घनी कहानी, छोटी शाखा: गणेशशंकर विद्यार्थी की कहानी “हाथी की फाँसी” का तीसरा भाग

हाथी की फाँसी- गणेशशंकर विद्यार्थी
भाग-3

(अब तक आपने पढ़ा…नवाब साहब का राज्य तो चला गया था लेकिन उनकी नवाबी बरक़रार थी..लिहाज़ा आसपास मक्खनबाज़ी करके अपना काम निकलवाने वालों की फ़ौज भी इकट्ठा थी।नवाब साहब से दावत लिए जब बहुत दिन हो जाते तो मसाहिब मिलकर कुछ ऐसे क़िस्से सुनाते जिसे सुनकर नवाब साहब ख़ुशी से दिल खोलकर ख़र्च कर देते और इनकी जेबें भर जातीं। मुन्ने मियाँ ने अपने सपने में नवाब साहब को मक्का शरीफ़ में सभी बुज़ुर्गवारों के सरपरस्त के रूप में पेश किया तो नवाब साहब दरियादिली का नमूना पेश करने के लिए ग़रीबों को अनाज बँटवाने लगे। दूसरी महफ़िल में जब बातें नवाब साहब की बम्बई यात्रा की निकली तो रेल की बातें आयीं और इसी बीच सैयद नजमुद्दीम ने एक नया शगूफा छोड़ा हाथी की फाँसी का। उसने बताया कि अंग्रेज़ सुबह पाँच बजे शहर से दूर मैदान में हाथी को फाँसी देने वाले हैं। नवाब साहब जाने के लिए तैयार हो गए और मसाहिबों को सुबह की ठंड से बचने के लिए कश्मीरी दुशाले मिल गए। अब आगे…)
नवाब साहब को रात को बहुत देर तक नींद नहीं आई। हाथी की फाँसी के लिए छोटे-बड़े सभी को, बेगम साहिबा को, जब मनाया तब वे भी तैयार हो गयीं। बाँदी, मामा और मुग़ल चाकर, मुंशी और मुसाहिब भी कमर-बस्ताब थे। हर सामान की तैयारी का कहना ही क्या ! शाम ही से झूलन पीर के मैदान में ख़ास तौर से आराइश की गयी। बेगम साहिबा और उनकी सहेलियों के लिए अलग अच्छा प्रबंध था। मुसाहिबों को शाम ही वे बढ़िया दुशाले मिल गये। उन्हें ओढ़कर वे नवाब साहब को, ज़मींदारों को सलाम करने पहुँचे। दुआएँ देते हुए कहने लगे कि “हुज़ूर ज़मीन और आसमान क़ायम है तब हुज़ूर का इक़बाल क़ायम रहे”

नवाब साहब मुसाहिबों की तारीफ़ से बहुत ख़ुश हुए। सैयद नजमुद्दीन ने बहुत विनय के साथ प्रार्थना की- “हुज़ूर के गुलामज़ादे की तबीयत बहुत ख़राब है। बुखार आज तीन दिन से नहीं उतरा है। अगर इजाज़त हो तो बंदा दरे-दौलत पर हाज़िर होने की बजाय सीधे ही मैदान में पहुँच जाए”

नवाब साहब ने इजाज़त दे दी और सैयद ने नवाब साहब को झुककर सलाम किया। दस बजे रात नवाब साहब आराम के लिए तशरीफ़ ले गये। हुक्म हुआ कि ठीक चार बजे सवेरे चलना होगा, गाड़ियाँ और पालकियाँ तैयार रहें और मैदान में पहले ही आराम और नाश्तेर का बंदोबस्त रहे।

इस इंतज़ाम में और कुछ नई बात को देखने के इश्तयाक में उस दिन नवाब साहब की कोठी में बहुत-से लोगों को नींद नहीं आई। तीन बजे रात ही में कोठी के सामने सवारी गाड़ियाँ और पालकियाँ लगने लगीं। चार बजे नवाब साहब और बेगम साहिबा को जगा दिया गया, तैयार होते-होते कुछ समय लग गया। तब भी पाँच बजे से पहले ही सब लोग सवारियों पर सवार हो गये और यात्रा शुरू हो गयी।

मैदान शहर से तीन मील दूर था। खूब सर्दी का मौसम और उस पर अँधेरी रात। लोग सर्दी से अकड़े जाते थे। पा‍लकियों के कहारों तक का बुरा हाल था। किंतु क़दम बढ़ाए जाते थे। साढ़े पाँच बजे क़रीब मैदान की अमराई में पहुँचे। सब लोग खेमों में जाकर अँगीठियों से हाथ सेंकने लगे। मैदान में अँधेरा था। कहीं न कोई आदमी दिखाई देता था और न किसी का शोर ही था।

