घनी कहानी, छोटी शाखा: चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की कहानी “हीरे का हार” का दूसरा भाग

हीरे का हार- चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’
भाग-2

(अब तक आपने पढ़ा..गुलाबदेई सुबह से अपने घर की साज संभाल में लगी है. अपनी सुविधानुसार वो सारी साज-सज्जा कर रही है. उसका पति लहनासिंह सालों बाद घर वापस आने वाला था… सारी तैयारियों के बीच भी उसके मन में एक ख़ुशी बनी हुई थी..बस भय इसी बात का था कि चीन की लड़ाई में लहनासिंह के एक टांग गँवाने का जो समाचार मिला है वो सच न हो…पहले भी लहनासिंह की माँ और पत्नी इस समाचार को सुनकर देवता से लहनासिंह की टांग सही सलामत कर देने की प्रार्थना माँग चुकी थीं और उन्हें धीरे-धीरे यक़ीन भी हो चला था कि लहनासिंह दोनों पैरों पर चलता हुआ लौटेगा…लेकिन उनकी आशाओं को तोड़ता हुआ लहनासिंह एक टांग पर चलता घर पहुँच जाता है..माँ भरे दिल से उसका स्वागत करती है और माँ के बाहर जाते ही पत्नी गुलाबदेई लहनासिंह के सीने से लगकर तीन वर्षों की सारी भावनाएँ आसुओं के ज़रिये उस पर लुटाती है..अब आगे….)

(इस कहानी को चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ इतना ही लिख पाए थे. अब आगे के जो अंश हम आपके लिए लाये हैं वो कथाकार डॉ. सुशील कुमार फुल्ल द्वारा लिखा गया है, उन्होंने इस कहानी को पूरा किया)

प्रेम का अमर नाम आनंद है। इसकी बेल जन्‍म-जन्‍मांतर तक चलती है। गुलाबदेई को तीन वर्ष के बाद पति-स्‍पर्श का सुख मिला था। पहले तो वह लाजवंती-सी छुईमुई हुई, फिर वह फूली हुई बनिए की लड़की-सी पति में ही धसती चली गई। पहाड़ी नदी के बाँध टूटना ही चाहते थे कि लहनासिंह लड़खड़ा गया और गिरते-गिरते बचा। सकुचायी-सी, शर्मायी-सी गुलाबदेई ने लहनासिंह को चिकुटी काटते हुए कहा – “बस…” और आँखों ही आँखों में बिहारी की नायिका के समान भरे मान में मानो कहा – “कबाड़ी के सामने भी कोई लहँगा पसारेगी?”

“हारे को हरिनाम, गुलाबदेई…मेरी प्राणप्‍यारी! मैं हारा नहीं हूँ। सुनो… मर्द और कर्द कभी खुन्‍ने नहीं होते गुलाबो… और चीन की लड़ाई ने तो मेरी धार और तेज कर दी है”- लहनासिंह तन कर खड़ा हो गया था! गुलाबदेई सरसों-सी खिल आई। मानो लहनासिंह उसे कल ही ब्‍याह कर लाया हो।

माँ रसोई करने चली गई थी। तीन साल बाद बेटा आया था। उसके कानों में बैसाखियों की खड़खड़ाहट अब भी सुनाई दे रही थी। भगवती से कितनी मन्‍नतें मानी थीं। वह शिवजी के मंदिर में भी हो आई थी! आखिर देवी-देवता चाहें तो वह सही सलामत भी आ सकता था परंतु अब तो वह साक्षात सामने था। फिर भी माँ को किसी चमत्‍कार की आशा थी, वह सीडूं बाबा से पुच्‍छ लेने जाएगी। फिर देगची में कड़छी हिलाते हुए सोचने लगी… “देश के लिए एक टाँग गँवा दी तो क्‍या हुआ?”

उसकी छाती फूल गई। बेटे ने माँ के दूध की लाज रखी थी।

“चाचा, तुम आ गए!” हीरा उछलता हुआ आया

“हाँ बेटा”- लहनासिंह ने उसे अंक में भरते हुए कहा।

“चाचा… इतने दिन कहाँ थे?”

“बेटा मैं लाम पर था। चीन से युद्ध हो रहा था न…”

“चीन कहाँ है?” मासूमियत से बालक ने पूछा!

