घनी कहानी, छोटी शाखा: गणेशशंकर विद्यार्थी की कहानी “हाथी की फाँसी” का पहला भाग

हाथी की फाँसी- गणेशशंकर विद्यार्थी

भाग-1

कुछ दिन से नवाब साहब के मुसाहिबों को कुछ हाथ मारने का नया अवसर नही मिला था। नवाब साहब थे पुराने ढंग के रईस। राज्य तो बाप-दादे खो चुके थे, अच्छा वसीका मिलता था। उनकी ‘इशरत मंज़िल कोठी’ अब भी किसी साधारण राजमहल से कम न थी। नदी-किनारे वह विशाल अट्टालिका चाँदनी रात में ऐसी शोभा देती थी, मानो ताजमहल का एक टुकड़ा उस स्थल पर लाकर खड़ा कर दिया गया हो। बाहर से उसकी शोभा जैसी थी, भीतर से भी वह वैसी ही थी। नवाब साहब को आराइश(सजावट) का बहुत ख़याल रहता था, उस पर बहुत रुपया ख़र्च करते थे और या फिर ख़र्च करते चारों ओर मुसाहिबों की बातों पर। उम्र ढल चुकी थी, जवानी के शौक न थे, किंतु इन शौकों पर जो ख़र्च होता, उसे कहीं अधिक यारों की बेसिर-पैर की बातों पर आए दिन हो जाया करता था। नित्य नए किस्से उनके सामने खड़े रहते थे।

पिछला किस्सा यहाँ कह देना बेज़ा न होगा। यारों ने कुछ सलाह की और दूसरे दिन सवेरे कोर्निश और आदाब के और मिज़ाजपुर्सी के बाद लगे वे नवाब साहब की तारीफ में ज़मीन और आसमान के कुलाबे एक करने। यासीन मियाँ ने एक बात की, तो सैयद नज़ामुद्दीन ने उस पर हाशिया चढ़ाया। हाफिज़ जी ने उस पर और भी रंग तेज़ किया। अंत में मुन्ने मिर्ज़ा ने नवाब साहब की दीनपरस्ती पर सिर हिलाते हुए कहा, “ख़ुदावंद, कल रात को मैंने जो सपना देखा, उससे तो यही जी चाहता है कि हुज़ूर के क़दमों पर निसार हो जाऊँ और जिंदगी-भर इन पाक़-क़दमों को छोड़कर कहीं जाने का नाम न लूँ”

यारों ने बड़े शौक़ से पूछा, ‘मिर्जा साहब, क्या ख़्वाब था? ज़रा हम भी तो सुनें”

मुन्ने मिर्ज़ा बोले – “क्या कहूँ, उसका जितना ख़याल करता हूँ, उतना दिल पाक़ जज़्बामत से पुर और मसर्रत से उछलने लगता है। नींद टूट जाने के बाद भी यही जी चाहा कि अभी ख़्वाब को देखता रहूँ। अल्लाह! अल्लाह! हुज़ूर भी कितने बड़े वली अल्लाह हैं। मुझे तो कभी ख़याल भी न हुआ कि हुज़ूर के क़दमों को बोसा दूँ और ज़िंदगी-भर हुज़ूर की जूतियाँ सीधी करता रहूँ। क्या ख़्वाब था, कितना मुबारक! कितना पाक़!”

मियाँ यासीन- “भाई कुछ कहोगे भी?”

मुन्नेय मिर्जा- “उस ख़्वाब के महज़ ख़याल से बंद में आ जाता हूँ। जी चाहता है कि क्या पाऊँ और हुज़ूर को सिर काट करके लुटा दूँ”

नवाब साहब- “मिर्ज़ा जी, आख़िर ख़्वाब भी तो बतलाइए..आपने क्या देखा? उसे भी तो सुनें!”