नवाब साहब ने फ़रमाया- “हम लोग बहुत पहले आ गए यहाँ तो अभी कोई भी नहीं आया”

“और कोई आता भी कैसे? कितनी सर्दी है, कितना अँधेरा था!” मुन्ने मिर्ज़ा ने हाँ-में-हाँ मिलाई और कहा- “हुज़ूर, इतने सवेरे कौन आ सकता है? यहाँ तो हुज़ूर ही का काम था। हुज़ूर रोज़ चार बजे सवेरे यादे-इलाही में मसरूफ हो जाते हैं इसलिए हुज़ूर के लिए कोई नई बात नहीं”

यासीन मिर्ज़ा ने कहा- “सच है, हुज़ूर को जगाने की ज़रूरत ही न पड़ी। जब चौकीदार ने आया से अर्ज़ किया कि हुज़ूर को जगा दो तो आया ने जवाब दिया कि हुज़ूर पहले से ही जाग रहे हैं, यादे-इलाही में मसरूफ हैं, याद-दिहानी किए देती हूँ”

हाफिज जी भी पीछे नहीं रहने वाले थे। वे बोले- “हुज़ूर का यह क़ायदा कुछ आज ही का नहीं है। मेरे चाचा कहा करते हैं कि हुज़ूर छुटपन से ही चार बजे सुबह से यादे-इलाही में मसरूफ हो जाते थे। मेरे चाचा कहते थे कि एक बार का ज़िक्र है कि हुजूर आधी रात तक जागने की वजह से चार बजे न जाग सके। पाँच बजे नींद टूटी तब आपको बहुत अफ़सोस हुआ। आप नौकर पर बहुत राजा हुए कि तूने चार बजे जगाया क्यों नहीं? फिर उस दिन से आप दिन-भर याद-खुदाए मसरूफ रहे और जिस नौकर को गफ़लत की वजह से आपने डाँट बतलाई थी वह तीसरे दिन ऐसा बीमार पड़ा कि महीने भर के बाद चारपाई से उठ सका”

नवाब साहब ने फ़रमाया- “अभी हाथी की फाँसी में देरी मालूम होती है। कुछ धूप निकल आवे तब लुत्फ़ भी आएगा। उस वक़्त तक हम लोग चाय और नाश्ते से भी फ़राग़त पा जाएँगे। नमाज़ के बाद इन कामों को कर डालना चाहिए”

सब लोगों ने नमाज़ पढ़ी। जो महीने में एक बार भी नमाज़ की एक रकात न पढ़ते थे वे भी इस समय बड़ी ख़ूबी के साथ नमाज़ पढ़ रहे थे। नमाज़ ख़त्म होने के बाद दस्तरखान बिछा, गरम-गरम बढ़िया जाफ़रानी चाय आई। मेवे, कबाब, कोफ्ते और दूसरे लजीज़ सामान रखे गये। बेगम साहिबा का अलग इंतज़ाम था और नवाब साहब का अलग।

खाते-पीते सात बजे। सूर्योदय हुआ। धूप फैल चली। नवाब साहब रफ़ीकों के साथ बाहर निकले। उन्होंने देखा कि मैदान खाली पड़ा है, दो-चार आदमियों के सिवा, जो इधर-उधर जा रहे थे, दूर-दूर तक किसी का पता नहीं है। न कहीं हाथी दिखाई देता है और न कोई हजूम ही। सैयद नज़मुद्दीन का भी कहीं पता नहीं था। उसकी बहुत तलाश की गयी, मगर कहीं भी उनका नामोनिशान न मिला। लोग इधर-उधर गये। मुसाहिबों ने दौड़ लगाई। नवाब साहब ने भी आँख फाड़-फाडकर सब तरफ देखा। बेगम साहिबा और उनकी सहेलियों और नौकरानियों ने भी चिकों के भीतर से बहुत कुछ झाँका। परंतु न हाथी दिखाई दिया और न भीड़ ही। बहुत देर तक इंतजार रहा। सात के साढ़े सात बजे, साढ़े सात के आठ बजे और आठ के साढ़े आठ परंतु कहीं कोई ऐसी बात नज़र न आई जिससे यह समझा जाता कि मैदान में हाथी क्या लोमड़ी को ही फाँसी होने वाली है।

किसी राहगीर से जब पूछा गया कि “भई, हाथी को फाँसी कब होगी?”

तब उसने पूछने वाले की तरफ देखा और फिर आगे का रास्तानापा। मगर पूछने वाले साहब हाथ धोकर उसके पीछे पड़ गये तो उसने झींककर यही उत्तर दिया कि “कहीं घास तो नहीं चर गये?”

तो अंत में बहुत इंतजार के बाद नवाब साहब ने झल्लाकर हुक्म दिया कि “सवारियाँ तैयार हों, हम वापस जाएँगे”

क्रमशः

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