का अपमान करती है, ये अपमान ही विलासिनी के निकट विजयकृष्ण को ले आता है। दोनों का प्रेम पींगे भर रहा होता है और इसका असर विजयकृष्ण की पत्नी के स्वास्थ्य पर नज़र आता है। एक वक़्त में विजयकृष्ण अचानक अपनी सम्पत्ति और धर्म पत्नी दोनों को खो बैठते हैं..विलासिनी इसे अपनी जीत समझती है लेकिन क्या ये वाक़ई उसकी जीत है?..पढ़ते हैं आगे)    

विजयकृष्ण का वह एक विनोद था। जब सब कुछ चला गया, तब विनोद लेकर क्या होगा। एक दिन चूड़ीवाली से छुट्टी माँगी। उसने कहा-”कमी किस बात की है, मैं तुम्हारी ही हूँ और सब विभव भी तुम्हारा है।” विजयकृष्ण ने कहा-”मैं वेश्या की दी हुई जीविका से पेट पालने में असमर्थ हूँ।” चूड़ीवाली बिलखने लगी, विनय किया, रोयी, गिड़गिड़ाई पर विजयकृष्ण चले ही गये!

वह सोचने लगी कि-”अपना व्यवसाय और विजय की गृहस्थी बिगाड़कर जो सुख ख़रीदा था, उसका कोई मूल्य नहीं। मैं कुलवधू होने के उपयुक्त नहीं। क्या समाज के पास इसका कोई प्रतिकार नहीं? इतनी तपस्या और इतना स्वार्थ-त्याग व्यर्थ है?”

परन्तु विलासिनी यह न जानती थी कि स्त्री और पुरुष-सम्बन्धी समस्त अन्तिम निर्णय करने में समाज कितना ही उदार क्यों न हो; दोनों पक्षों को सर्वथा सन्तुष्ट नहीं कर सका और न कर सकने की आशा है। यह रहस्य सृष्टि को उलझा रखने की कुञ्जी है।

विलासिनी ने बहुत सोच-समझकर अपनी जीवनचर्या बदल डाली। सरकार से मिली हुई जो कुछ सम्पत्ति थी, उसे बेचकर पास ही के एक गाँव में खेती करने के लिए भूमि लेकर आदर्श हिन्दू गृहस्थ की-सी तपस्या करने में अपना बिखरा हुआ मन उसने लगा दिया। उसके कच्चे मकान के पास एक विशाल वट-वृक्ष और निर्मल जल का सरोवर था। वहीं बैठकर चूड़ीवाली ने पथिकों की सेवा करने का संकल्प किया।

थोड़े ही दिनों में अच्छी खेती होने लगी और अन्न से उसका घर भरा रहने लगा। भिखारियों को अन्न देकर उन्हें खिला देने में उसे अकथनीय सुख मिलता। धीरे-धीरे दिन ढलने लगा, चूड़ीवाली को सहेली बनाने के लिए यौवन का तीसरा पहर करुणा और शान्ति को पकड़ लाया। उस पथ से चलनेवाले पथिकों को दूर से किसी कला-कुशल कण्ठ की तान सुनाई पड़ती-

“अब लौं नसानी अब न नसैहौं”

वट-वृक्ष के नीचे एक अनाथ बालक नन्दू को चना और गुड़ की दुकान  चूड़ीवाली ने करा दी है। जिन पथिकों के पास पैसे न होते, उनका मूल्य वह स्वयं देकर नन्दू की दुकान में घाटा न होने देती, और पथिक भी विश्राम किए  बिना उस तालाब से न जाते। कुछ ही दिनों में चूड़ीवाली का तालाब विख्यात हो गया।

सन्ध्या हो चली थी। पखेरुओं का बसेरे की ओर लौटने का कोलाहल मचा और वट-वृक्ष में चहल-पहल हो गई। चूड़ीवाली चरनी के पास खड़ी बैलों को देख रही थी। दालान में दीपक जल रहा था, अन्धकार उसके घर और मन में बरजोरी घुस रहा था। कोलाहल-शून्य जीवन में भी चूड़ीवाली को शान्ति मिली, ऐसा विश्वास नहीं होता था। पास ही उसकी पिण्डुलियों से सिर रगड़ता हुआ कलुआ दुम हिला रहा था। सुखिया उसके लिए घर में से कुछ खाने को ले आयी थी; पर कलुआ उधर न देखकर अपनी स्वामिनी से स्नेह जता रहा था।

