घनी कहानी, छोटी शाखा: ख़लील जिब्रान की कहानी “तूफ़ान” का दूसरा भाग

तूफ़ान – ख़लील जिब्रान

भाग- 2

(अब तक आपने पढ़ा..तीस वर्ष की आयु वाले यूसूफ अल-फाख़री दुनिया का त्याग करके एक निर्जन शांत आश्रम में निवास करते हैं। उनके बारे में अच्छी तरह किसी को नहीं पता लेकिन सब अपने- अपने अंदाज़े लगाते हैं कोई उन्हें प्रेम में हारा हुआ प्रेमी मानता है तो कोई कवि; लेकिन सब एक बात में सहमत हैं और वो ये कि तीस वर्ष की आयु में इस तरह संसार त्याग देना पागलपन है। कहानी के सूत्रधार को भी यूसूफ अल-फाख़री के जीवन में बहुत ज़्यादा रुचि है। उन्होंने कई बार कोशिश भी की लेकिन हर बार उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। इन कोशिशों के दो वर्ष पश्चात आख़िर उन्हें एक मौक़ा मिलता है। भारी वर्षा और तूफ़ान के कारण आश्रम के पास ही फँसे सूत्रधार सही मौक़ा देखकर आश्रम में शरण लेते हैं वैसे तो यूसूफ अल-फाख़री का मन नहीं होता या वो ऐसा प्रदर्शित करते हैं लेकिन कुछ समय में वो भी सूत्रधार की बातों को प्रभावी पाते हैं। एक मरणासन्न पक्षी की देखभाल करते हुए दोनों में बात शुरू हो जाती है। सूत्रधार की पूरी कोशिश है कि उनके जीवन के बारे में ज़्यादा जानकारी पा ले..अब आगे…)

मैंने एक अनजान की तरह उनसे पूछा, “क्या आप बहुत दिनों से यहाँ रह रहे हैं?”

मेरी ओर देखे बिना ही उन्होंने शान्त स्वर में कहा, “मैं इस स्थान पर तब आया था, जब यह पृथ्वी निराकार तथा शून्य थी, जब इसके रहस्यों पर अन्धकार छाया हुआ था, और ईश्वर की आत्मा पानी की सतह पर तैरती थी”

यह सूनकर मैं अवाक् रह गया। क्षुब्ध और अस्त-व्यस्त ज्ञान को समेटने का संघर्ष करते हुए मन-ही-मन मैं बोला, “कितने अजीब व्यक्ति हैं ये और कितना कठिन है इनकी वास्तविकता को पाना! किन्तु मुझे सावधानी के साथ, धीरे-धीरे और संतोष रखकर तब तक चोट करनी होगी, जबतक इनकी मूकता बातचीत में न बदल जाय और इनके विचित्रता समझ में न आ जाए”

रात्रि अपनी अन्धकार की चादर उन घाटियों पर फैला रही थी। मतवाला तूफ़ान चिंघाड़ रहा था और वर्षा बढ़ती ही जा रही थीं। मैं सोचने लगा कि बाइबिल वाली बाढ़ चैतन्य को नष्ट करने और ईश्चर की धरती पर से मनुष्य की गंदगी को धोने के लिए फिर से आ रही है॥

ऐसा प्रतीत होने लगा कि तत्वों की क्रान्ति ने यूसुफ साहब के हृदय में एक ऐसी शान्ति उत्पन्न की है, जो प्राय: स्वभाव पर अपना असर छोड़ जाती है और एकान्तता को प्रसन्नता से प्रतिबिम्बित कर जाती है। उन्होंने दो मोमबत्तियां सुलगायीं और मेरे सम्मुख शराब की एक सुराही और एक बड़ी तश्तरी में रोटी मक्खन, जैतून के फल, मधु और कुछ सूखे मेवे लाकर रक्खे। तब वह मेरे पास बैठ गये और खाने की थोड़ी मात्रा के लिए–उसकी सादगी के लिए नहीं- क्षमा माँगकर, उन्होंने मुझसे भोजन करने को कहा।

