घनी कहानी, छोटी शाखा: आंडाल प्रियदर्शिनी की कहानी “छुईमुई” का पहला भाग

छुईमुई- आंडाल प्रियदर्शिनी
भाग-1

“अनु, दादी को हाथ मत लगाना”

बच्ची की पीठ पर पड़ी धौल पद्मावती के तन में गहरायी से उतर गई।
“कमबख़्त कितनी बार कहा है, दादी के क़रीब मत जाओ, उन्हें मत छुओ, उनके ऊपर मत लेटो, खोपड़ी में कुछ जाए तब न..बस ज़िद..ज़िद और ज़िद..है तीन साल की पर ज़िद तो देखो”
क्रोध का आवेग बच्ची के सिर पर एक घूँसे के रूप में पड़कर ही थमा। दर्द से छटपटाती अनु चीखती हुई रोने लगी। पद्मावती घबरा गईं। उनका मानना था कि बच्चों को बेतरह पीटना,घूँसा मारना आदि पाशविक कृत्य हैं।

वे कहतीं, “बच्चे फूल के समान होते हैं। ख़ूशबू बिखेरते हैं। मन को विभोर करनेवाला सुनाद होते हैं। बुजुर्गों से ज़्यादा पवित्र और शुद्ध आत्मावाले। बच्चों को देखकर ही कम से कम बुज़ुर्ग सुधर जाएँ इसीलिए इन छोटे देवताओं को ईश्वर ने धरती पर भेजा है। कौन समझता है इसे…”

ये देखो रेवती का भड़कता गुस्सा अनु की कैसी दुर्गति बना रहा है। पद्मावती के मन में दुख का आवेग उमड़ने लगा।

मेरी ख़ातिर बेचारी कोमल जान मार खा रही है। ग़लती तो मेरी है न..हे भगवान!” होठों को भींचकर मुँह बंदकर रुलाई रोकते हुए उसने ईश्वर से विनती की। अनु ज़ोर से रोने में असमर्थ हिचकी लेती रही।

“बिलकुल चुप..आवाज़ नहीं आनी चाहिए, आँख में एक बूँद आँसू न आए..ले इसे खा ले, नीचे मत गिराना, नो क्रायिंग”

रेवती बड़बड़ाई और कटोरी में दही भात और चम्मच अनु के हाथ में पकड़ा दिया। भर्राए गले और आँखों में रूलाई को भीतर ही रोकते हुए, अनु कटोरी हाथ में लेकर स्वयं ही डायनिंग टेबल के पास जा, कुर्सी खींच बैठ गई और चम्मच से भात ले बड़ी मुश्किल से खाने लगी। बेबस लाचार आँसू बहाती पद्मावती के मन में बच्ची को गोद मे बिठाकर चिड़िया की कहानी सुनाते हुए उसके कोमल मुँह में भात डालने की इच्छा बलवती हो उठी। आपाद मस्तक तन तड़प उठा।

“छू नहीं सकती..छू देंगी तो प्रलय मच जाएगा..ज्वालामुखी फट पड़ेगा..घर युद्धस्थल में बदल जाएगा…क्या करूँ?…क्या करूँ?”

पद्मावती कर ही क्या सकती थी? अनु ने खाना ख़त्म कर लिया। सिंक में कटोरी डाल, हाथ मुँह धो लिया।

“गो टू बेड अनु, स्लीप” रेवती का आदेश सुनाई पड़ा।

अनु बैठक में एक कोने में लुढ़क गई और बैठक के अन्तिम छोर पर बने छोटे कमरे में बैठी दादी को तरसती निगाहों से निहारती रही। अनु के लिए तो दादी ही सब कुछ थी।

सुबह आँखे खुलते ही …”दादी, अनु जग गई है” भोर की उजली मुस्कान सहित कहती। “दाँत साफ़ कर दो दादी मुँह कुल्ला करा दो दादी…” “खाना खिला दो दादी…” “गोद में बिठा लो दादी।” इस प्रकार दादी की छाया बन उनसे चिपकी रहती थी।

सोते समय तो दादी का साथ उसे अवश्य ही चाहिए था। दादी की नरम गोद में लेटी हुई… उनकी ऊँगली थामे… एक ओर करवट ले “गाना सुनाओ दादी…।” कहकर गाना सुनते हुए पल भर में सो जाती।

ऐसा सबकुछ पहले होता था। अब नहीं होता । अब तो, पद्मावती को उस छोटे कमरे से बाहर आने की इजाज़त नहीं थी और अनु को भीतर जाने की मनाही थी।