मुन्ने मिर्ज़ा- “हाँ, हाँ, हुज़ूर ज़रूर-ज़रूर उसे सुनाता हूँ। रात को दस बजे जो सोया था तो तीन का घंटा बज रहा था, उस वक़्त आँख खुली। मैंने सोचा, अभी तो सवेरा होने में बहुत देर हैं, फिर चारपाई पर पड़ा रहा। कुछ यादे-इलाही में मशरूक था कि आँख झपक गयी। ख़्वाब क्या देखता हूँ कि मेरे कंधे पर,पंख जम आए हैं और मैं उड़ रहा हूँ। उड़ता-उड़ता मक्का शरीफ़ में पहुँच गया। पहले काबा के चारों तरफ चक्कर लगाता रहा। आसपास के पुरनूर नजा़रे से जब दिल सेर हो गया, तब मैंने भीतर क़दम रखा। देखता क्या हूँ कि एक बड़ा लंबा-चौड़ा मैदान है, उसमें बहुत-से बड़े-बड़े बुज़ुर्गवार एक सफ़ेद फ़र्श पर बैठे हुए हैं, आपस में कुछ बातचीत कर रहे हैं और कुछ ऐसा मालूम हुआ कि दुनिया में इस वक़्त पाक़ रूहों में उनके मुताल्लिक कुछ ज़िक्र था। इतने में क्या देखता हूँ कि वे सब उठकर खड़े हो गये और क़तार बाँधने लगे। खाक़ न समझा कि माजरा क्या है? मैं उन लोगों के पीछे की क़तार के पीछे खड़ा हो गया। वे सब नमाज़ पढ़ने लगे। मैं कुछ चकरा-सा गया था। एक साहब ने मुझे इशारा किया कि तू भी नमाज़ में शामिल हो। मैं फ़ौरन ही शामिल हो गया। पहली रकात के बाद मैंने जो सिर उठाकर आगे देखा तो मेरे ताज्जुब का कोई ठिकाना न रहा। देखता क्या हूँ कि सब नमाज़ियों के आगे पेश-इमाम की जगह पर हुज़ूर नवाब साहब हैं और वे ही नमाज़ पढ़ा रहे हैं। उस वक़्त ख़यालात का एक अजब दरिया मौजज़न था। सब नमाज़ पढ़ रहे थे और इबादत में मसरूफ थे, मगर मैं था कि इस ख़याल में कि हुज़ूरवाला यहाँ कहाँ, मैं तो आपको घर छोड़ आया था। हुज़ूर यहाँ कैसे और कब पहुँचे और किस तरह इन पाक़ बुज़ुर्गों के घर इमाम हो गये? पता नहीं कितनी देर तक मैं उसी ख़याल में गलता पेचाँ रहा। मेरा ध्यान उस वक़्त टूटा जब मेरे कान में यह आवाज़ पड़ी, ‘ऐ नेकबख्त , देखता नहीं, ये सब दुनिया की पाक़ रूहें हैं और जो बुज़ुर्ग इनका पेश-इमाम है वह इस वक़्त दुनिया में सबसे ज़्यादा दीनदार और अल्लाहताला का प्यारा है। मैंने जब नज़र उठायी तो देखता क्या हूँ कि सामने की रूहें ग़ायब हैं और मेरे पास खड़े हुए एक बड़ी भारी सफ़ेद दाढ़ीवाले बुज़ुर्ग मुझसे ये अल्फ़ाज़ फ़रमा रहे हैं। मैं बहुत आजबी से आदाब बजा लाने के लिए झुका। झुकते ही कुछ शोर हुआ। आँल गयी। देखाता हूँ कि अपनी चारपाई पर पड़ा हूँ और बाहर मुर्ग कुकड़-कूँ, कुकड़-कूँ बोल रहा है। बिस्तरे से उठ पड़ा। खुदा को सजदा करके मैंने दिल में कहा, मेरे मालिक का यह रूतबा! इसका तो मुझ नाकिस-उल-अक़्लत को कभी ख़याल भी न हुआ था। उस वक़्त से ख़ुशी से दिल बाग़-बाग़ है। मियाँ यासीन, तुम्हीं कहो, यह क्या कम ख़ुशनसीबी है कि हम लोग हुज़ूर जैसे नेक-नीयत और पाक़-इंसान की ख़िदमतगुज़ारी में है जिनको दुनिया के बड़े-बड़े बुज़ुर्ग तक अपना सदीर मानते हैं”