हम उस समझी–बूझी निस्तब्धता में हवा के विलाप तथा वर्षा के चीत्कार को सुनते हुए साथ-साथ भोजन करने लगे। साथ ही मैं उनके चेहरे को घूरता रहा और उनके हृदय के रहस्यों को कुरेद-कुरेदकर निकालने का प्रयास करता रहा। उनके असाधारण अस्तित्व के सम्भव कारण को भी सोचता रहा। भोजन समाप्त करके उन्होंने अंगीठी पर से एक पीतल की केतली उठाई और उसमें से शुद्ध सुगन्धित कॉफ़ी दो प्यालों में उड़ेल दी। तब उन्होंने एक छोटे-से लकड़ी के बक्से को खोला और ‘भाई’ शब्द से सम्बोधित कर, उसमे से एक सिगरेट भेंट की। कॉफ़ी पीते हुए मैंने सिगरेट ले ली, किन्तु जो कुछ भी मेरी आँखें देख रही थी, उस पर मुझे विश्वास नहीं हो रहा था।

उन्होंने मेरी ओर मुस्कराते हुए देखा और अपनी सिगरेट का एक लम्बा कश खींचकर तथा कॉफ़ी की एक चुस्की लेकर कहा, “अवश्य ही तुम-मदिरा, कॉफ़ी और सिगरेट यहाँ पाकर सोच में पड़ गये हो और मेरे खान-पान तथा ऐश ओ आराम पर, उन्हीं लोगों में से एक हो, जो इन बातों में विश्चास करते हैं कि लोगों से दूर रहने पर मनुष्य जीवन से भी दूर हो जाता है। और ऐसे मनुष्य को उस जीवन के सभी सुखों से वंचित रहना चाहिए”

मैंने तुरन्त स्वीकार कर लिया, “हाँ! ज्ञानियों का यही कहना है कि जो केवल ईश्वर की प्रार्थना करने के लिए संसार को त्याग देता है, वह जीवन के समस्त सुख और आनन्द को अपने पीछे छोड़ आता है, केवल ईश्वर द्वारा निर्मित वस्तुओं पर सन्तोष करता है और पानी और पौधों पर ही जीवित रहता है”

ज़रा रुककर गहन विचारों में निमग्न वे बोले, “मैं ईश्वर की भक्ति तो उसके जीवों के बीच रहकर भी कर सकता था, क्योंकि उसे तो मैं हमेशा से अपने माता-पिता के घर पर भी देखता आया हूं। मैंने मनुष्यों का त्याग केवल इसलिए किया कि उनका और मेरा स्वभाव मिलता न था और उनकी कल्पना मेरी कल्पनाओं से मेल नहीं खाती थीं। मैंने आदमी को इसीलिए छोड़ा क्योंकि मैंने देखा कि मेरी आत्मा के पहियों दूसरी दिशा में घूमते हुए दूसरी आत्माओ के पहियों से जोर से टकरा रहे है। मैंने मानव –सभ्यता को छोड़ दिया, क्योकि मैंने देखा कि वह एक ऐसा पेड़ हैं, जो अत्यन्त पुराना और भ्रष्ट हो चुका है, किन्तु है शक्तिशाली तथा भयानक। उसकी जड़ें पृथ्वी के अंधकार में बन्द हैं और उसकी शाखाएँ बादलों में खो गई हैं। किन्तु उसके फूल लोभ, अधर्म और पाप से बने हैं और फल दु:ख संतोष और भय से। धार्मिक मनुष्यों ने यह बीड़ा उठाया हैं। उसके स्वभाव को बदल देगें, किन्तु वे सफल नहीं हो पाये हैं। वे निराश तथा दुखी होकर मृत्यु को प्राप्त हुए”

यूसुफ साहब अंगीठी की ओर थोड़ा-सा झुके, मानो अपने शब्दों की प्रतिक्रिया जानने की प्रतीक्षा में हों। मैंने सोचा कि श्रोता ही बने रहना सर्वोत्तम है।

क्रमशः

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