चूड़ीवाली ने हँसते हुए कहा-”चल, तेरा दुलार हो चुका। जा, खा ले”

चूड़ीवाली ने मन में सोचा- “कंगाल मनुष्य स्नेह के लिए क्यों भीख माँगता है? वह स्वयं नहीं करता, नहीं तो तृण-वृद्ध  तथा पशु-पक्षी भी तो स्नेह करने के लिए प्रस्तुत है”- इतने में नन्दू ने आकर कहा-

”माँ, एक बटोही बहुत थका हुआ अभी आया है। भूख के मारे वह जैसे शिथिल हो गया है”

“तूने क्यों नहीं दे दिया?”

“लेता भी नहीं, कहता है, तू बड़ा ग़रीब लडक़ा है, तुझसे न लूँगा”

चूड़ीवाली वट-वृक्ष की ओर चल पड़ी। अँधेरा हो गया था। पथिक जड़ का सहारा लेकर लेटा था। चूड़ीवाली ने हाथ जोड़कर कहा-”महाराज, आप कुछ भोजन कीजिए”

“तुम कौन हो?”

“पहले की एक वेश्या।”

“छि:, मुझे पड़े रहने दो, मैं नहीं चाहता कि तुम मुझसे बोलो भी, क्योंकि तुम्हारा व्यवसाय कितने ही सुखी घरों को उजाड़कर श्मशान बना देता है”

“महाराज, हम लोग तो कला के व्यवसायी हैं। यह अपराध कला का मूल्य लगानेवालों की कुरुचि और कुत्सित इच्छा का है। संसार में बहुत-से निर्लज्ज स्वार्थपूर्ण व्यवसाय चलते हैं। फिर इसी पर इतना क्रोध क्यों?”

“क्योंकि वह उन सबों में अधम और निकृष्ट है।”

“परन्तु वेश्या का व्यवसाय करके भी मैंने एक ही व्यक्ति से प्रेम किया था। मैं और धर्म नहीं जानती, पर अपने सरकार से जो कुछ मुझे मिला, उसे मैं लोक-सेवा में लगाती हूँ। मेरे तालाब पर कोई भूखा नहीं रहने पाता। मेरी जीविका चाहे जो रही हो, मेरे अतिथि-धर्म में बाधा न दीजिए”

पथिक एक बार ही उठकर बैठ गया और आँख गड़ाकर अँधेरे में देखने लगा। सहसा बोल उठा- “चूड़ीवाली?”

“कौन, सरकार?”

“हाँ, तुमने शोक हर लिया। मेरे अपराधजनक तमाम त्याग में पुण्य का भी भाग था, यह मैं नहीं जानता”

“सरकार! मैंने गृहस्थ-कुलवधू होने के लिए कठोर तपस्या की है। इन चार वर्षों में मुझे विश्वास हो गया है कि कुलवधू होने में जो महत्व है, वह सेवा का है, न कि विलास का”

“सेवा ही नहीं, चूड़ीवाली! उसमें विलास का अनन्त यौवन है, क्योंकि केवल स्त्री-पुरुष के शारीरिक बन्धन में वह पर्यवसित नहीं है, बाह्य साधनों के विकृत हो जाने तक ही, उसकी सीमा नहीं, गार्हस्थ्य जीवन उसके लिए प्रचुर उपकरण प्रस्तुत करता है, इसलिए वह प्रेय भी है और श्रेय भी है। मुझे विश्वास है कि तुम अब सफल हो जाओगी”

“मेरी सफलता आपकी कृपा पर है। विश्वास है कि अब इतने निर्दय न होंगे”-कहते-कहते चूड़ीवाली ने सरकार के पैर पकड़ लिये।

सरकार ने उसके हाथ पकड़ लिए।

समाप्त

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