मियाँ यासीन- “वल्लाह, आँखे खुल गयीं। तुम्हारा ख़्वाब क्या है, हम गुनाहों में फँसे हुए लोगों के लिए हर्मे-वसीरत है। तुम्हें आज यक़ीन हुआ कि हुज़ूर के अंदर दुनिया की एक बड़ी भारी हस्ती है”

हाफिज़ जी- “सच है, सच है। हुज़ूर की पाकीज़गी और दीनदारी का इससे बढ़कर और सबूत ही क्या हो सकता है कि दुनिया के बड़े-बड़े बुज़ुर्ग हुज़ूर की सरपरस्ती के लिए फिरेंगे”

सैयद साहब ने कहा- “दुनिया में हुज़ूर से बढ़कर दीनदार कौन है? मक्का-मुकद्दस में बड़े-बड़े बुज़ुर्गों की पेश-इमामी का हासिल होना कोई मामूली बात नहीं है। हुज़ूर की खुदा-परस्ती हफ्त-अकालीम में अपना असर रखती है। बड़े-बड़े औलियाओं को जो बात नसीब नहीं हुई वह हुज़ूर को नसीब हुई है। इससे बढ़कर खुशकिस्मती और क्या हो सकती है? मैं तो एक अदना आदमी हूँ, हुजूर के दमों पर हमेशा निसार रहता हूँ, मगर इस वक़्त अगर खुदा ने ज़र दिया होता तो इस ख़ुशी में लुटा देता और कम से कम आज के दिन तो शहर-भर के किसी मोहताज को भूखा न रहने देता”

नवाब साहब- “मिर्ज़ा जी, क्या सचमुच रात को मैं मक्के शरीफ़ में पहुँच गया था! तुम्हें धोखा हो गया होगा। तुमने किसी और को देखा होगा और समझ गये होंगे कि नवाब हैं। आँखों को अक्सर धोखा हो जाता है”

मुन्ने मिर्जा- “ हुज़ूर, मैंने तो ख़्वाब की बात कहीं है, मगर ख़्वाब बड़े मारक के हुआ करते हैं। ख़ासकर सुबह का देखा हुआ। फिर इस ख़्वाब की तस्वीर तो हुज़ूर किसी से भी पूछें तो वह यही कहेगा कि हुज़ूर के क़दम चूम लेने चाहिए और हुज़ूर पर सब कुछ लुटा देना चाहिए”

यासीन मियाँ- “सच है हुज़ूर यह ख़्वाब ऐसा ही है। मैं तो हुज़ूर को पहले ही से पहुँचा हुआ समझता रहा हूँ। मुझे तो हुज़ूर की जात पर जो अकीदा है, उसे किसी तरह ज़ाहिर करूँ? कलेजा चीरकर अगर देखा जाए तो हुज़ूर देखेंगे कि वह हुज़ूर की अकीदत से रँगा हुआ है, और जब से मैंने इस ख़्वाब को सुना है तब से यही जी चाहता है कि इस ख़ुशी में तन के कपड़े तक उतारकर ग़रीब को दे डालूँ”

नवाब साहब- “तुम क्यों करोगे! ग़रीबों के लिए जो कुछ कहो, वह हो जाए। अच्छा , ख़ज़ांची को बुलाओ। एक हज़ार रुपये ले लो, और आज इसी ख़ुशी में मोहताजों को कोठी के सामने, वह जो चाहें, उन्हें दोनों वक़्त खिला दो”

दोपहर से लेकर रात तक नवाब साहब की कोठी के सामने बहुत-से-ग़रीब मोहताज जमा थे। उनको खाना दिया गया, किसी को पेट-भर और किसी को अधपेट। किसी को चना-चबेना और किसी को पूड़ी-कचौड़ी।

वे सब निपटा दिए गए। शेष रकम मुसाहिबों और नौकर-चाकरों ने चुपचाप घोंट ली। नवाब साहब ने समझा, मोहताजों को ख़ूब मिला और उनका पुण्य और भी बढ़ा और मुसाहिबों ने सोचा कि अच्छा मूर्ख बनाया और दूसरे अवसर की घात में रहने लगे।

क्रमशः

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