उस कमरे के बाहर भी किवाड़ था। बाहर निकलना हो तो वहीं से जाना पड़ता। कमरे में ही गुसलखाना, स्नानगृह, खाने की प्लेट, कॉफी के लिए गिलास, पानी का नल, दरी, तकिया, चादर, छोटा रेडियो और पोर्टेबल टी. वी. लगा दिया था। उस कमरे का किवाड़ बाहर सिटआऊट में खुलता था। अपने कपड़े खुद धोकर सुखाने पड़ते थे। स्टूल पर बैठे सड़क की चहल-पहल देख सकती थी। जो चाहे करने की आज़ादी थी। परन्तु कमरे से बाहर निकल इस तरफ़ आने पर प्रतिबंध था। सुबह से लेकर रात सोने तक यह आठ फ़ीट लम्बा कमरा ही सब कुछ था।

केवल घर ही नहीं, परन्तु जीवन भी कारागार बन गया था। महरी भी कमरा झाड़ने-पोंछने नहीं आती थी। बाहर के किसी व्यक्ति को देखे बिना महीनों गुज़र जाते। मानव-स्पर्श के लिए तरसते हुए कई दिन बीत जाते, अब तो स्पर्श की अनुभूति ही मिट-सी गई थी।

“छप… छप… छप…”- अनु के अँगूठा चूसने की आवाज़ कानों में पड़ी। पद्मावती का मन भर आया। मन हुआ कि जाकर उस नारियल के पौधे को गोद में सुलाकर उसके कटे छोटे बाल सहला दूँ। रोएँ समान कोमल एड़ियों को गोद में रख धीरे-धीरे सहला दूँ, उस कोमल लता को भींचकर सोने का मन चाहा पर… पर यह कैसे संभव होता? लगा दु:ख से छाती फट जाएगी और पद्मावती वेदना से छटपटाने लगी।

“मेरी पोती है अनु… मैं उसे छूना चाहती हूँ”- पर उसकी छटपटाहट रेवती के कानों में नही पड़ी।

स्पीकर फ़ोन पर अमेरिका की लाईन लगी हुई थी… “हूँ… मैं बोल रही हूँ…”

“अनु ठीक तो है ना? और माँ…”

“माँ की दयनीय स्थिति के बारे में तो मैंने लिखा था”

“हूँ…हूँ… पढ़ा था… विश्वास ही नहीं होता…दुर्भाग्य…”

“दुर्भाग्य या कपट… बदबू आती हैं। आई कांट मैनेज एनी मोर…मैं उसे अब बर्दाश्त नहीं कर सकती”

“प्लीज़ डार्लिंग, चार महीने में मैं आ जाऊँगा, और समस्या का हल ढूँढ दूँगा”

“हूँ”

“माँ है क्या? फोन उन्हें दो न?”

“चुप रहिए, कहने को कुछ नहीं है, बंद कीजिए फोन…”- रेवती क्रोध से फुफकारती हुई बच्ची को गोद में लिए बेडरूम में गई और ज़ोर से किवाड़ बंद कर दिया। दुबारा बाहर आई।

“वैसे ही मेरी कोई सहेली घर नहीं आना चाहती “होम” में जाकर रहने को कहती हूँ तो मानती नहीं हैं, क्या आप भी चाहती हैं कि हम लोग भी यह कष्ट भुगतें?…क्यों? यह बदला लेने की प्रवृत्ति क्यों? मैं दूसरा घर ढूँढ़ लेती हूँ आप इस घर में ख़ुशी से रहिए, कल मैं ही चली जाती हूँ यही एक रास्ता है”- दीवारों और हवाओं को सुनाते हुए रेवती बड़बड़ाने लगी।

उसकी चिढ़ भी हाल में ही बढ़ी थी। पहले तो दोनों बड़े प्रेम से रहती थीं।

“सास बहू जैसे थोड़ी रहती हैं? अपनी बेटी से भी शायद कोई इतना प्यार करता होगा”

लोग उन दोनों के बारे में ऐसा कहते थे। पता नहीं किसकी नज़र लग गई। पहले दोनों साथ-साथ घर सजाती थीं। नए-नए पकवान बनाती थीं। रेवती की कायनेटिक हौण्डा पर बैठ पार्क, मंदिर, प्रदर्शनी, समुद्रतट आदि सभी स्थलों की सैर करने जातीं।

“क्लब की मीटिंग छः बजे ख़त्म होगी। वहीं रहिएगा मैं पिकअप कर लूँगी” रेवती अपनी सास से कहती और ठीक छः बजे पहुँच भी जाती थी।

“होटल चलकर कश्मीरी नान खाएँ सासू माँ?”

“हाँ, क्यों नहीं?”

“माँ मैं आइसक्रीम लूँगी”

तीनों अन्नानगर के चतुरा रूफ़ गार्डन जाते। बजाय जल्दी-जल्दी खाना खाने के पौना घंटा बैठ आराम से खाते-पीते। घर लौटने पर पैर फैलाकर सुस्ताते, टी वी देखते, संगीत सुनते, कैरम खेलते, खूब मज़ा लेने के बाद बारह बजे के क़रीब सोने जाते।

ये बातें पिछले जनम की लगती हैं पद्मावती को अब।

क्रमशः

(इस कहानी के सर्वाधिकार लेखिका के पास सुरक्षित हैं)

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