“हिमालय के उस पार”

“मुझे भी ले चलोगे न?”

“अब मैं नहीं जाऊँगा…फ़ौज से मेरी छुट्टी हो गई”- कुछ सोचकर उसने फिर कहा – “बेटा, तुम बड़े हो जाओगे तो फ़ौज में भर्ती हो जाना”

“मैं भी चीनियों को मार गिराऊँगा! लेकिन चाचा क्‍या मेरी भी टाँग कट जाएगी?”

“धत्त तेरी! ऐसा नहीं बोलते। टाँग कटे दुश्‍मनों की”

फिर हीरे ने जेब में आम की गुठली से बनाई पीपनी निकाली और बजाने लगा। बरसात में आम की गुठलियाँ उग आती हैं, तो बच्‍चे उस पौधों को उखाड़कर गुठली में से गिट्टक निकालकर बजाने लगते हैं। बड़े-बूढ़े खौफ़ दिखाते हैं कि गुठलियों में साँप के बच्‍चे होते हैं परंतु इन बंदरों को कौन समझाए… आदमी के पूर्वज जो ठ‍हरे!

“तुम मदरसे जाते हो?”

“हूँ… लेकिन मौलवी की लंबी दाढ़ी से डर लगता है…”

“क्‍यों ?”

“दाढ़ी में उसका मुँह ही दिखायी नहीं देता…”

“तुम्‍हें मुँह से क्‍या लेना है? अच्‍छे बच्‍चे गुरुओं के बारे में ऐसी बात न‍हीं करते”

“मेरा नाम तो अभी कच्‍चा है…”

“नाम कच्‍चा है या कच्‍ची में ही…”

“मैं पक्‍की में हो जाऊँगा लेकिन बड़ी माँ ने अधन्‍नी नही दी…फ़ीस लगती है चाचा”- और वह पीपनी बजाता हुआ ग़ायब हो गया।

लहनासिंह सोचने लगा… उमर कैसे ढल जाती है… पहाड़ी नदी-नाले मैदान तक पहुँचते-पहुँचते संयत हो जाते हैं… ढलती हुई उमर में वर्तमान के खिसकने और भविष्‍य के अनिश्‍चय घेर लेते हैं। चीन की लड़ाई में ज़ख़्मी होने पर जब अस्‍पताल में था… तो हर नर्स उसे आठ-नौ साल की सूबेदारनी दिखाई देती… सिस्‍टर नैन्‍सी से एक दिन उसने पूछा भी था –

“सिस्‍टर क्‍या कभी तुम आठ साल की थीं?”

“अरे बिना आठ की उमर पार किए मैं बाईस की कैसे हो सकती हूँ… तुम्‍हें कोई याद आ रहा है…?”

“हाँ… वह आठ साल की छोकरी… दही में नहाई हुई… बहार के फूलों-सी मुस्‍कराती हुई मेरी जिंदगी में आई थी… और फिर एकाएक बिलुप्त हो गई… सूबेदारनी बन गई… कहते-कहते वह खो गया था!”

“हवलदार… तुम परी-कथाओं में विश्‍वास रखते हो?”

“परियों के पंख होते हैं न…वे उड़कर जहाँ चाहें चली जाएँ…कल्‍पना ही तो जीवन है”

“परंतु तुम्‍हें तो शौर्य-मेडल मिला है”

“अगर मेरी कल्‍पना में वह आठ वर्षीय कन्‍या न होती तो मुझे कभी शौर्य-मेडल न मिलता… मेरी प्रेरणा वही थी…”

“तुमने शादी नहीं बनाया”- नैन्‍सी ने पूछा

“शादी तो बनाया…कनेर के फूल-सी लहलहाती मेरी पत्‍नी है…एक बेटा है…और मेरी बूढ़ी माँ है…”

“तो फिर परियों की कल्‍पना… आठ वर्ष की कन्या का ध्‍यान…”

“हाँ, सिस्‍टर… मैंने 35 साल पहले उस कन्‍या को देखा था… फिर वह ऐसे ग़ायब हुई जैसे कुरली बरसात के बाद कही अदृश्‍य हो जाती है…और मैं निपट अकेला…”- नैन्‍सी चली गई थी।

क्रमशः

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