घनी कहानी, छोटी शाखा: जयशंकर प्रसाद की कहानी “तानसेन” का अंतिम भाग

तानसेन- जयशंकर प्रसाद

भाग-2

(अब तक आपने पढ़ा…प्रकृति के घनी ख़ूबसूरती के बीच जा रहा एक पथिक प्यास से व्याकुल हो जल ढूँढना चाहता है और उसे घने वृक्षों के बीच एक जलस्थान मिल भी जाता है। लेकिन वहाँ अपने अश्व से उतरते ही वो अपनी प्यास भूल कर स्तब्ध खड़ा रहता है क्योंकि उसके कानों में किसी के गीतों की आवाज़ आती है। एक ऐसी मधुर आवाज़ जिसे सुनने के लिए कोयल भी अपना कूकना भूल जाती है। गीत रुकने पर अथिक जब आगे बढ़कर जाता है तो उसे एक युवक दिखायी देता है। पथिक उससे उसका नाम पूछकर अपने साथ चलने का आमंत्रण देता है। वो युवक रामप्रसाद पथिक के साथ चल देता है। कुछ पलों के बाद जब पथिक किले में प्रवेश करता है तो रामप्रसाद को समझ आता है कि वो पथिक राजमहल का कोई सम्मानित व्यक्ति है। वो पथिक ग्वालियर किले का सरदार है वो रामप्रसाद की आवभगत करवाता है और उसे रामप्रसाद की आवाज़ इतनी भली लगती है कि वो अपने पाई बाग़ में रहने की व्यवस्था करवा देता है। रामप्रसाद वहाँ रहता है अपना खाना बनाया करता है और इसी बीच गीत भी गाता है जिसे सभी मंत्रमुग्ध होकर सुनते हैं सरदार भी कई बार कहीं जाते हुए रामप्रसाद का गीत सुनने के लिए थम जाते हैं। लेकिन रामप्रसाद के गीतों का ख़ास असर हुआ सरदार-पत्नी की एक नयी सेविका पर, वो उसके गीतों को सुनते हुए अपने काम भूल जाती या कुछ का कुछ कर जाती। बाद में उसे सरदार पत्नी के सामने लज्जित होना पड़ता। जबकि रामप्रसाद को इन सुख वैभवों से कहीं प्यारा अपना गीत था, जब उसके गीत में खोकर कोई अपना काम भूल जाता तो उसे बड़ा आनंद मिलता। सरदार को तो रामप्रसाद के गानों का ऐसा नशा था कि उसके बिना उन्हें अपना दिन अधूरा लगता। एक रोज़ रामप्रसाद ने उसी सरोवर के पास जाने की इच्छा प्रकट की जहाँ से सरदार उसे यहाँ ले आए थे। सरदार ने उसे छुट्टी दे दी। रामप्रसाद चला गया। अब आगे…)

सन्ध्या को सरदार चबूतरे पर नहीं बैठे, महल में चले गये।

उनकी स्त्री ने कहा- “आज आप उदास क्यों हैं?”

सरदार- “रामप्रसाद के गाने में मुझे बड़ा ही सुख मिलता है”

सरदार-पत्नी- “क्या आपका रामप्रसाद इतना अच्छा गाता है जो उसके बिना आपको चैन नहीं? मेरी समझ में मेरी बाँदी उससे अच्छा गा सकती है”

सरदार-(हँसकर) “भला! उसका नाम क्या है?”

सरदार-पत्नी- “वही, सौसन-जिसे में देहली से ख़रीदकर ले आई हूँ”

सरदार- “क्या ख़ूब! अजी, उसको तो मैं रोज देखता हूँ। वह गाना जानती होती, तो क्या मैं आज तक न सुन सकता”

सरदार-पत्नी- “तो इसमें बहस की कोई जरूरत नहीं है। कल उसका और रामप्रसाद का सामना कराया जावे”

सरदार- “क्या हर्ज”

आज उस छोटे-से उद्यान में अच्छी सज-धज है। साज लेकर दासियाँ बजा रही हैं। ‘सौसन’ संकुचित होकर रामप्रसाद के सामने बैठी है। सरदार ने उसे गाने की आज्ञा दी।

उसने गाना आरम्भ किया-

“कहो री, जो कहिबे की होई।

बिरह बिथा अन्तर की वेदन सो जाने जेहि होई।।

ऐसे कठिन भये पिय प्यारे काहि सुनावों रोई।

‘सूरदास’ सुखमूरि मनोहर लै जुगयो मन गोई।।”

कमनीय कामिनी कण्ठ की प्रत्येक तान में ऐसी सुन्दरता थी कि सुननेवाले बजानेवाले-सब चित्र लिखे-से हो गये। रामप्रसाद की विचित्र दशा थी, क्योंकि सौसन के स्वाभाविक भाव, जो उसकी ओर देखकर होते थे उसे मुग्ध किये हुए थे।

रामप्रसाद गायक था, किन्तु रमणी-सुलभ भ्रू-भाव उसे नहीं आते थे। उसकी अन्तरात्मा ने उससे धीरे-से कहा कि “सर्वस्व हार चुका”

सरदार ने कहा- “रामप्रसाद, तुम भी गाओ”

वह भी एक अनिवार्य आकर्षण से-इच्छा न रहने पर भी, गाने लगा।

“हमारो हिरदय कलिसहु जीत्यो।

फटत न सखी अजहुँ उहि आसा बरिस दिवस पर बीत्यो।।

हमहूँ समुझि पर्यो नीके कर यह आसा तनु रीत्यो।

‘सूरस्याम’ दासी सुख सोवहु भयउ उभय मन चीत्यो।।”

सौसन के चेहरे पर गाने का भाव एकबारगी अरुणिमा में प्रगट हो गया। रामप्रसाद ने ऐसे करुण स्वर से इस पद को गाया कि दोनों मुग्ध हो गये।सरदार ने देखा कि मेरी जीत हुई। प्रसन्न होकर बोल उठे

“रामप्रसाद, जो इच्छा हो, माँग लो”

यह सुनकर सरदार-पत्नी के यहाँ से एक बाँदी आई और सौसन से बोली- “बेगम ने कहा है कि तुम्हें भी जो माँगना हो, हमसे माँग लो”

रामप्रसाद ने थोड़ी देर तक कुछ न कहा। जब दूसरी बार सरदार ने माँगने को कहा, तब उसका चेहरा कुछ अस्वाभाविक-सा हो उठा। वह विक्षिप्त स्वर से बोल उठा- “यदि आप अपनी बात पर दृढ़ हों, तो ‘सौसन’ को मुझे दे दीजिए”

उसी समय सौसन भी उस बाँदी से बोली- “बेगम साहिबा यदि कुछ मुझे देना चाहें, तो अपने दासीपन से मुझे मुक्त कर दें”

बाँदी भीतर चली गई। सरदार चुप रह गये। बाँदी फिर आई और बोली- “बेगम ने तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार की और यह हार दिया है”

इतना कहकर उसने एक जड़ाऊ हार सौसन को पहना दिया।

सरदार ने कहा- “रामप्रसाद, आज से तुम ‘तानसेन’ हुए, यह सौसन भी तुम्हारी हुई; लेकिन धरम से इसके साथ ब्याह करो”

तानसेन ने कहा- “आज से हमारा धर्म ‘प्रेम’ है”

समाप्त

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